Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    दिल्ली में कंक्रीट और शीशे की इमारतें बढ़ा रही गर्मी, घरों और दफ्तरों के अंदर 'थर्मल स्ट्रेस' जानलेवा स्तर पर 

    Updated: Wed, 03 Jun 2026 01:01 AM (IST)

    कंक्रीट और शीशे की इमारतें दिल्ली में गर्मी बढ़ा रही हैं, जिससे 'माइक्रो-थर्मल स्ट्रेस' पैदा हो रहा है। सीएसई की रिपोर्ट बताती है कि यह स्थिति स्वास्थ ...और पढ़ें

    कंक्रीट और शीशे की इमारतें दिल्ली में गर्मी बढ़ा रही हैं। (एआई से निर्मित ग्राफिक्स)

    कंक्रीट और शीशे की इमारतें दिल्ली में गर्मी बढ़ा रही हैं। (एआई से निर्मित ग्राफिक्स)

    HighLights

    1. कंक्रीट-शीशे की इमारतें गर्मी को अंदर फंसाती हैं।

    2. दिल्ली में 'माइक्रो-थर्मल स्ट्रेस' गंभीर स्वास्थ्य खतरा।

    3. पारंपरिक जल निकायों का वाष्पीकरण सिस्टम बिगड़ा।

    संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। साल दर साल बढ़ती गर्मी की वजह आधुनिक निर्माण के नाम पर खड़ी हो रही कंक्रीट और शीशे की इमारतें भी हैं। नई इमारतें चाहे वो व्यावसायिक क्षेत्रों के बड़े-बड़े ग्लास टावर हों या अनधिकृत कालोनियों के माचिस जैसे मकान ''शीशे व कंक्रीट'' के ऐसे दोषपूर्ण डिजाइन पर बन रहे हैं जो बाहरी गर्मी को अंदर ''ट्रैप'' (कैप्चर) कर लेते हैं। ऐसे में पारंपरिक वेंटिलेशन गायब होने के कारण घरों और दफ्तरों के अंदर का ''थर्मल स्ट्रेस'' जानलेवा स्तर पर पहुंच गया है, जो लोगों को गंभीर रूप से बीमार कर रहा है।

    विशेषज्ञों के हवाले से बीच बीच में सामने आती रही यह बात सेंटर फार साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) की मंगलवार को जारी नई रिपोर्ट 'मेकिंग दिल्ली हीट रेजीलिएंट' में भी बयां की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक राष्ट्रीय राजधानी का एक तिहाई हिस्सा इस समय इसी भीषण ''माइक्रो-थर्मल स्ट्रेस'' की चपेट में है, जिससे दिन और रात के तापमान का अंतर लगातार घटता जा रहा है। यह स्थिति पर्यावरण संकट के साथ-साथ बहुत बड़ा आर्थिक और मानवाधिकार संकट बन चुकी है।

    तालाबों-बावड़ियों का वाष्पीकरण सिस्टम बिगड़ा

    गर्मी और लू से निपटने के लिए अक्सर सिर्फ पेड़ लगाने (ग्रीन कवर) की बात होती है, लेकिन यह रिपोर्ट ''ब्लू इंफ्रास्ट्रक्चर'' (तालाब, बावड़ी, ड्रेनेज) को लेकर आंखें खोलने वाला नजरिया देती है। इसके अनुसार, पारंपरिक जल निकाय केवल पानी जमा करने के लिए नहीं होते थे, बल्कि वे शहर के ''लोकल कूलिंग वेंट्स'' (तापमान कम करने वाले प्राकृतिक स्रोत भी थे। लेकिन उनके चारों तरफ हुए अधाधुंध कंक्रीट निर्माण के कारण उनका नेचुरल वाष्पीकरण सिस्टम भी पूरी तरह बिगड़ चुका है जिससे ये जल स्रोत अब शहर को ठंडा करने में नाकाम साबित हो रहे हैं।

    बढ़ते तापमान से प्रभावित लोगों की संख्या ज्यादा

    सीएसई के प्रोग्राम डायरेक्टर (सस्टेनेबल हैबिटेट) रजनीश सरीन का कहना है, 'हीट एक्शन प्लान भी ऐसी कोई ठोस रणनीति पेश नहीं करते जो सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों और वहां रहने वालों की सहनशीलता या लचीलेपन को बढ़ा सके। ऐसे व्यावहारिक कदमों के अभाव में, बढ़ते तापमान से प्रभावित होने वाले लोगों की संख्या धीरे धीरे और बढ़ती जाएगी।'

    खबरें और भी

    यह भी पढ़ें- दिल्ली के हरे-भरे क्षेत्रों की रक्षा के लिए LG संधू ने रिज प्रबंधन बोर्ड के पुनर्गठन को दी मंजूरी