कुचिपुड़ी की मुद्राओं में गूंजे द्रौपदी के सवाल, जब राजसभा में सदियों बाद भी स्त्री अस्मिता की लड़ाई दिखी बरकरार
दिल्ली में नृत्यांगना स्वाति सोमनाथ द्वारा प्रस्तुत कुचिपुड़ी नृत्य नाटिका 'द्रौपदी' ने स्त्री अस्मिता, गरिमा और प्रतिरोध के सवालों को ...और पढ़ें

डॉ. अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित द्रौपदी कार्यक्रम में कुचिपुड़ी नृत्य नाटिका में द्रौपदी चीर हरण का भावपूर्ण मंचन करती स्वाति सोमनाथ। चंद्र प्रकाश मिश्र
HighLights
नृत्यांगना स्वाति सोमनाथ ने द्रौपदी को नया रूप दिया।
नृत्य नाटिका ने स्त्री अस्तित्व, गरिमा और प्रतिरोध को दर्शाया।
द्रौपदी ने अन्याय के सामने सवाल बनकर चेतना जगाई।
शशि ठाकुर, नई दिल्ली। यह केवल एक नृत्य नाटिका नहीं थी, बल्कि शरीर की लय लोच से निकलते महिला अस्मिता के सवाल थे, जो सदियों बाद भी मौजूं हैं। यह केवल द्रौपदी का जीवन चरित्र नहीं, बल्कि कला साधना में स्त्री देह के सम्मान और उसके अधिकार की मांग थी। बृहस्पतिवार, 22 अक्टूबर की शाम डाॅ. आंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर के भीम सभागार के मंच पर कुचिपुड़ी नृत्य की मुद्राओं, भावों और लय के साथ ये सवाल राजसभा में डटे थे।
संवेदनशीलता और गहराई सबको झकझोर गई
कुचिपुड़ी नृत्य आधारित नाटिका द्रौपदी ने महाभारत के समय से लेकर अब तक स्त्री अस्तित्व गरिमा, अन्याय और प्रतिरोध के सवालों को बरकरार रखा। द्रौपदी की भूमिका को नृत्यांगना स्वाति सोमनाथ ने नए रूप में वह भव्यता और गरिमा दी, जिसकी वह हकदार सदियों से थीं। विशेष बात ये भी रही कि स्वाति ने खुद इसकी परिकल्पना और कोरियोग्राफी की थी तो नृत्य नाटिका में भी वही संवेदनशीलता, गहराई सबको झकझोर गई।

सवालों के जरिये देखने का अवसर दिया
मदर अर्थ, बर्थ ऑफ द्रौपदी, द्रौपदी वस्त्रहरण, ‘द्रौपदीज रिवेंज और महाप्रस्थानम जैसे पांच प्रसंगों में पूरा द्रौपदी चरित्र और उसके सवालों के द्वंद्व बखूबी थे। द्रौपदी केवल अपमान सहने वाली स्त्री के रूप में नहीं, बल्कि अन्याय के सामने सवाल बनकर खड़ी होने वाली चेतना के रूप में उभरती हैं। साहित्य अकादमी पुरस्कार से पुरस्कृत तेलुगु लेखिका वोल्गा की लिखी पटकथा में द्रौपदी के साथ हुई घटनाओं को आगे ले जाकर उसके निर्णयों और सवालों के जरिये देखने का अवसर दिया।
कथा अंतिम हिमालय यात्रा तक पहुंची
वसुंधरा यानी धरती माता के रूप में शुरुआत करने वाली कथा यज्ञ की अग्नि से द्रौपदी के जन्म तक पहुंचती है। इसके बाद राजसभा में वस्त्रहरण का प्रसंग आता है, जहां अपमान के बीच भी द्रौपदी न्याय की मांग करना नहीं छोड़ती। आगे अपमान प्रतिज्ञा में बदलता है और कथा उसकी अंतिम हिमालय यात्रा तक पहुंचती है।

द्रौपदी ने सवाल उठाए और पूछना बंद नहीं किया
स्वाति सोमनाथ कहती हैं कि द्रौपदी को अक्सर उस घटना के लिए याद किया जाता है, जो उसके साथ हुई थी। इस प्रस्तुति के माध्यम से यह दिखाने की कोशिश की गई कि उसने उस अन्याय के जवाब में क्या किया। द्रौपदी ने अपने समय के सबसे शक्तिशाली पुरुषों के सामने सवाल उठाए और पूछना बंद नहीं किया।

प्रस्तुति के भाव पक्ष को संगीत ने दी मजबूती
प्रस्तुति के भाव पक्ष को संगीत ने भी मजबूती दी। लगातार 37 घंटे वायलिन बजाने का रिकार्ड रखने वाले गरिमेला गोपालकृष्ण ने संगीत तैयार किया, जबकि तबला वादक व संगीतकार एन. सुरेश प्रसाद ने संगीत निर्देशन किया। डी. मेहर प्रभाकर, लोका चंद्रशेखर रेड्डी, उप्पाडा गीतिका और कोर्रा बलराम सहित अन्य कलाकारों ने भी अपनी प्रस्तुतियों से नृत्य नाटिका को आकार दिया।
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