'कारोबार कहां से चलाना है यह किरायेदार नहीं बताएगा', दिल्ली हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी
दिल्ली हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि किरायेदार मकान मालिक को यह निर्देश नहीं दे सकता कि ...और पढ़ें

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक किराएदारी विवाद में यह अहम टिप्पणी करते हुए बेदखली के आदेश को बरकरार रखा है।
HighLights
किरायेदार मकान मालिक को कारोबार की जगह नहीं बता सकता।
दिल्ली हाई कोर्ट ने बेदखली के आदेश को सही ठहराया।
दरियागंज परिसर से किरायेदार को हटाने का फैसला बरकरार।
जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। मकान मालिक अपनी ही संपत्ति में कारोबार कैसे चलाए, किस मंजिल का इस्तेमाल करे और किस जगह को अपने काम के लिए बेहतर माने। यह तय करने का अधिकार किरायेदार का नहीं है। दिल्ली हाई कोर्ट ने एक किराएदारी विवाद में यह अहम टिप्पणी करते हुए बेदखली के आदेश को बरकरार रखा है।
न्यायमूर्ति हरीश वैद्यनाथन शंकर ने कहा कि किराएदार मकान मालिक को यह निर्देश नहीं दे सकता कि वह कारोबार ऊपरी मंजिल, बेसमेंट या किसी दूसरी संपत्ति से चलाए। कोर्ट ने दरियागंज स्थित व्यावसायिक परिसर से किराएदार को बेदखल करने के पटियाला हाउस कोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।
कागज का भंडारण पहली मंजिल पर होने से कामकाज भी प्रभावित
मामला अंसारी रोड, दरियागंज स्थित दुकान और कोठरी का है। याचिकाकर्ता राजीव गुप्ता ने प्रिंटिंग और पब्लिशिंग कारोबार के विस्तार के लिए परिसर खाली कराने की मांग की थी। मकान मालिक का कहना था कि मौजूदा जगह में बड़ी मशीनें, उपकरण और कर्मचारियों को व्यवस्थित करना मुश्किल है। कागज का भंडारण पहली मंजिल पर होने से कामकाज भी प्रभावित हो रहा है।
किराएदार ने तर्क दिया कि मकान मालिक के पास ग्राउंड और पहली मंजिल पर पर्याप्त जगह है। इसके अलावा गाजियाबाद और दिल्ली में दूसरी संपत्तियां भी हैं, जिन्हें कारोबार के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
दरियागंज प्रकाशन कारोबार का प्रमुख केंद्र
हाई कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि दरियागंज प्रकाशन कारोबार का प्रमुख केंद्र है और मकान मालिक का ग्राहक आधार भी इसी इलाके में है। इसलिए यह फैसला मकान मालिक को करना है कि उसके कारोबार के लिए कौन-सी जगह सुविधाजनक और उपयुक्त है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किराएदार को मकान मालिक की कारोबारी जरूरत का वैकल्पिक प्लान देने का अधिकार नहीं है। हाई कोर्ट ने कहा कि धारा 25बी (8) के तहत पुनरीक्षण में वह ट्रायल कोर्ट के साक्ष्यों का दोबारा मूल्यांकन कर अपनी राय नहीं थोप सकता। जब तक स्पष्ट कानूनी त्रुटि या गंभीर अनियमितता न हो, हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है।
