धरती को नापकर तय हुई थी एक मीटर की लंबाई, दिलचस्प है माप की इकाई बनने की कहानी
18वीं सदी के अंत तक माप के लिए राजाओं के हाथों या पैरों के नाप का इस्तेमाल किया जाता था।
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कैसे तय हुई मीटर की लंबाई? (AI Generated Image)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज हम बाजार से कपड़ा खरीदते समय या सड़क की दूरी नापते समय मीटर शब्द का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि एक मीटर की लंबाई आखिर उतनी ही क्यों होती है, जितनी आज हम देखते हैं या इसे मापने का स्टैंडर्ड यूनिट कैसे बनाया गया?
दरअसल, माप की इस प्रणाली को बनाने के पीछे एक बेहद दिलचस्प कहानी है। आइए जानें कैसे मीटर बना मेजरमेंट का स्टैंडर्ड यूनिट।
जब राजा के पैर से तय होती थी दूरी
मीटर की शुरुआत होने से पहले, यानी 18वीं सदी के अंत तक, माप की कोई एक स्टैंडर्ड यूनिट नहीं था। उस समय माप के तरीके बेहद भ्रमित करने वाले थे। अक्सर किसी क्षेत्र का माप वहां के राजा के शरीर के अंगों पर आधारित होता था, जैसे हाथ की लंबाई या पैर का आकार। अब क्योंकि हर राजा का शारीरिक माप अलग-अलग होता था, इसलिए व्यापार और अर्थव्यवस्था में इस वजह से काफी समस्या आती थी।
एक शहर का एक हाथ कपड़ा दूसरे शहर के एक हाथ से छोटा या बड़ा हो सकता था, जिससे व्यापारियों और आम लोगों को भारी नुकसान होता था और अक्सर इसके कारण विवाद की स्थिति भी पैदा हो जाती थी।
फ्रांस की ऐतिहासिक पहल
इस उलझन और व्यापारिक बाधाओं को हमेशा के लिए खत्म करने के लिए फ्रांस ने एक क्रांतिकारी कदम उठाया। 7 अप्रैल 1795 को फ्रांस ने एक कानून पारित किया और मीटर को आधिकारिक माप की इकाई घोषित कर दिया। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि एक मीटर की लंबाई कितनी रखी जाए, जो हर जगह एक जैसी हो?
इसके लिए फ्रांसीसी वैज्ञानिकों ने किसी व्यक्ति के बजाय पृथ्वी को आधार बनाया। वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के मेरिडियन का सहारा लिया। करीब सात साल के लंबे और मुश्किल सर्वेक्षण के बाद यह पैमाना तय किया गया कि नॉर्थ पोल से इक्वेटर के बीच की कुल दूरी का एक करोड़वां हिस्सा एक मीटर कहलाएगा। इस तरह माप की इकाई को विज्ञान और प्रकृति से जोड़कर बनाया गया।
टाइल्स के जरिए पहुंची जनता तक
नई प्रणाली तो बन गई थी, लेकिन इसे आम जनता तक पहुंचाना और उन्हें समझाना एक बड़ी चुनौती थी। लोगों को इस नए माप की प्रैक्टिस करवाने के लिए पेरिस की अहम सार्वजनिक इमारतों पर संगमरमर के एक मीटर लंबे स्लैब लगाए गए। इन स्लैबों को लगाने का मकसद यह था कि आम नागरिक वहां जाकर अपनी चीजों को सटीक रूप से माप सकें और मीटर की लंबाई को समझ सकें।

(Picture Courtesy: Facebook)
आज भी मौजूद हैं इतिहास के निशान
समय की मार और विकास के कारण धीरे-धीरे ज्यादातर ऐतिहासिक स्लैब नष्ट हो गए। हालांकि, इतिहास प्रेमियों के लिए आज भी पेरिस की गलियों में यह विरासत जीवित है। पेरिस के प्लेस वेंडोम और रु डी वौगिरार्ड जैसी जगहों पर दो मूल संगमरमर के स्लैब आज भी सुरक्षित बचे हुए हैं। ये पत्थर हमें उस दौर की याद दिलाते हैं जब दुनिया ने भ्रम को छोड़कर विज्ञान और समानता के आधार पर खुद को मापना सीखा था।
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