Ikka में वकील बनने के लिए Tillotama Shome की थी खास तैयारी, Sunny Deol संग पहली बार काम करने बोलीं एक्ट्रेस
अभिनेत्री तिलोत्तमा शोम ने ओटीटी फिल्म इक्का में वकील की भूमिका निभाने को लेकर हाल ही में खुलकर बात की है। ...और पढ़ें

इक्का फिल्म एक्ट्रेस तिलोत्तमा शोम (फोटो क्रेडिट- एक्स)
HighLights
इक्का में नजर आईं तिलोत्तमा शोम
2 दशक से ज्यादा समय से सिनेमा में एक्टिव
तिलोत्तमा शोम ने इक्का से जीता सबका दिल
स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। अपने दमदार अभिनय और अलग तरह के किरदारों के बल पर अभिनेत्री तिलोत्तमा शोम (Tillotama Shome) ने हिंदी सिनेमा में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। मानसून वेडिंग से अभिनय की शुरुआत करने वाली तिलोत्तमा इस साल अपने अभिनय सफर के 25 वर्ष पूरे कर रहीं हैं।
वह हाल ही में नेटफ्लिक्स पर रिलीज फिल्म इक्का (Ikka) में पहली बार वकील की भूमिका में नजर आई हैं। जल्द ही वह अपनी अगली फिल्म की शूटिंग शुरू करने वाली हैं। उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश:
इन 25 वर्षों के सफर में आपको सबसे बेहतरीन सलाह क्या मिली?
जब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ती थी, तो हमारे प्रोफेसर किसी किताब की कहानी या उसके किसी किरदार को जिस तरह समझाते थे, उससे हमारा पूरा नजरिया बदल जाता था। उन्होंने सिखाया कि जो चीज सबको सिर्फ एक पेड़ दिखाई देती है, उसके पीछे पूरा जंगल भी हो सकता है। दिल्ली विश्वविद्यालय में अंजना शर्मा, कस्तूरी कंठन, संबुद्ध सेन और उदय कुमार जैसे शिक्षकों का मुझ पर सबसे ज्यादा प्रभाव रहा।
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इसके बाद न्यू यार्क यूनिवर्सिटी में भी मेरे शिक्षक क्रिस वाइन से भी बहुत कुछ सीखने को मिला। किस्सा फिल्म के निर्देशक अनूप सिंह से मैंने एक बहुत महत्वपूर्ण बात सीखी। उन्होंने मुझे कभी सीधे-सीधे यह नहीं बताया कि क्या करना है, लेकिन उन्हें काम करते हुए देखकर मैंने सीखा कि एक अच्छा शिक्षक वह होता है जो आपको जवाब नहीं बताता, बल्कि आपको खुद जवाब तक पहुंचने में मदद करता है।
उन्होंने मुझे सिखाया कि किसी भी चीज का सिर्फ एक सही जवाब नहीं होता। एक अभिनेता के लिए यह समझ बहुत जरूरी है, क्योंकि किसी किरदार को निभाने या किसी दृश्य को करने का सिर्फ एक तरीका नहीं होता। उसे खोजने और निभाने के कई रास्ते होते हैं। यही शायद मेरे लिए सबसे बड़ी सीख रही।
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हर किरदार की तैयारी का एक बुनियादी तरीका होता है। सबसे पहले संवाद याद करने होते हैं, उस किरदार का सामाजिक संदर्भ समझना होता है। अगर वह किसी खास पेशे से जुड़ा है, तो उसकी शब्दावली और कार्यशैली भी सीखनी पड़ती है। इसके अलावा मैं यह जानने की कोशिश करती हूं कि वह कैसे चलती है, उसकी आवाज कैसी है, उसकी नजर स्थिर रहती है या भटकती है।

स्क्रिप्ट को बार-बार पढ़ने पर किरदार के बारे में नए-नए संकेत मिलते हैं। कोई एक तय तरीका नहीं होता। वकील का काला कोट पहनते ही उस पेशे की गरिमा और जिम्मेदारी भी महसूस होने लगती है। लेकिन मेरे लिए असली तैयारी सिर्फ वही नहीं है, जो स्क्रिप्ट में लिखी है। असली चुनौती उस जीवन को महसूस करना है, जो पर्दे पर दिखाई नहीं देती। यह किरदार सिर्फ वकील नहीं है, वह मां भी है, पत्नी भी है। उसके निजी जीवन में क्या चल रहा है, उसे भी अपने भीतर जीवित रखना पड़ता है कलाकार का काम अनकहे को सामने लाना है।
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मसलन, स्क्रिप्ट में सिर्फ यह लिखा हो कि किरदार गुस्सैल है, लेकिन हो सकता है वह भीतर से असुरक्षित भी हो और घबराहट में बार-बार नाखून चबाता हो। ऐसे छोटे-छोटे व्यवहार किरदार की असली दुनिया बनाते हैं। मैं हर किरदार के साथ दोस्ती करना चाहती हूं। अभिनय का सबसे रोमांचक पहलू यही है कि सेट पर पहले दिन की शूटिंग पूरी होने तक आपको नहीं पता होता कि आपकी सारी तैयारी सचमुच काम आएगी या नहीं।
सनी देओल के साथ काम करने की कोई खास बात याद रह गई ?
मैं उनसे पहले कभी नहीं मिली थी। वह भले ही कम बोलते हों, लेकिन उनके भीतर एक गजब की गर्मजोशी है। एक सीन में मैं अपना संवाद बोल रही थी। एक मक्खी उनकी इर्दगिर्द उड़ रही थी। फिर आंख के पास जाकर बैठ गई।
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क्लोजअप मेरा था मुझे लगा कि अब कट होगा वरना मक्खी उनकी आंख में घुस जाएगी, लेकिन उन्होंने कट बोला ही नहीं। मैं अपने संवाद बोलती रही और वह प्रतिक्रिया देते गए। मैंने जितनी जल्दी हो सकता था, दृश्य पूरा किया। उसके बाद मैंने सनी सर से पूछा कि आपने कट क्यों नहीं बोला।
उन्होंने कहा कि तुम्हारा टेक इतना अच्छा था कि मैं उसे खराब नहीं करना चाहता था। उनकी यह बात मुझे भीतर तक छूगई। इतने वर्षों तक इंडस्ट्री में काम करने के बाद भी किसी अभिनेता को अपने सह-कलाकार के प्रति इतना उदार और सहयोगी देखना बहुत खूबसूरत अनुभव था। मुझे लगता है कि ऐसा तभी संभव है, जब आप अपने काम से सचमुच प्यार करते हों।
मानसून वेडिंग से आपको लगातार वैसी ही भूमिकाए मिलने लगीं। आपको अपनी ही सफलता से लड़ना पड़ा?
कुछ समय तक तो ऐसा लगा, लेकिन जब मुझे एक जैसी भूमिकाएं मिलने लगीं, तो मैंने उन्हें करना बंद कर दिया। मुझे याद है फिल्म रहागीर जिसका निर्देशन गौतम घोष ने किया था, मैंने एक दिहाड़ी मजदूर का किरदार निभाया था। शूटिंग के दौरान बरसात में 8 से 12 घंटे तक भीगते रहना पड़ता था।

हम कीचड़ में गाड़ी धकेलते हुए चलते थे। फिर शूट खत्म होने के बाद मैं अपने आरामदायक होटल के कमरे में लौटकर सो जाती थी। कुछ वर्षों बाद मेरे भीतर एक गहरी समझ पैदा हुई कि न तो मैं गरीब हूं और न ही अमीर। मैं उच्च मध्यमवर्ग की प्रतिनिधि हूं और एक कलाकार हूं। मुझे समाज के हर वर्ग के किरदार निभाने चाहिए।
फिल्म इंडस्ट्री में ऐसा होता है कि अगर किसी अभिनेता को एक तरह के किरदार में देखा गया है, तो मान लिया जाता है कि वह उसी तरह के रोल कर सकता है। निर्माता-निर्देशक जोखिम नहीं लेना चाहते। शुरुआत में मुझे लगता था कि जो भी काम मिल रहा है, उसे कर लेना चाहिए, लेकिन जैसे-जैसे अवसर मिलने लगे, मैं उन भूमिकाओं को ठुकराने लगी जो दोहराव वाली थी। मैंने इंतजार किया कुछ नया मिलने का।
इंतजार के दौरान निराशा नहीं होती थी?
मैंने अपना जीवन कई साल निराशा, ईर्ष्या और हताशा में बिताए हैं। फिल्म इंडस्ट्री को लेकर मेरे मन में बहुत नकारात्मक और आलोचनात्मक भाव भी आए। लेकिन धीरे-धीरे समझ आया कि इस नकारात्मकता से मेरी स्थिति बदलने वाली नहीं है। गुस्सा, कटुता काम नहीं दिला रहे थे।
जैसे चांदी या तांबे की कोई चीज धीरे-धीरे काली पड़ जाती है। अगर चाहते हैं कि वह काली न पड़े, तो आपको उसे रोज साफ और पॉलिश करना पड़ता है। हमारा मन भी कुछ ऐसा ही है। अगर आप उसकी नियमित सफाई नहीं करेंगे, तो वह इतना धुंधला और काला हो जाएगा कि आप भूल जाएंगे कि उसका असली रंग क्या था।
इसलिए मेरे लिए अपने मन को साफ रखना बहुत जरूरी था। इसमें मेरे दोस्तों, परिवार और मेरे मजबूत सपोर्ट सिस्टम ने बहुत मदद की। मैं बौद्ध धर्म की अनुयायी हूं और उससे भी मुझे अपने जीवन को लगातार संवारने की ताकत मिली। उसने मुझे नकारात्मकता में डूबने से बचाया।