क्या AAP ने खो दिया अपना युवा पोस्टर बॉय? राघव चड्ढा के जाने से बढ़ी चिंता
आम आदमी पार्टी ने राघव चड्ढा को राज्यसभा में उप-नेता पद से हटा दिया है। यह सिर्फ एक प्रशासनिक फेरबदल नहीं, बल्कि 'आप' और चड्ढा के बीच बढ़ती दूरी का सं ...और पढ़ें
HighLights
राघव चड्ढा को राज्यसभा उप-नेता पद से हटाया गया
यह आप और चड्ढा के बीच बढ़ती दूरी का संकेत
अनुशासनहीनता, व्यक्तिगत ब्रांडिंग, भाजपा से नजदीकी मुख्य कारण
संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। यह कहानी किसी राजनीतिक फिल्म के क्लाइमेक्स जैसी लगती है, जहां एक दौर में 'चाणक्य' माने जाने वाला सिपहासालार अचानक हाशिए पर धकेल दिया जाता है।
Raghav Chadha को राज्यसभा में उप-नेता के पद से हटाना महज एक प्रशासनिक फेरबदल नहीं, बल्कि आम आदमी पार्टी (AAP) और उसके सबसे ग्लैमरस चेहरे के बीच बढ़ती गहरी दरार का आधिकारिक एलान है।
क्या यह 'अलगाव' की शुरुआत है?
राजनीतिक पंडितों के अनुसार, यह फैसला अचानक नहीं लिया गया है। इसके पीछे की रणनीति को इन तीन नजरियों से देखा जा सकता है: -
- अनुशासन का डंडा : पार्टी ने यह पद छीनकर अन्य नेताओं को स्पष्ट संदेश दिया है कि 'व्यक्ति' से बड़ी 'पार्टी' है।
- भरोसे का संकट : केजरीवाल की राजनीति 'भरोसे' पर टिकी है। राघव की चुप्पी ने उस भरोसे की नींव हिला दी।
- भविष्य की राह : राघव का पार्टी के कार्यक्रमों (विशेषकर दिल्ली चुनाव के बाद) से गायब रहना संकेत देता है कि वह खुद भी अब नई राह तलाश रहे हैं।
राजनीतिक जानकारों की मानें तो राघव चड्ढा को पद से हटाना 'आप' के लिए एक बड़ा जोखिम भी हो सकता है। राघव न केवल एक कुशल रणनीतिकार हैं, बल्कि युवाओं के बीच पार्टी का एक बड़ा चेहरा भी रहे हैं। फिलहाल, दिल्ली के गलियारों में चर्चा यही है कि 'पार्टी के नाम और निशान से दूरी, अब पद की कुर्सी पर पड़ गई है भारी।'
'खास' से 'आम' बनने तक के सफर का मुख्य कारण
राघव चड्ढा की कुर्सी जाने के पीछे केवल एक घटना नहीं, बल्कि पिछले कुछ महीनों से जमा हो रहा असंतोष है। इसके प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:
1. पार्टी के सुख-दुख में नहीं है साथ
जब शराब घोटाले में अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को ट्रायल कोर्ट से राहत मिली, तो पूरी पार्टी इसे 'ईमानदारी का सर्टिफिकेट' मानकर जश्न मना रही थी। लेकिन राघव ने न तो जश्न में शिरकत की और न ही एक्स पर कोई पोस्ट डाला। इस चुप्पी ने पार्टी आलाकमान को यह संदेश दिया कि राघव अब पार्टी के सुख-दुख के साथ भावनात्मक रूप से नहीं जुड़े हैं।
2. 'ब्रांड आप' बनाम 'ब्रांड राघव'
पार्टी के भीतर यह धारणा प्रबल हो गई थी कि राघव अब आम आदमी पार्टी की नीतियों को आगे बढ़ाने के बजाय अपनी व्यक्तिगत ब्रांडिंग पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। उनके वीडियो और पोस्ट से पार्टी का झंडा, नाम और चुनाव चिह्न गायब होने लगा था। राज्यसभा में उनके मुद्दे पार्टी की लाइन के बजाय उनकी अपनी छवि चमकाने वाले होते थे।
3. संसद में उठाए मुद्दो पर केंद्र का एक्शन
कभी पंजाब के 'अघोषित मुख्यमंत्री' कहे जाने वाले राघव का झुकाव अब केंद्र सरकार की ओर दिखने लगा था। जब भी राघव सदन में कोई मुद्दा उठाते और सरकार उस पर तुरंत एक्शन लेती। राघव की अति- प्रसन्नता ने आप के भीतर संदेह पैदा किया। पार्टी को लगा कि उनके सबसे तेज-तर्रार सांसद अब भारतीय जनता पार्टी के साथ पींगे बढ़ा रहे हैं।