कोलंबस की गलती से मुगलों के बैन तक: बेहद दिलचस्प है भारत में तंबाकू पहुंचने की कहानी
तंबाकू का भारत पहुंचने का सफर कोलंबस की नई दुनिया की खोज से जुड़ा है। मुगल काल के दौरान तंबाकू पर प्रतिबंध भी लगा, लेकिन इसकी लोकप्रियता कम नहीं हुई।

भारत कैसे पहुंचा तंबाकू? (AI Generated Image)
HighLights
कोलंबस ने अमेरिका में तंबाकू की खोज की थी
पुर्तगालियों ने 1508 में तंबाकू को भारत पहुंचाया
जहांगीर ने 1617 में तंबाकू पर शाही प्रतिबंध लगाया
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। तंबाकू का इस्तेमाल आज पूरे भारत में खूब किया जाता है। बिड़ी, सिगरेट से लेकर मिश्री और जर्दा तक, तंबाकू हर वर्ग के लोगों तक पहुंच चुका है, लेकिन क्या आप जानते हैं तंबाकू आखिर भारत कैसे पहुंचा?
इसके पीछे की कहानी काफी दिलचस्प है और 15वीं शताब्दी में अमेरिका की खोज से जुड़ी है। आइए जानें तंबाकू के भारत पहुंचने की कहानी।
अमेरिका से शुरू हुआ तंबाकू का सफर

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तंबाकू की इतिहास को लेकर काउंट कॉर्टी, हरबर्ट जोसेफ स्पिंडन, जे.एच. मानस, क्रिक बैकहोम और अर्नेस्ट एल. विंडर जैसे विद्वानों का मानना है कि तंबाकू मूल रूप से अमेरिकी है।
इस सफर की शुरुआत 3 अगस्त 1492 को हुई, जब क्रिस्टोफर कोलंबस अपने 120 साथियों के साथ दुनिया की खोज पर निकले। जब कोलंबस एक द्वीप पर पहुंचे, तो उन्होंने वहां देखा कि लोग हाथों में कुछ सूखी पत्तियां लिए हुए थे, जिन्हें वे जलते हुए कोयलों से सुलगाते थे और उससे खुद को सुगंधित करते थे।
पत्तियों को जलाए रखने के लिए वे उन्हें बार-बार मुंह में रखते, फूंक मारते और धुआं अंदर खींचते थे। इसे देख कोलंबस अमेरिका को भारत समझने की भूल कर बैठे थे, क्योंकि भारत में गांजा और भांग का इस्तेमाल सदियों से हो रहा था, जिसका वर्णन धार्मिक ग्रंथों में भी मिलता है। हालांकि, वे भारत नहीं, अमेरिका पहुंचे थे। यह किस्सा इस बात का सबूत है कि तंबाकू मूल रूप से अमेरिका की ही देन है।
पुर्तगालियों के जरिए भारत में एंट्री

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कोलंबस की इस खोज के बाद पुर्तगालियों ने तंबाकू और भारत दोनों को ढूंढ निकाला। 20 मई 1498 को जब वास्को डी गामा कोझिकोड पहुंचे, तो उन्होंने दूसरे पुर्तगालियों के लिए रास्ता खोल दिया। इसके बाद, दक्षिण अमेरिका की यात्रा करने वाली एक पुर्तगाली टीम ने साल 1508 में तंबाकू को भारत में पेश किया। उस समय तक भारत में गांजा और भांग जैसे कैनाबिस का इस्तेमाल धूम्रपान के लिए किया जाता था।
भारत की जलवायु तंबाकू की खेती के लिए बिल्कुल अनुकूल थी और यहां पहले से ही धूम्रपान की संस्कृति लोगों में प्रचलित थी, इसलिए भारत में इसे आसानी से अपना लिया गया। शुरुआत में यह केवल किसानों और निचले कुलीन वर्ग तक ही सीमित रहा, जबकि मुगल दरबार में तंबाकू की एंट्री अभी तक नहीं हुई थी।
अकबर के शासनकाल के महान इतिहासकार अबुल फजल ने अपनी पुस्तक आइन-ए-अकबरी (1590) में कृषि फसलों का विवरण दिया है। इसमें पुर्तगालियों के साथ लाए गए मक्का और अनानास का जिक्र तो है, लेकिन तंबाकू का कोई नाम नहीं है।
डब्ल्यू.एच. मोरलैंड के अनुसार, अकबर के शासनकाल में तंबाकू का उत्पादन शुरू तो हुआ था, लेकिन राजस्व अधिकारियों को इसकी जानकारी नहीं थी, क्योंकि 16वीं शताब्दी में यह बड़े पैमाने पर नहीं उगाया गया। पुर्तगालियों ने सबसे पहले गुजरात के कायरा और मेहसाना में छोटे स्तर पर इसकी खेती शुरू की थी।
जब मुगल दरबार में पहुंचा पहला चिलम
विद्वान इरफान हबीब के अनुसार, आइन-ए-अकबरी के लिखे जाने के एक दशक के अंदर, मक्का से लौटे तीर्थयात्रियों ने मुगल दरबार में वहां तंबाकू के चलन की जानकारी दी थी। इसके बाद, बीजापुर से लौटे एक शाही दूत असद बेग ने सम्राट अकबर को एक बेहद खूबसूरत और पूरी तरह से तैयार हुक्का भेंट किया। उन्होंने सम्राट को बताया कि ये नई पत्तियां तंबाकू हैं, जो मक्का और मदीना में बहुत मशहूर हैं। असद बेग ने कुछ तंबाकू दूसरे दरबारियों को भी भेजा।
विलियम फॉस्टर की किताब द इंग्लिश फैक्ट्रीज इन इंडिया (1618-1669) में एक किस्से का जिक्र है कि जब दरबारी मिर्जा अजीज कोका ने अकबर को सेहत की दवा के रूप में बीजापुर से लाया गया पहला चिलम पेश किया, तो अकबर ने इसके कुछ कश लिए। तभी शाही हकीम हकीम अब्दुल फतेह गिलानी ने बहस शुरू कर दी कि उनकी मंजूरी के बिना किसी नई चीज को दवा कैसे कहा जा सकता है। बहस को गर्म होता देख अकबर ने उसे वहीं छोड़ दिया। अकबर की इस थोड़ी सी बेरुखी ने कुछ सालों के लिए तंबाकू को शाही दरबार से दूर रखा, लेकिन इसे ज्यादा समय तक रोका नहीं जा सका।

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दिलचस्प बात यह है कि जिस शाही हकीम ने इसका विरोध किया था, उन्हीं को भारत में हुक्के की शुरुआत का श्रेय दिया जाता है। फतेहपुर सीकरी में अकबर के दरबार में आने वाले जेसुइट मिशनरियों के अनुसार, पहले इन हुक्कों में ज्यादातर गांजा पिया जाती थी, जिसकी जगह बाद में तंबाकू ने ले ली।
जहांगीर का प्रतिबंध और तंबाकू की लत
अकबर के बाद जब जहांगीर मुगल सम्राट बने, तो तंबाकू का चलन और इसकी लत बहुत तेजी से लोगों के बीच फैली। जहांगीरनामा से पता चलता है कि फारस के राजदूत खान-आलम और फारस के शासक के राजदूत यादगीर अली सुल्तान को तंबाकू की गंभीर लत थी।
ब्रिटिश राजा जेम्स प्रथम के दूत के रूप में 1616 में अजमेर में जहांगीर के दरबार में आए सर थॉमस रो और उनके साथियों ने दर्ज किया कि यह आदत कितनी तेजी से फैल चुकी थी। इसी को देखते हुए, साल 1617 में सम्राट जहांगीर ने एक शाही फरमान जारी कर पूरे मुगल साम्राज्य में तंबाकू की खेती, बिक्री और इस्तेमाल को अपराध घोषित कर दिया।

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अंग्रेजों का बिजनेस माइंड
जहांगीर के प्रतिबंध के बावजूद, शाहजहां और औरंगजेब के शासनकाल तक तंबाकू मुगल समाज के हर वर्ग तक पहुंच गया। औरंगजेब के समय भारत आए एक वेनिस के यात्री एन. मनुची ने देखा कि मुगल सम्राट ने तंबाकू पर लगने वाले टैक्स को हटा दिया था। उस दौर में सराय में ठहरने वाले यात्रियों और भिखारियों को खुद खाना बनाने की इजाजत नहीं होती थी। सार्वजनिक अन्न भंडारों के सेवक उनके सामाजिक स्तर के हिसाब से खाना और साथ में तंबाकू परोसते थे। साहिब-ए-बारात या मेलों के दौरान यह बहुत आम बात थी।

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जैसे-जैसे मांग बढ़ी, तंबाकू की सप्लाई भी बढ़ती गई। जल्द ही यह फसल देश के अन्य हिस्सों जैसे कोंकण (महाराष्ट्र), मसूलीपट्टनम (आंध्र प्रदेश), गोलकुंडा (तेलंगाना) और गोवा व पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों में फैल गई।
जहां पुर्तगालियों ने भारत को तंबाकू से रूबरू कराया, वहीं अंग्रेजों ने इसमें एक बड़ा बिजनेस अवसर देखा। अंग्रेजों ने तंबाकू को नगदी फसल में बदल दिया और इसका औद्योगिक स्तर पर उत्पादन शुरू किया।
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