यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Mar 11, 2021 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
अगली पीढ़ी के नेतृत्व के लिए अग्निपरीक्षा बना चुनाव, सुवेंदु से लेकर स्टालिन तक इनकी प्रतिष्ठा दांव पर
तमिलनाडु में स्टालिन केरल में रमेश चेन्नीथला हों या असम में गौरव गोगोई हिमंता बिस्व सरमा या फिर बंगाल में भाजपा के नए पोस्टर ब्वाय सुवेंदु अधिकारी अगल ...और पढ़ें

संजय मिश्र, नई दिल्ली। पांच राज्यों में होने जा रहे चुनाव में सियासी चेहरों की बढ़ी अहमियत के साथ ही अधिकांश सूबों में नई या अगली पीढ़ी के नेताओं का नेतृत्व कसौटी पर है। तमिलनाडु में स्टालिन, केरल में रमेश चेन्नीथला हों या असम में गौरव गोगोई, हिमंता बिस्व सरमा या फिर बंगाल में भाजपा के नए पोस्टर ब्वाय सुवेंदु अधिकारी, अगली पीढ़ी के इन नेताओं के लिए ये चुनाव सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा है।
सोनोवाल को साबित करनी होगी काबिलियत
पांचों चुनावी राज्यों में ममता बनर्जी के अलावा मुख्यमंत्री पद की होड़ में शामिल सभी दलों के संभावित दावेदारों को नेतृत्व की काबिलियत साबित करनी है। असम में मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल पांच साल का अपना कार्यकाल पूरा कर चुके हैं मगर राज्य में पार्टी के राजनीतिक नफा-नुकसान का आकलन करने के बाद भाजपा ने उन्हें अगले मुख्यमंत्री के तौर पर पेश नहीं किया है।
हिमंत बिस्व सरमा के लिए निर्णायक चुनाव
भाजपा की इस रणनीति में पूर्वोत्तर में पार्टी के सबसे बड़े रणनीतिकार के तौर पर उभरे हिमंत बिस्व सरमा के लिए नेतृत्व का रास्ता खुला रखने का संकेत देखा जा रहा है। पूर्वोत्तर राज्यों में भाजपा की जमीन मजबूत करने में बीते कुछ साल में कामयाब रहे हिमंता के लिए यह चुनाव असम का नेतृत्व संभालने के लिहाज से सबसे निर्णायक है।
सोनोवाल के सामने नेतृत्व निखारने की चुनौती
असम में नागरिकता संशोधन कानून से बढ़ी भाजपा की सिरदर्दी, गठबंधन के सहारे कांग्रेस की मजबूत हुई चुनौती और मौजूदा मुख्यमंत्री सोनोवाल की दावेदारी के बीच हिमंता के सामने अपने नेतृत्व को निखारने की चुनौती है। असम में दिग्गज नेता तरुण गोगोई के निधन के बाद कांग्रेस में भी अगली पीढ़ी के नेतृत्व का पूरा मैदान खाली है। लिहाजा स्वाभाविक रूप से यहां होड़ भी ज्यादा है।
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गौरव गोगाई के सामने दोहरी चुनौती
कांग्रेस सांसद गौरव गोगाई अपने पिता तरुण गोगोई की जगह राज्य में पार्टी के सबसे बड़े छत्रप के रूप में उभरने के लिए जोर लगा रहे हैं। राज्य में जमीनी पकड़ रखने वाले सांसद प्रदीप बोरदोलोई इस दौड़ में गौरव को तगड़ी टक्कर दे रहे हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रिपुन बोरा भी कांग्रेस के नेतृत्व के चेहरे की रेस से बाहर नहीं हैं। ऐसे में कांग्रेस में इन तीनों में आपसी प्रतिस्पर्धा तो है ही, साथ ही जनता की कसौटी पर खुद को दमदार साबित करने की दोहरी चुनौती भी है।
सुवेंदु अधिकारी को बचानी होगी साख
बंगाल में तृणमूल कांग्रेस में ममता बनर्जी का नेतृत्व निर्विवाद है, मगर इस चुनाव को महा-मुकाबला बना चुकी भाजपा के लिए मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं करना चुनौती बनी हुई है। हालांकि नंदीग्राम में ममता और सुवेंदु की सीधी जंग के बीच भाजपा ने अपनी सियासी ताकत को जिस तरह सुवेंदु अधिकारी के इर्दगिर्द केंद्रित कर दिया है उससे साफ संकेत है कि पार्टी उनमें प्रदेश का अपना नेतृत्व देख रही है।
स्टालिन के पास छत्रप के रूप में साबित करने का मौका
ममता की 10 साल की सत्ता और ढाई दशक से भी अधिक की जमीनी सियासी पकड़ के बीच सुवेंदु के लिए अगली पीढ़ी के नेतृत्व को बंगाल में स्थापित करना आसान चुनौती नहीं है। तमिलनाडु में जयललिता और करुणानिधि के दौर के बाद यह पहला विधानसभा चुनाव है। स्वाभाविक रूप से द्रमुक नेता स्टालिन के पास खुद को राज्य के नए सियासी छत्रप के रूप में साबित करने का मौका है।
पलानीस्वामी के लिए दोहरी परीक्षा
जयललिता के अवसान के बाद केंद्र और भाजपा की राजनीतिक सरपरस्ती में अपना कुनबा बिखरने से बचाने में कामयाब रही अन्नाद्रमुक की चुनौती को स्टालिन फिलहाल हल्के में नहीं ले सकते। इसी तरह, अन्नाद्रमुक में जयललिता के बाद नेतृत्व की लड़ाई में मुख्यमंत्री पलानीस्वामी ने भले ही उपमुख्यमंत्री पन्नीरसेल्वम को मात दे दी हो, मगर यह चुनाव ही जनता के बीच उनके नेतृत्व की विश्वसनीयता और लोकप्रियता दोनों को तय करेगा।
केरल में इनकी होगी परीक्षा
केरल में वामपंथी गठबंधन के पास मुख्यमंत्री पिनराई विजयन का आजमाया हुआ नेतृत्व है, मगर कांग्रेस में एके एंटनी और ओमन चांडी जैसे दिग्गजों के बाद रमेश चेन्नीथला के लिए जनता की कसौटी पर खुद को साबित करने की सबसे बड़ी चुनौती है। चुनाव के दरम्यान केरल में वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं के असंतोष और अंदरूनी उठापटक की बातें रमेश की इस चुनौती को कहीं ज्यादा बढ़ाती दिख रही हैं।