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    यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Apr 01, 2021 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

    केरल में कांग्रेस के सामने सीएम पद के दावेदारों को साधने की भी कठिन चुनौती, राहुल अपना रहे यह तरकीब

    By Krishna Bihari SinghEdited By:
    Updated: Fri, 02 Apr 2021 12:19 AM (IST)

    केरल में वामपंथी गठबंधन एलडीएफ से सत्ता छीनने को बेकरार कांग्रेस के लिए चुनाव की चुनौती जितनी बड़ी है... उतनी ही कठिन चुनौती सूबे के अपने बड़े नेताओं ...और पढ़ें

    कांग्रेस के लिए कठिन चुनौती केरल में अपने बड़े नेताओं के बीच संतुलन बनाए रखने की भी है।
    कांग्रेस के लिए कठिन चुनौती केरल में अपने बड़े नेताओं के बीच संतुलन बनाए रखने की भी है।

    संजय मिश्र [केरल से लौटकर]। केरल में वामपंथी गठबंधन एलडीएफ से सत्ता छीनने को बेकरार कांग्रेस के लिए चुनाव की चुनौती जितनी बड़ी है, उतनी ही कठिन चुनौती सूबे के अपने बड़े नेताओं के बीच संतुलन बनाए रखने की भी है। पार्टी एक ओर एलडीएफ गठबंधन के आक्रामक प्रचार अभियान का मुकाबला करने में सब कुछ झोंकने की कोशिश कर रही है तो दूसरी तरफ मुख्यमंत्री पद के लिए पार्टी में उभरे तीन गंभीर दावेदारों के बीच आपसी समन्वय के लिए भी उसे कम मशक्कत नहीं करनी पड़ रही है।

    मुख्यमंत्री पद के दावेदारों की बढ़ी सक्रियता

    माकपा नेतृत्व वाले एलडीएफ गठबंधन के चुनाव में बढ़त होने के दावों के बीच कांग्रेस ने बीते दस दिनों में अपने चुनाव अभियान को स्थायित्व दिया है। इसके चलते केरल का चुनाव एक नजदीकी मुकाबले की ओर बढ़ता दिख रहा है। इसीलिए कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद के दावेदारों की उम्मीदें और सक्रियता भी बढ़ गई है।

    ओमान चांडी और मुरलीधरन हुए सक्रिय

    पूर्व मुख्यमंत्री ओमान चांडी एक बार फिर सूबे में कांग्रेस के सबसे लोकप्रिय और भीड़ जुटाउ नेता की अपनी साख साबित कर बढ़ती उम्र के बावजूद खुद को स्वाभाविक दावेदार मान रहे हैं। जबकि नेता विपक्ष रमेश चेन्निथला एलडीएफ सरकार और माकपा के खिलाफ सबसे आक्रामक लड़ाई लड़ने वाले नेता की छवि के सहारे अपनी दावेदारी को मजबूत बनाने में जुटे हैं। वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री के. करुणाकरण के बेटे लोकसभा सांसद मुरलीधरन भाजपा को उसके एकलौते गढ़ में थामने का बीड़ा उठाकर इस होड़ में शामिल हो गए हैं।

    राहुल अपना रहे यह तरकीब

    मतदान से पहले ही मुख्यमंत्री पद की दावेदारी की इस सियासत से पार्टी की चुनावी उम्मीदों को चपत न लग जाए, इसकी चिंता कांग्रेस हाईकमान को भी है। इसीलिए माकपा के खिलाफ अपने आक्रामक प्रचार अभियान के दौरान कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी यह सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहे हैं कि पार्टी के इन नेताओं के बीच समन्वय व संतुलन बना रहे। राहुल के चुनावी दौरे में इस बात का विशेष ख्याल रखा जा रहा है कि वह इन तीनों नेताओं के प्रभाव वाले इलाकों और उनके समर्थक उम्मीदवारों के प्रचार अभियान के लिए बराबर समय दें।

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    चांडी की लोकप्रियता के बीच चेन्निथला भी हुए मजबूत

    तिरुअनंतपुरम स्थित प्रदेश कांग्रेस के मुख्यालय इंदिरा भवन में चुनाव कंट्रोल रूम से जुड़े एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने अपने चुनावी दौरे में संतुलन बनाए रखने की राहुल की कोशिशों की पुष्टि करते हुए कहा कि बेशक ओमान चांडी पार्टी के सबसे बड़े चेहरे हैं। कांग्रेस के स्टार प्रचारकों में राहुल और प्रियंका के अलावा चांडी की ही सबसे ज्यादा मांग है।

    रमेश चेन्निथला की भूमिका भी सराहनीय

    राहुल भी चांडी को पसंद करते हैं मगर यह भी सच है कि माकपा की अगुआई वाली एलडीएफ सरकार को घोटालों के कठघरे में खड़ा करने में रमेश चेन्निथला की सबसे बड़ी भूमिका रही है। गोल्ड स्मगलिंग, डीप सी फिशिंग घोटाला, पीसीएस घोटाला से लेकर अभी चुनाव के बीच फर्जी डूप्लीकेट वोटरों की लिस्ट का मामला उजागर कर रमेश ने माकपा को बैकफुट पर धकेलने के सारे अस्त्र कांग्रेस को मुहैया कराए हैं।

    दर्जन भर बड़े मामले उजागर

    केरल के एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक की वरिष्ठ पत्रकार सिंथिया चंद्रन इस बारे में कहती हैं कि रमेश चेन्निथला ने जिस तरह एलडीएफ सरकार के खिलाफ एक-एक कर लगभग दर्जन भर बड़े मामलों और घोटालों को उजागर किया है, वैसा केरल में बीते 25 साल में विपक्ष के किसी नेता ने नहीं किया। रमेश के उजागर किए मुद्दे ही माकपा के खिलाफ कांग्रेस के बड़े चुनावी हथियार हैं और ऐसे में चेन्निथला भी अपनी दावेदारी में कोई गुंजाइश नहीं छोड़ना चाहते।

    मुरलीधरन को भी मिली है अहम जिम्मेदारी

    सूबे में भाजपा के पैर जमाने के प्रयासों में खतरा देख रही कांग्रेस ने उसके कदम को यहीं पर थामने का दांव इस चुनाव में चला है। इसके लिए कांग्रेस ने केरल में भाजपा की एकमात्र सीट तिरुअनंतपुरम के नेमम में मुरलीधरन को उतारा है और इससे भाजपा की मुश्किलें बढ़ गई हैं।

    मुरलीधरन भी नेतृत्व पद की दौड़ में शामिल

    मुरली को उम्मीद है कि यहां भाजपा को थामकर वह नेतृत्व पद की दौड़ में शामिल हो जाएंगे और इसी बहाने सूबे की सियासत में उनकी वापसी भी हो जाएगी। दरअसल चांडी और चेन्निथला ने मुरली को सूबे की सियासी दौड़ से बाहर करने के लिए उन्हें लोकसभा का चुनाव लड़ाकर दिल्ली भेज दिया था। मगर करुणाकरन की विरासत की नेमम में पड़ी जरूरत ने मुरली को दावेदारी में आने का मौका दे दिया है और इसीलिए कांग्रेस की चुनावी मशक्कत भी ज्यादा है।