यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Mar 26, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
इतिहास गवाह है राष्ट्रपति भवन में हर जगह दिखती है राष्ट्रपिता की छवि, जानें अन्य रोचक बातें
1911 में अंग्रेजों ने दिल्ली दरबार में अपनी राजधानी कलकत्ता से दिल्ली बदलने पर विचार किया। वास्तव में इसकी वजह थी बंगाल में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की आक्रामकता। अंग्रेज प्रबल होती देशभक्ति की भावना से घबरा गए थे। दिल्ली मुगल शासन का केंद्र बिंदु थी।

नई दिल्ली, अजय सिंह। 1911 में अंग्रेजों ने दिल्ली दरबार में अपनी राजधानी कलकत्ता से दिल्ली बदलने पर विचार किया। वास्तव में इसकी वजह थी बंगाल में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की आक्रामकता। अंग्रेज प्रबल होती देशभक्ति की भावना से घबरा गए थे। दिल्ली मुगल शासन का केंद्र बिंदु थी। लिहाजा अंग्रेजी सत्ता का केंद्र बनने की कई आधारभूत सुविधाएं दिल्ली में मौजूद थीं। इसके साथ यह कल्पना भी हुई कि एक ऐसा वायसराय हाउस हो, जो ब्रिटिश साम्राज्य का सच्चा प्रतीक हो। इस परिकल्पना में एक दंभ भी था। ब्रिटिश हुकूमत, जिसके राज में सूर्य अस्त नहीं होता था, उसका प्रतीक तो भव्य ही होना चाहिए। इस बीच प्रथम विश्व युद्ध के चलते भवन बनने में देर हुई। हालांकि उस युद्ध के बाद ब्रिटिश हुकूमत का सूर्य अस्ताचल की तरफ बढ़ने लगा था।
भारत की कला और शिल्पकारी की बुनियाद
भारत में स्वाधीनता के बढ़ते आंदोलन और अंतरराष्ट्रीय दबाव ने यह बात साफ कर दी थी कि विदेशी हुकूमत भारत में ज्यादा दिन नहीं चल पाएगी। इन घटनाक्रमों के बीच वायसराय हाउस यानी राष्ट्रपति भवन के निर्माण का कार्य आरंभ हुआ। 1929 में जब लार्ड इरविन ने इस भवन में पैर रखा तो इस भवन की आकृति बहुत कुछ भारत की कला और शिल्पकारी की बुनियाद पर थी। सांची के स्तूप का गुंबद और चारबाग शैली के बागान एक नई कथा कह रहे थे। दरअसल इस भवन का भारतीयकरण हो चुका था। अंतर सिर्फ यह था कि इसमें रहने वाले अंग्रेज थे।
महात्मा गांधी और राष्ट्रपति भवन का एक अजीब भावनात्मक रिश्ता रहा।
गांधी ने पहली बार में नहीं किया था स्वीकार
पहली नजर में गांधी जी को इस भवन की भव्यता और विशालता प्रभावित नहीं कर सकी। उनका मानना था कि जब जनता झुग्गी और झोपड़ी में रह रही हो तो शासक वर्ग का विशाल भवनों में रहना एक विकृति है। गांधी जी के लिए इस विकृति को स्वीकार करना असहज था। कई बार उन्होंने ऐसे उद्गार भी व्यक्त किए। पर इसके साथ-साथ गांधी जी को राजनीति में इस भवन (उस वक्त वायसराय हाउस) की अपरिहार्यता का भी एहसास था। लार्ड इरविन से यहां मिलने वो कई बार आए। गांधी-इरविन पैक्ट भी हुआ। यही वो काल था जब चर्चिल ने गांधी जी के वायसराय हाउस आने पर कटाक्ष किया और उन्हें ‘हाफ नैकेड फकीर’ की संज्ञा दी।
माउंटबेटन ने स्वयं जाकर गांधी से की थी बात
गांधी जी की मुलाकात बाद के वायसरायों से भी होती रही थी पर उनका सबसे महत्वपूर्ण संबंध रहा लार्ड माउंटबेटन और लेडी माउंटबेटन से। ऐतिहासिक दस्तावेज माउंटबेटनपेपर्स के हिसाब से माउंटबेटन दंपति और गांधी जी के बीच परस्पर स्नेह साफ दिखता है। दरअसल तीन जून, 1947 को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली और माउंटबेटन ने भारत को स्वतंत्र करने की घोषणा की। इसके साथ ही साथ जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, बलदेव सिंह और मोहम्मद अली जिन्ना ने रेडियो के जरिए अपना संदेश दिया। सभी ने अपनी-अपनी तरह से इस घोषणा का स्वागत किया पर माउंटबेटन को सबसे बड़ी चिंता थी महात्मा गांधी की प्रतिक्रिया की। गांधी जी अपने मौनवास पर थे। लिहाजा माउंटबेटन ने स्वयं जाकर गांधी जी को पूरी परिस्थिति समझाई। उनके चेहरे पर दर्द व अवसाद की लकीरें साफ थीं।
विभाजन के वक्त हुए थे दंगे
गांधी जी को पूरा एहसास था कि स्वतंत्रता के बाद देश-विभाजन की प्रक्रिया की असीमित सामाजिक कीमत होगी। भारत में जगह-जगह दंगे शुरू हो गए थे। दिल्ली के आस-पास कई जगह दंगे होने लगे थे। जिस तरह से देश का विभाजन हो रहा था, उससे नि:संदेह गांधी जी क्षुब्ध थे पर उनको हकीकत का भी अंदाजा था। उनके अपने प्रयास जिन्ना को मनाने में विफल हो गए थे। इसी मौन व्रत के दौरान उन्होंने यह साफ संदेश दे दिया था कि वो माउंटबेटन को बंटवारे का जिम्मेदार नहीं मानते। उनके हिसाब से माउंटबेटन के सार्थक प्रयास जिन्ना के हठधर्मिता के आगे विफल हुए। यह पहला मौका था जब गांधी जी ने परोक्ष रूप से स्वीकारा कि अविभाजित भारत की अंदरूनी राजनीति ही विभाजन का कारण है। माउंटबेटन के गवर्नर-जनरल बनने के बाद यह भवन गवर्नमेंट हाउस के रूप में जाना जाने लगा। इस बीच माउंटबेटन को रानी विक्टोरिया की शादी में इंग्लैंड जाना पड़ा और गवर्नर-जनरल का कार्य संभाला सी. राजगोपालाचारी ने।
हर कक्ष में लगी है गांधी की प्रतिमा या पेंटिंग
स्वतंत्र भारत में गांधी जी की व्यापकता इस भवन में समाती रही। मिसाल के तौर पर राष्ट्रपति भवन के अंदर घूमने वालों का ध्यान इस तरफ बरबस आकर्षित होता है कि एडविन लुटियंस के बस्ट के सामने उनकी आदमकद मूर्ति है। लुटियंस ने इस भवन को भले ही मूर्त रूप दिया हो पर आज इस भवन में आत्मा गांधी जी की है। लगभग हर महत्वपूर्ण कक्ष में गांधी जी की प्रतिमा या पेंटिंग मौजूद है। राष्ट्रपति के निजी आफिस व नार्थ ड्राइंग रूम में भी उनकी प्रतिमा है। दरबार हाल, बैक्वेट हाल व स्टेट कारिडार में भी उनका चित्र है।
धरोहर को सहेजने की कोशिश
भवन का म्यूजियम राष्ट्र की धरोहर को संजोने का एक उत्कृष्ट केंद्र है। यहां एक गांधी इंक्लोजर है जिसमें गांधी जी का काता हुआ सूत, उनकी अंतिम यात्रा के दौरान चढ़ाए हुए कुछ फूल भी रखे हुए हैं। संभवत: भावी पीढ़ी को इस महामानव की याद दिलाने के लिए। यही नहीं तकनीकी का इस्तेमाल करके एक ऐसा सेट बनाया गया है जिसमें गांधी जी की दांडी यात्रा दिखाई जाती है और कोई भी व्यक्ति गांधी जी के साथ-साथ इस यात्रा में चल सकता है।
पोलिश कलाकार की पेंटिंग द ईस्ट
इसी तरह राष्ट्रपति भवन सांस्कृतिक केंद्र में एक पेंटिंग है, जिसका नाम ‘द ईस्ट’ है। इस पेंटिंग को बनाने वाले पोलिश कलाकार फेलिकस टोपोल्सकी हैं। मूलत: यह पेंटिंग 1946 में बनी थी। दिलचस्प यह है कि इस पेंटिंग में गांधी जी की हत्या करते हुए लगभग उसी तरह दिखाया है जैसे 30 जनवरी, 1948 को हुआ था। गांधी जी को गोली लगने और अपने हाथ से दो लड़कियों (मनुबेन और सुशीला नायर)का सहारा लेते हुए चित्रण किया गया है। यह पेंटिंग गांधी जी की हत्या से लगभग दो साल पहले बनी थी। 1948 में टोपोल्सकी ने इस पेंटिंग को फिर से बनाया, जो आज म्यूजियम में मौजूद है। क्या पेंटर को इस घटना का अंदेशा था? यह प्रश्न एक अनबूझ पहेली सा है। टोपोल्सकी ने कभी भी इसका जबाब नहीं दिया। अन्य ऐतिहासिक दस्तावेज भी यह बात साफ नहीं करते हैं कि पेंटर को गांधी जी की हत्या का पूर्वाभास था या कुछ और। पेंटिंग देखकर यह जरूर लगता है कि टोपोल्सकी एक बेहद संवेदनशील व्यक्ति थे जिन्होंने कई महीने गांधी जी को नजदीक से देखने के बाद इसे बनाया था। जाहिर है मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य और गांधी जी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर ही उन्होंने इस पेंटिंग को बनाया, जो बाद में सत्य के बेहद करीब था।
इमारत भारतीय गणतंत्र का प्रतीक
1948 के बाद भारतीय गवर्नर-जनरल और राष्ट्रपतियों ने क्रमश: इस भवन को महात्मा गांधी के जीवन-दर्शन व मूल्यों से संवारा। पहले राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद से लेकर वर्तमान राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने राष्ट्रपति भवन के वातावरण में गांधी जी की धरोहर को न सिर्फ सहेजा है बल्कि समृद्ध भी किया है। यह भवन जिसके निर्माण के मंसूबे में किसी समय साम्राज्यवाद का दंश और अहंकार था, आज एक ऐसी इमारत है जो भारतीय गणतंत्र का प्रतीक चिन्ह है।
(लेखक राष्ट्रपति के प्रेस सचिव हैं)

