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कागजी वादों और प्रशासनिक सुस्ती के बीच तेजी से सिकुड़ रहा है दिल्ली का सुरक्षा कवच ‘रिज’

Published: Fri, 05 Jun 2026 07:16 AM (IST)

दिल्ली रिज, अरावली पहाड़ियों का महत्वपूर्ण हिस्सा, अतिक्रमण और प्रशासनिक सुस्ती के कारण तेजी से सिकुड़ रहा है। यह दिल्ली ...और पढ़ें

रिज क्षेत्र, जिसे दिल्ली के फेफड़े भी कहा जाता है l जागरण आर्काइव

रिज क्षेत्र, जिसे दिल्ली के फेफड़े भी कहा जाता है l जागरण आर्काइव

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संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। थार मरुस्थल की तपती हवाओं और धूल के बवंडर से दिल्ली को बचाने वाली अरावली की पहाड़ियों का हिस्सा, जिसे हम दिल्ली रिज कहते हैं, आज खुद अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहा है।

एनजीटी की सख्त टिप्पणियों और अदालती फटकार के बावजूद, राजधानी की यह हरी दीवार कागजी वादों और प्रशासनिक सुस्ती के बीच तेजी से सिकुड़ती जा रही है।

कागजी सीमांकन और जमीनी हकीकत

अदालत के बार-बार दिए गए आदेशों के बावजूद, रिज एरिया का पूर्ण डिजिटल सीमांकन (जीपीएस और ड्रोन मैपिंग) आज भी अधर में लटका है। राजस्व रिकॉर्ड और वन विभाग के नक्शों में विसंगतियों का सीधा फायदा भू-माफिया उठा रहे हैं।

दक्षिणी रिज-विशेषकर छतरपुर, डेरा मंडी और भाटी माइंस के आस-पास के संवेदनशील इलाकों में स्थिति सबसे चिंताजनक है। सैटेलाइट इमेजरी साफ दर्शाती है कि सुरक्षा कवच कहे जाने वाले इस जंगल के भीतर कंक्रीट का जाल साल-दर-साल बढ़ता जा रहा है।

विकास बनाम विनाश : सेंट्रल रिज पर कुल्हाड़ी

सिर्फ बाहरी इलाके ही नहीं, बल्कि लुटियंस दिल्ली के करीब स्थित सेंट्रल रिज (सरदार पटेल मार्ग और वंदे भारत मार्ग के आस-पास का क्षेत्र) भी विकास की वेदी पर चढ़ रहा है। दिल्ली मेट्रो के फेज चार विस्तार और क्षेत्रीय रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (आरआरटीएस) जैसी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए अपरिहार्य परिस्थितियों का हवाला देकर हजारों पेड़ों को काटने की अनुमति दी गई।

प्रशासन का दावा है कि इसके बदले पूरक वनीकरण के तहत नए पौधे लगाए जा रहे हैं, लेकिन पर्यावरणविदों का कहना है कि दशकों पुराने एक मजबूत पेड़ की जगह लीची या अमलतास के छोटे पौधे कभी नहीं ले सकते।

बोर्ड की सुस्ती और घटता भूजल स्तर

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित दिल्ली रिज मैनेजमेंट बोर्ड की बैठकों में नियमितता का अभाव और सख्त निर्णयों के क्रियान्वयन में ढीलापन साफ नजर आता है। न अतिक्रमण हटाने के लिए टास्क फोर्स है और न ग्राउंड स्टाफ। इसका सीधा असर दिल्ली के गिरते भूजल स्तर पर पड़ रहा है।

रिज क्षेत्र दिल्ली का सबसे बड़ा प्राकृतिक एक्विफर (जल भृत) है, जो वर्षा के पानी को सोखकर जमीन के नीचे भेजता है। यहां बढ़ते कंक्रीटाइजेशन के कारण दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम दिल्ली का भूजल खतरनाक स्तर तक नीचे जा चुका है, जिससे आने वाले समय में पानी का बड़ा संकट खड़ा होना तय है। वैसे एलजी ने इसके पुनर्गठन को मंजूरी दे दी है।

जागरण मत 

विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर बड़े-बड़े होर्डिंग्स और पौधरोपण के सरकारी आयोजन तो अपनी जगह ठीक हैं, लेकिन दिल्ली की असली जरूरत इस प्राकृतिक सुरक्षा कवच को नो-कंस्ट्रक्शन जोन के रूप में कड़ाई से लागू करने की है। जब तक रिज मैनेजमेंट बोर्ड और वन विभाग भू-माफियाओं और अवैध कब्जों पर बुलडोजर चलाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखाएंगे, तब तक दिल्ली की यह हरी दीवार सिर्फ इतिहास के पन्नों और सरकारी फाइलों में ही सिमट कर रह जाएगी।

रिज दिल्ली के फेफड़े भी हैं और इसका एसी भी। अगर हम अरावली की इन पहाड़ियों और जंगलों को कंक्रीट में बदलते रहेंगे, तो दिल्ली का तापमान 50 डिग्री सेल्सियस के पार जाना और सर्दियों में दमघोंटू स्माग का होना एक सामान्य बात बन जाएगी। हमें फाइलों से बाहर निकलकर जमीन पर एक-एक इंच जंगल को बचाना होगा। - प्रो. सी.आर. बाबू, प्रख्यात पर्यावरणविद

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