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    संविधान की रक्षा के लिए दीवार बनकर खड़े हो गए थे नानीभाई पालखीवाला, कैसे बने देश के सबसे बड़े वकील?

    Updated: Fri, 16 Jan 2026 12:04 PM (IST)

    आपने केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य केस के बारे में तो सुना ही होगा, लेकिन क्या आपके इस केस के वकील नानीभाई पालखीवाला के बारे में जानते हैं? नानीभाई भ ...और पढ़ें

    कौन थे नानीभाई पालखीवाल? (Picture Courtesy: Facebook)

    कौन थे नानीभाई पालखीवाल? (Picture Courtesy: Facebook)

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    जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

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    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो समय की धूल में कभी ओझल नहीं होते। इन्हीं में से एक चमकता सितारा हैं नानीभाई पालखीवाला। नानीभाई पालखीवाला का नाम सुनते ही सभी के जहन में केशवानंद भारती केस याद आता है, लेकिन इनका जीवन और भी बड़ा है। 

    वे केवल एक वकील नहीं थे, बल्कि एक प्रखर चिंतक, विद्वान लेखक और एक ऐसे प्रभावशाली वक्ता थे, जिनकी आवाज जब अदालत में गूंजती थी, तो पूरा देश उसे ध्यान से सुनता था। लेकिन हम आज नानीभाई को क्यों याद कर रहे हैं? दरअसल, आज ही के दिन यानी 16 जनवरी को साल 1920 में इनका जन्म हुआ था। 

    आज नानीभाई पालखीवाला की 106वीं जयंती है। इसी खास मौके पर आज हम आपको बताएंगे कि भारतीय संविधान के रक्षक और देश के सबसे बड़े वकीलों में शामिल नानीभाई पालखीवाला का जीवन कैसा था। 

    प्रोफेसर बनने का सपना और वकालत की राह

    मुंबई में जन्मे नानीभाई का शुरुआती सपना शिक्षक बनने का था। वे एक प्रोफेसर के रूप में ज्ञान बांटना चाहते थे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। परिस्थितियों ने उन्हें कानून की दहलीज पर ला खड़ा किया। 

    1946 में वे बार एसोसिएशन में शामिल हुए और बॉम्बे में सर जमशेदजी बहरामजी कांगा के साथ वकालत की बारीकियां सीखीं। जल्द ही वे अपनी वाक्पटुता और तर्कशक्ति के कारण भारत के सर्वश्रेष्ठ वकीलों में शुमार हो गए।

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    (Picture Courtesy: Facebook)

    केशवानंद भारती केस- एक ऐतिहासिक जीत

    नानीभाई पालखीवाला का नाम स्वर्ण अक्षरों में तब लिखा गया, जब उन्होंने 1973 के मशहूर केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य मामले में मुख्य अधिवक्ता की भूमिका निभाई। उस समय देश के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या संसद के पास संविधान में असीमित संशोधन करने की शक्ति है?

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    नानीभाई ने अदालत में पुरजोर दलील दी कि संसद को संशोधन का अधिकार तो है, लेकिन वह संविधान की 'मूल संरचना' को नष्ट नहीं कर सकती। सुप्रीम कोर्ट ने उनके इस ऐतिहासिक तर्क को स्वीकार किया और 'Basic Structure Doctrine' का जन्म हुआ, जिसने भारतीय लोकतंत्र की नींव को तानाशाही से बचा लिया और संविधान के स्वरूप को हमेशा के लिए सुरक्षित कर दिया।

    अभिव्यक्ति की आजादी के पहरेदार

    पालखीवाला प्रेस की स्वतंत्रता के कट्टर समर्थक थे। 1972 में जब सरकार ने समाचार पत्रों पर आयात नियंत्रण लगाने की कोशिश की, तो उन्होंने इसका कड़ा विरोध किया। उन्होंने एक बहुत ही सुंदर तर्क दिया था कि समाचार पत्र कोई साधारण वस्तु या इस्पात जैसी सामग्री नहीं है जिससे सिर्फ उत्पाद बनते हों; बल्कि समाचार पत्र तो मनुष्य के मन के विचारों को प्रकट करने का माध्यम हैं। उनकी बातों में संवैधानिक मूल्यों के प्रति गहरी निष्ठा झलकती थी। उनका मानना था कि "किसी राष्ट्र की शक्ति उसकी संपत्ति में नहीं, बल्कि उसके चरित्र में निहित होती है।" 

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    (Picture Courtesy: Facebook)

    कानून और साहित्य का अनूठा संगम

    नानीभाई ने जटिल विषयों को आसान भाषा में समझाने की अद्भुत कला हासिल थी। उन्होंने सर जमशेदजी के साथ मिलकर 'आयकर का कानून और अभ्यास' जैसी प्रामाणिक पुस्तक लिखी। इसके अलावा उनकी प्रमुख कृतियों हैं-

    • वी द पीपल (We the People)
    • वी द नेशन (We the Nation)
    • आवर कॉन्स्टिट्यूशन डीफेस्ड एंड डीफाइल्ड
    • इंडियाज प्राइसलेस हैरिटेज

    अपनी विद्वत्ता के कारण ही वे संयुक्त राज्य अमेरिका में भारत के राजदूत भी रहे, जहां उन्होंने एक सशक्त भारतीय लोकतंत्र की छवि पेश की।

    एक युग का अंत

    जीवन के अंतिम पड़ाव में नानीभाई पालखीवाला अल्जाइमर जैसी गंभीर बीमारी से जूझते रहे। 7 दिसंबर 2002 को उनकी स्थिति ज्यादा बिगड़ गई और 11 दिसंबर 2002 को इस महान कानूनविद् ने अंतिम सांस ली। भले ही आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन 'मूल संरचना' के सिद्धांत के रूप में उनका योगदान हर भारतीय नागरिक के अधिकारों की रक्षा कर रहा है।