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    'आचरण निंदनीय, लेकिन जमानत कानून का नियम', CJI सूर्यकांत से अभद्र भाषा बोलने वाले प्रबल और चंदन को जमानत

    Updated: Wed, 29 Jul 2026 06:00 PM (IST)

    सुप्रीम कोर्ट में अभद्र व्यवहार के आरोप में गिरफ्तार दो कानून के छात्रों को पटियाला हाउस कोर्ट ने जमानत दे दी है। ...और पढ़ें

    प्रबल प्रताप को मिली जमानत। वीडियो ग्रैब

    प्रबल प्रताप को मिली जमानत। वीडियो ग्रैब

    HighLights

    1. सुप्रीम कोर्ट में अभद्र व्यवहार के आरोप में गिरफ्तारी हुई।

    2. पटियाला हाउस कोर्ट ने दो कानून के छात्रों को जमानत दी।

    3. अदालत ने कहा, आचरण निंदनीय पर निरंतर हिरासत अनुचित।

    जागरण संवाददाता, नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही के दौरान अभद्र भाषा का प्रयोग करने, कोर्ट रूम में कागजात फेंकने, सुरक्षा कर्मी से मारपीट करने और कार्यवाही बाधित करने के आरोप में गिरफ्तार दो कानून के छात्रों को कोर्ट ने जमानत दे दी।

    अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपितों का आचरण किसी भी तरह स्वीकार्य नहीं है और इसकी स्पष्ट शब्दों में निंदा की जाती है, लेकिन केवल आरोपों की गंभीर भाषा के आधार पर उन्हें अनिश्चितकाल तक न्यायिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता।

    पटियाला हाउस स्थित न्यायिक मजिस्ट्रेट रवि ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट जैसी सर्वोच्च संवैधानिक संस्था किसी एक आक्रोशित और स्वयं पैरवी कर रहे वादी के असंयमित व्यवहार से कमजोर नहीं पड़ती।

    'अदालतों को भी सुप्रीम कोर्ट जैसे संयम का अनुसरण करना चाहिए'

    ऐसे में अधीनस्थ अदालतों को भी जमानत पर विचार करते समय सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रदर्शित संस्थागत संयम का अनुसरण करना चाहिए।

    अदालत ने उत्तर प्रदेश के इटावा निवासी और लखनऊ विश्वविद्यालय के तृतीय वर्ष के कानून के छात्र प्रबल प्रताप सिंह व रायबरेली निवासी द्वितीय वर्ष के छात्र चंदर भान की जमानत याचिकाएं मंजूर कीं। दोनों को 25-25 हजार रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि की जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया गया।

    दिल्ली पुलिस के अनुसार, 10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट के कोर्ट नंबर-13 में विशेष अनुमति याचिका की सुनवाई के दौरान प्रबल प्रताप सिंह स्वयं याचिकाकर्ता के रूप में पेश हुए थे।

    आरोप है कि उन्होंने सुनवाई के दौरान अभद्र और असंसदीय भाषा का प्रयोग किया, कोर्ट रूम में कागजात फेंके, हंगामा किया और सुरक्षा कर्मी के साथ बल प्रयोग किया। इस मामले में चंदर भान भी सह-आरोपित हैं।

    'किसी भी हाल में अभद्र भाषा के इस्तेमाल का नहीं है अधिकार'

    अदालत ने कहा कि कोई भी पक्षकार, चाहे वह फैसले से कितना ही असंतुष्ट क्यों न हो या स्वयं अपनी पैरवी कर रहा हो, उसे अदालत में अभद्र भाषा बोलने या मुख्य न्यायाधीश के पद की गरिमा पर टिप्पणी करने का अधिकार नहीं मिल जाता। ऐसे आचरण को किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

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    हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं 10 जुलाई को इस घटना पर संयम बरतते हुए आरोपित के खिलाफ तत्काल कोई कार्रवाई करने का प्रस्ताव नहीं रखा था। ऐसे में जमानत पर निर्णय लेते समय भी उसी संतुलित दृष्टिकोण को अपनाया जाना चाहिए।

    अदालत ने कहा कि आरोपितों के खिलाफ जांच पूरी हो चुकी है और पुलिस को अब उनकी हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता नहीं है। जिन धाराओं में मामला दर्ज है, उनमें अधिकतम दो वर्ष की सजा का प्रविधान है।

    अदालत ने बताया क्यों न्यायोचित नहीं है निरंतर हिरासत

    आरोपितों के स्थायी पते सत्यापित हैं और ऐसा कोई आधार नहीं है कि वे फरार होंगे, साक्ष्यों से छेड़छाड़ करेंगे या गवाहों को प्रभावित करेंगे। इसलिए उनकी निरंतर हिरासत न्यायोचित नहीं है।

    अदालत ने जमानत की शर्तों में कहा कि दोनों आरोपित जांच और ट्रायल में आवश्यकता पड़ने पर उपस्थित होंगे व भविष्य में सभी न्यायिक कार्यवाहियों के दौरान सख्त शालीनता और अदालत की गरिमा बनाए रखेंगे।

    साथ ही स्पष्ट किया कि आदेश में की गई टिप्पणियां केवल जमानत के प्रश्न तक सीमित हैं और मुकदमे के गुण-दोष को प्रभावित नहीं करेंगी।