दिल्ली में साल-दर-साल बढ़ रहा है शिकायतें खारिज होने का ग्राफ, क्यों खाली हाथ लौट रही है जनता?
दिल्ली लोकायुक्त सीमित अधिकारों और संसाधनों की कमी के कारण भ्रष्टाचार से लड़ने में बेबस है। बीते तीन साल में 1363 शिकायतें क्षेत्राधिकार से बाहर होने ...और पढ़ें
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दिल्ली लोकायुक्त सीमित अधिकारों और संसाधनों की कमी के कारण भ्रष्टाचार से लड़ने में बेबस है। इमेज एआई
HighLights
तीन साल में 1363 शिकायतें क्षेत्राधिकार से बाहर होने के कारण खारिज।
सीमित अधिकार, कमजोर कानून, संसाधनों की भारी कमी से पंगु संस्था।
सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार निरोधक संस्थाओं की आजादी पर जोर दिया।
संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। दिल्ली में जब लोकायुक्त संस्था की नींव रखी गई थी, तब मुख्य मकसद भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मजबूत जंग लड़ना था। लेकिन आज हकीकत इसके ठीक उलट है; खुद लोकायुक्त ही इस लड़ाई में बेहद बेबस और लाचार नजर आ रहा है।
सरकारी कामकाज में ईमानदारी और जवाबदेही तय करने के लिए बनी यह संस्था आज सीमित अधिकारों, कमजोर कानून और संसाधनों की भारी कमी के कारण खुद पंगु बनकर रह गई है। आलम यह है कि बीते तीन सस्ल में आई 1512 में से 1363 शिकायतें इसलिए खारिज कर दी गईं क्योंकि वो लोकायुक्त के अधिकार क्षेत्र से ही बाहर थीं।
यह आंकड़ा दिखाता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई की उम्मीद लेकर पहुंचने वाली जनता को यहां से सिर्फ निराशा ही हाथ लग रही है।
दिल्ली लोकायुक्त अधिनियम, 1995 की धारा 2(एम) के मुताबिक लोकायुक्त का दायरा सिर्फ मुख्यमंत्री, मंत्रियों, विधायकों और पार्षदों तक सीमित है। दूसरी तरफ, आम जनता को सबसे ज्यादा शिकायतें जिन अधिकारियों और कर्मचारियों से होती हैं
जैसे विभागों के अफसर, इंजीनियर, पुलिसकर्मी और सीनियर आईएएस-आईपीएस अधिकारी—वे सभी लोकायुक्त की जांच के दायरे से बाहर हैं।
नतीजतन, कई शिकायतें उनके गुण-दोष पर बात किए बिना सिर्फ क्षेत्राधिकार न होने से खारिज हो जाती हैं। जिन मामलों की जांच होती भी है, उनमें लोकायुक्त सिर्फ सिफारिश कर सकता है। इन सिफारिशों को मानना सरकार के लिए कानूनी रूप से जरूरी नहीं है।
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आंकड़े क्या कहते हैं
- 2023-24: 479 शिकायतें, 404 खारिज एवं जांच संबंधित विभाग को ट्रांसफर।
- 2024-25: 383 शिकायतें, 326 खारिज एवं जांच संबंधित विभाग को ट्रांसफर।
- 2025-26: 650 शिकायतें, 633 खारिज एवं जांच संबंधित विभाग को ट्रांसफर।
संसाधनों की भी भारी कमी
करीब ढाई करोड़ की आबादी वाली दिल्ली में लोकायुक्त के पास अपनी कोई स्वतंत्र जांच एजेंसी या पुलिस विंग नहीं है। जांच का पूरा काम फिलहाल एडिशनल चार्ज (अतिरिक्त प्रभार) वाले एक डीसीपी रैंक के निदेशक और सिर्फ एक इंस्पेक्टर रैंक के अधिकारी के भरोसे चल रहा है। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि क्या इस संस्था को जरूरी संसाधन मिले हुए हैं।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और सुधार की उम्मीद
13 जनवरी 2026 को सीपीआईएल बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि भ्रष्टाचार निरोधक संस्थाओं की आजादी और निष्पक्षता लोकतंत्र तथा कानून के राज के लिए बेहद जरूरी है। कोर्ट ने ऐसी संस्थाओं को पर्याप्त आजादी और प्रभावी वर्किंग सिस्टम देने पर जोर दिया था।
जानकारों का मानना है कि इसी आधार पर दिल्ली लोकायुक्त कानून की समीक्षा होनी चाहिए। इसमें लोकायुक्त का दायरा बढ़ाने, स्वतंत्र जांच विंग बनाने, स्टाफ की कमी दूर करने और लोकायुक्त की सिफारिशों को सख्ती से लागू करने जैसी व्यवस्था शामिल की जा सकती है।
अन्य राज्यों से सीख
कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, ओडिशा और नागालैंड जैसे राज्यों में लोकायुक्त को काफी व्यापक अधिकार मिले हैं। कुछ राज्यों में स्वतंत्र लोकायुक्त पुलिस विंग भी है, जिससे जांच निष्पक्ष और असरदार होती है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, दिल्ली भी इन मॉडलों को अपनाकर सुधार कर सकती है।
लोकायुक्त जैसी संस्था को मजबूत करना किसी दल का नहीं, बल्कि आम जनता के अधिकारों और जवाबदेही से जुड़ा मुद्दा है। यदि दिल्ली लोकायुक्त को अधिक अधिकार और संसाधन मिलते हैं, तो इससे न सिर्फ भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी, बल्कि व्यवस्था में जनता का विश्वास भी बढ़ेगा।
“राजनीतिक भ्रष्टाचार एक वैश्विक समस्या है और इससे मुक्ति आज की सबसे बड़ी जरूरत है। दिल्ली लोकायुक्त का गठन राजधानी के सार्वजनिक विभागों में भ्रष्टाचार रोकने की दिशा में एक बड़ा कदम है। लोकायुक्त अपने कर्तव्यों के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।
समय-समय पर क्षेत्राधिकार के तहत शिकायतों का निपटारा किया जाता है और सही शिकायतों पर उचित सिफारिशें संबंधित अथॉरिटी को भेजी जाती हैं।”
— जस्टिस हरीश चंद्र मिश्रा, दिल्ली लोकायुक्त, झारखंड हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश