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    दिल्ली के नजफगढ़ की गौरवगाथा: 1857 की जंग से लेकर मुगल सैन्य ठिकाने तक, झील और विरासत के खोते निशान की कहानी

    Updated: Sat, 02 May 2026 06:49 PM (IST)

    यह लेख दिल्ली के नजफगढ़ के समृद्ध इतिहास का वर्णन करता है, जिसमें मुगल काल के मसूदाबाद और नजफ खान के सैन्य ठिकाने से लेकर 1857 के विद्रोह में इसकी भूम ...और पढ़ें

    जहां छोटे किलेबंद कस्बों और उनके प्रवेश द्वार पर परंपरा का उल्लेख मिलता है।

    जहां छोटे किलेबंद कस्बों और उनके प्रवेश द्वार पर परंपरा का उल्लेख मिलता है।

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    प्रियंका दुबे मेहता, नई दिल्ली। नजफगढ़ दिल्ली के इतिहास का वह अध्याय है जिसके बिना दिल्ली का ऐतिहासिक जिक्र अधूरा रहेगा। जहां हार-जीत के, 1857 का विद्रोह के, सैनिकों की घेरेबंदी ब्रिटिश हुकूमत की जीत के किस्से दर्ज हैं।

    जो कभी मुगल सिपहसालार की रणनीति, युद्धनीति और पराक्रम का चमकता सितारा बना, तो कभी भारतीय सैनिकों की बेबसी और पराजय का गवाह बना। नजफखान का नजफगढ़ कहें या फिर अतीत का मसूदाबाद, इलाका अपने अंदर कई घटनाएं छिपाए आज भी अपनी ऐतिहासिक विरासत की सुध लेने की गुहार लगाता जान पड़ता है।

    हाल ही में नगर निगम से इसके दिल्ली गेट के इलाके के पुनरुद्धार और संरक्षण की बात की तो बरबस ही इसका इतिहास अपनी समृद्धि की गाथाएं सुनाता प्रतीत होता है। सबरंग के अंक में हम गांवों की भी ऐतिहासिक कहानियां प्रस्तुत कर रहे हैं, पिछले सप्ताह आपने नरेला को पढ़ा और आज आपको नजफगढ़ की गौरवगाथा से रूबरू कराते हैं...

    प्रवेश द्वार पर परंपरा का उल्लेख

    दिल्ली गेट के नाम से पूरे देश में कई गेट हैं। हम दिल्ली के दिल्ली गेट की बात करते हैं तो शाहजहांनाबाद यानी कि पुरानी दिल्ली का खाका दिमाग में घूम जाता है लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि नजफगढ़ के इलाके में था। जी हां, यह कभी दिल्ली का प्रमुख प्रवेश द्वार हुआ करता था जिसे सैन्य केंद्र बनाते समय नजफ खान ने बनवाया था। इतिहासकार नारायणी गुप्ता की किताब में इसका जिक्र मिलता है। उनकी किताब में नजफगढ़ को मुगलकालीन परगना और बाद में विकसित सीमावर्ती कस्बे के रूप में समझाया गया है, जहां छोटे किलेबंद कस्बों और उनके प्रवेश द्वार पर परंपरा का उल्लेख मिलता है।

    किले का वजूद लगभग खत्म हो गया

    इसमें नजफगढ़ को ऐसे क्षेत्रों में रखा गया है जहां शहरी किलेबंदी बहुत सीमित थी और संरचनाएं समय के साथ बदलती रहीं। वक्त के साथ किले का वजूद लगभग खत्म हो गया और खड़ा रह गया दिल्ली गेट। धीरे-धीरे उसके आसपास बाजार, दुकानें, सड़कें और घनी आबादी बसती चली गई। आज यह गेट नजफगढ़ मेन मार्केट और पुराने शहर हिस्से का प्रतीक माना जाता है। जहां कभी सैनिक और घोड़े गुजरते थे, वहीं अब ई-रिक्शा, बाइक, कारें, सब्जी वाले, खरीदार और रोजमर्रा की चहलपहल दिखाई देती है।

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    प्रथम विश्व युद्ध में भाग लिया

    पुराने स्थापत्य के निशान अब भी इसके मेहराबों और लाहौरी ईंटों में देखे जा सकते हैं, लेकिन लंबे समय तक रखरखाव की कमी, ट्रैफिक दबाव और अव्यवस्थित निर्माण के कारण इसकी हालत जर्जर होती गई। कई स्थानीय लोग इसे केवल रास्ता मानते हैं, जबकि इतिहासकार इसे विरासत स्मारक मानते हैं। एक पुरातत्वविद ने हाल ही में यहां पर कुछ ऐतिहासिक महत्व की साइटें भी तलाशी हैं जहां एक पट्टिका पर सफेद संगमरमर में उन स्थानीय लोगों की याद में शिलालेख दर्ज हैं, जिन्होंने प्रथम विश्व युद्ध में भाग लिया था, जिनमें वे लोग भी शामिल हैं जिन्होंने अपने प्राण गंवाए थे।

    नाहरगढ़ नहीं, मसूदाबाद था नाम

    कई लोगों ने समय समय पर नजफगढ़ के नाम का जिक्र करते हुए इतिहास का हवाला दिया कि इसका नाम नाहरगढ़ था लेकिन इसका जिक्र किसी ऐतिहासिक दस्तावेज में नहीं मिलता। असल में स्वतंत्रता सेनानी नाहर सिंह के नाम पर इसके नामकरण की बात चलती रही है ऐसे में कुछ लोग कहते हैं कि 18वीं शताब्दी में इसका नाम नाहरगढ़ था। नजफगढ़ पहले एक परगना था, जिसका नाम था मसूदाबाद।

    इसी नाम से इसका जिक्र अबुल फजल की 'आइने-अकबरी' में मिलता है। जहां लिखा गया है कि मसूदाबाद दिल्ली के एक परगना यानी कि एक प्रशासनिक इकाई के रूप में मौजूद था। नजफगढ़ के पुराने नाम मसूदाबाद का जिक्र इतिहासकार इरफान हबीब की किताब 'एटलस आफ द मुगल एंपायर' में भी मिलता है। इलाका भले ही एक प्रवेश द्वार के तौर पर था लेकिन 1857 की नजफगढ़ की लड़ाई से पहले इसे साधारण इलाके के तौर पर ही देखा जाता था।

    इनाम के रूप में मिला नजफगढ़

    इसके मौजूदा नाम की कहानी कुछ यूं है कि मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय ने अपने सिपहसालार नजफ खान यह परगना भेंट स्वरूप गिया था। नजफगढ़ की जागीर कभी इनाम के रूप में दी गई थी। असल में नजफ खान ने 1764 के बक्सर युद्ध में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को पीछे धकेलने में मीर कासिम की सहायता की थी। उस युद्ध में उन्हें हार का सामना करना पड़ा लेकिन शाह आलम उनकी प्रतिभा के कायल हो गए और तब उन्हें लगा कि दिल्ली को फिर से हासिल करने के इस असंभव कार्य में नजफ खान ही उनकी मदद कर सकते थे।

    ऐसे में नजफखान ने रणनीति बनाई और दिल्ली फिर से हासिल की। इस बारे में इतिहासकार विलियम डेलरिंपल ने अपनी पुस्तक 'एनार्की' में जिक्र किया है कि शाह आलम और नजफ खान ने नजफगढ़ के पास सराय आलम चंद में एक महीने तक शिविर लगाकर युद्ध की रणनीति बनाई और 1772 में मुगल बादशाह की सेना शाहजहांनाबाद के खंडहरों पर स्थित दिल्ली गेट से होकर शहर में घुसी और राजधानी पर फिर से नियंत्रण प्राप्त किया।

    इस जीत के ईनाम के तौर पर मसूदाबाद की जागीर बादशाह ने नजफ खान को दी। जाहिर है कि इस परगना का नाम नजफखान के नाम पर ही नजफगढ़ पड़ा। इतिहासकार नारायणी गुप्ता ने अपनी किताब 'दिल्ली - इट्स मान्यूमेंट्स एंड हिस्ट्री' में उल्लेख किया है कि नजफगढ़ शहर नजफखान की जागीर था जिसकी वजह से इसका नाम नजफगढ़ पड़ा।

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    नजफखान की हवेली पर बना है पुलिस स्टेशन

    जब दिल्ली पर बाहरी ताकतों का खतरा बढ़ने लगा तो मिर्जा नजफ खान ने 1770 के आसपास दिल्ली की पश्चिमी सीमा की सुरक्षा के लिए मसूदाबाद में एक किलेबंद सैन्य चौकी विकसित की। यह कोई बड़ा शहर या शाही किला नहीं था, बल्कि एक मजबूत सैन्य ठिकाना था। इसी सैन्य गढ़ और उनके प्रशासनिक नियंत्रण के कारण मसूदाबाद क्षेत्र की पहचान बदलने लगी। धीरे-धीरे इसे नजफगढ़ कहा जाने लगा।

    माना जाता है कि यह नामकरण नजफ खान और वहां बने गढ़ यानी उस किलेबंद स्थान से मिलकर हुआ। नजफ आज का पुलिस स्टेशन नजफ खान की हवेली पर बना है। इसका जिक्र नायारणी गुप्ता ने अपनी किताब में भी किया है कि नजफगढ़ का पुलिस स्टेशन नजफखान का पुराना महल है।

    हाल ही में स्थल के दौरे के दौरान निगम अधिकारियों ने पुलिस स्टेशन के पास एक पुराने कुएं और एक मस्जिद की पहचान की। हालांकि, यह अब भी स्पष्ट नहीं है कि इनमें से कौन-सी संरचना कभी नजफ खान के किले और निवास के रूप में इस्तेमाल होती थी।

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    1857 का विद्रोह और नजफगढ़ की झील

    1857 में नजफगढ़ की लड़ाई की शुरुआत उस समय हुई जब दिल्ली में ब्रिटिश शासन के खिलाफ बड़ा विद्रोह चल रहा था और विद्रोही सैनिक दिल्ली को अपने नियंत्रण में रखने की कोशिश कर रहे थे। दिल्ली के अंदर और बाहर छोटे-छोटे सैनिक दल सक्रिय थे। एक विद्रोही टुकड़ी नजफगढ़ झील के आसपास के क्षेत्र में इकट्ठा हुई ताकि वह दिल्ली की पश्चिमी दिशा को सुरक्षित रख सके और जरूरत पड़ने पर हरियाणा की तरफ से मदद या पीछे हटने का रास्ता इस्तेमाल कर सके।

    उधर, ब्रिटिश सेना जो दिल्ली की घेराबंदी कर रही थी, उसको इस गतिविधि की जानकारी मिली। उन्होंने तय किया कि इस विद्रोही टुकड़ी पर अचानक हमला किया जाए ताकि दिल्ली के बाहर उनकी पकड़ कमजोर हो जाए। 25 अगस्त 1857 को जनरल जान निकोल्सन के नेतृत्व में ब्रिटिश सैनिकों ने नजफगढ़ झील और आसपास के दलदली इलाके में मौजूद विद्रोही शिविर पर हमला कर दिया।

    इलाके की जमीन उस समय पानी और कीचड़ से भरी हुई थी, जिससे विद्रोही सैनिक ठीक से संगठित नहीं हो पाए। ब्रिटिश सेना बेहतर योजना और अनुशासन के साथ आगे बढ़ी और अचानक हुए इस हमले में विद्रोही सेना को भारी नुकसान हुआ। कई सैनिक मारे गए और बाकी भागकर पीछे हट गए।

    इस लड़ाई के बाद ब्रिटिश सेना को दिल्ली की घेराबंदी और मजबूत करने का मौका मिला और अंत में दिल्ली पर उनका नियंत्रण और भी मजबूत हो गया। अलेक्जेंडर लेवेलिन ने अपनी किताब द 'सीज आफ दिल्ली' में लिखा है कि भारी बारिश, भूख और हैजा के प्रकोप ने दोनों पक्षों के सैनिकों का मनोबल गिरा दिया।

    जब सैनिक हथियार छोड़कर नजफगढ़ झील के पुल पर आराम कर रहे थे, उसी वक्त जान निकोल्सन ने हमला कर दिया। हिस्ट्री आफ इंडियन म्यूटिनी में जार्ज ब्रूस मालसन ने भी लिखा है कि सेना थकी हुई थी और उसकी युद्ध क्षमता कमजोर हो गई थी।

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    नाला बनकर रह गई एक खूबसूरत नदी

    नजफगढ़ नाले का नाम आते ही मन खिन्न हो जाता है, लाजमी भी है क्योंकि यह नाला दिल्ली को, यमुना को प्रदूषित कर रहा लेकिन क्या आपको पता है कि इस नाले के इतिहास की गहराइयों में एक खूबसूरत नदी बहती है।

    जी हां, इस नदी का नाम है साहिबी नदी जो अरावली पहाड़ियों से निकलती है और प्राकृतिक ढलान के कारण राजस्थान से होते हुए हरियाणा में प्रवेश करती थी। जब यह दिल्ली के समतल इलाके नजफगढ़ में उतरती थी और बरसात के मौसम में उसका बहाव एक निश्चित चैनल में नहीं रह पाता था और वह पूरे नजफगढ़ मैदान में फैलकर एक झील की शक्ल ले लेता था।

    पहले यह पानी प्राकृतिक रूप से धीरे-धीरे फैलकर मिट्टी में समा जाता था या आसपास के छोटे-छोटे नालों के जरिए निकलता रहता था लेकिन जब दिल्ली में बाढ़ की समस्या बढ़ने लगी तो पानी को नियंत्रित करने की कोशिश की गई और झील को यमुना नदी से जोड़ने का फैसला किया गया।

    इसके लिए एक कृत्रिम चैनल बनाया गया जिससे साहिबी नदी का अतिरिक्त पानी सीधे यमुना की तरफ जाने लगा। धीरे-धीरे इस हस्तक्षेप के कारण नजफगढ़ झील का प्राकृतिक फैलाव खत्म हो गया, झील का अस्तित्व मिट गया और बन गया नजफगढ़ ड्रेन।

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