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'4 डायलॉग बोलने से कोई पुलिसवाला...', दायरा की डायरेक्टर Meghna Gulzar का बॉलीवुड के 'ढोंग' पर तीखा हमला!

By Priyanka SinghEdited By: Tanya Arora
Published: Sun, 06 Sep 2026 07:30 AM (IST)

फिल्ममेकर मेघना गुलजार ने अपनी नई फिल्म 'दायरा' और सिनेमा में महिला किरदारों पर बात की, साथ ही बॉलीवुड में पुलिस पात्रों के चित्रण पर तीखी टिप्पणी की।

मेघना गुलजार ने कमर्शियल सिनेमा पर की बात/ फोटो- इंस्टाग्राम

मेघना गुलजार ने कमर्शियल सिनेमा पर की बात/ फोटो- इंस्टाग्राम

HighLights

  1. 'दायरा' फिल्म 18 सितंबर को सिनेमाघरों में रिलीज होगी

  2. मेघना ने पुलिस किरदारों के कमर्शियल चित्रण पर सवाल उठाए

  3. करीना कपूर 'दायरा' में डीसीपी की भूमिका में हैं

प्रियंका सिंह, मुंबई। ज्यादातर वास्तविक घटनाओं पर फिल्में बनाने वाली फिल्मकार मेघना गुलजार का मानना है कि उनकी फिल्मों की कहानियां केवल घटनाओं तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि उनके पीछे छिपे इंसानी जज्बातों को भी सामने लाती हैं। 18 सितंबर को सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली उनकी फिल्म दायरा की कहानी एक लापता लड़की के केस और सिस्टम से जंग के आसपास घूमती है।

इस कहानी की प्रासंगिकता, करीना कपूर के चयन, महिला निर्देशक के तौर पर बजट और अपने माता-पिता गुलजार व राखी की प्रतिक्रियाओं से लेकर आलोचनाओं तक, मेघना ने अपने सिनेमा और सोच पर खुलकर बात की।

आप अपनी कहानियों में महिला पात्रों को मुख्य भूमिका देती हैं, लेकिन अभिनेताओं को भी नजरअंदाज नहीं करती हैं। यह संतुलन कैसे बनता है?

मैं अपनी कहानियों में वास्तविक जीवन से बहुत प्रेरित होती हूं, चाहे वह मेरी पहली फिल्म फिलहाल हो, जो फिक्शनल थी या तलवार और उसके बाद की फिल्में हो जो वास्तविक जीवन पर आधारित रही हैं। जिंदगी में महिला-पुरुष दोनों की जरुरत होती है। अगर समाज को विश्वसनीयता से फिल्मों में दर्शाना है, तो समाज के सारे हिस्सों को दिखाना होगा। मेरी पहली फिल्म फिलहाल सरोगेसी पर आधारित थी। उस वक्त ये माना गया था कि वह महिलाप्रधान फिल्म है, लेकिन क्या एक बच्चा बिना पुरुष के पैदा कर सकते थे, तो कहानी कैसे केवल महिला की हुई।

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दायरा की शुरुआत कब और कैसे हुई और इसे ओटीटी की बजाय सिनेमाघरों तक लाना क्यों जरूरी लगा?

मैंने अपने करियर में हमेशा अलग रास्ता चुना है। सिनेमा और ओटीटी में इस वक्त क्या चल रहा है, उस पर मेरा ध्यान कभी रहा नहीं है। दायरा का जो विषय है बदकिस्मती से अपनी प्रासंगिकता खो ही नहीं रहा है। इस पर मैंने साल 2020 में काम शुरू किया था। उस दौरान मैं सैम बहादुर फिल्म पर भी काम कर रही थी। मुझे पता था कि दायरा की कहानी आउटडेटेड नहीं होगी।

क्या इंडस्ट्री में कभी महिला निर्देशक होने के नाते आपको किन्हीं दायरों में बांधा गया?

नहीं, मुझे नहीं लगता है लोग कहते हैं कि बड़े कलाकार नहीं मिलेंगे, बड़ा बजट नहीं मिलेगा। मैंने आलिया भट्ट, विक्की कौशल, दीपिका पादुकोण, करीना कपूर, पृथ्वीराज सुकुमारन के साथ काम किया है। जहां तक बजट की बात है, तो केवल महिला फिल्मकारों के लिए ही नहीं, बल्कि हर फिल्ममेकर के लिए वह दायरे हैं, यहां जेंडर से कोई लेना-देना नहीं है। यह कहानी से जुड़ा होता है।

एक फिल्म की कहानी जैसी है, उसकी कमाई उतनी होगी, इसलिए उसे फलां बजट में ही बनना चाहिए, यह बात हर फिल्ममेकर पर लागू होती है। अगर निर्माता ना लागू करे, तो निर्देशक को खुद करना चाहिए। हर फिल्ममेकर चाहता है कि उनकी फिल्में कामयाब हो, इसलिए यह अनुशासन हर फिल्ममेकर को रखना चाहिए। कई बार यह होता है कि हमें अवास्तविक बजट देकर कहा जाता है कि इतने में ही फिल्म बनाओ, लेकिन वो निर्माता हैं, जो अपना काम कर रहे हैं। फिर दोनों के बीच एक समझौता होता है, तब जाकर फिल्म का सफर शुरू होता है।

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करीना कपूर क्या फिल्म को लेकर पहली पसंद थीं?

हां, जब हमने किरदार लिखकर खत्म किया था, तो अनुभवी कलाकार चाहिए था। फिल्म की पात्र डीसीपी है। मैं इस पात्र को ऐसी महिला पुलिस अफसर के तौर पर दिखाना चाह रही थी, जिसे फिल्म इंडस्ट्री में अभी तक लोगों ने नहीं देखा है। करीना का नाम जेहन में आया, अब इसे खुशकिस्मती कहें या कुछ और उसी दौरान उनका मैसेज भी मेरे पास आया की मुझे आपके साथ काम करना है। मैंने कहा की आपने मेरे मुंह की बात छीन ली, मैं इस फिल्म पर काम कर रही हूं आप करना चाहेंगी। उन्होंने हां कह दी।

पुलिस पात्रों को फिल्मों में अक्सर बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ पेश किया जाता है। आप इन कमर्शियल चीजों का ख्याल कितना रख पाती है?

इस फिल्म में भी मेरे पुलिस पात्रों के लिए बैकग्राउंड म्यूजिक बज रहा है, लेकिन उस चक्कर मैं उस वर्दी के पीछे के इंसान को नहीं भूलती हूं, जिसकी अपनी चिंताएं, उसूल और मजबूरियां होंगी। फिल्म को कमर्शियल बनाने के लिए तीन-चार ढांसू डायलाग बोल दिए, बंदूक चलाकर पुलिस अफसर बन जाते हैं, ऐसा नहीं होता है। मुझसे नहीं होता है कि कमर्शियल बनाने के लिए मैं किसी सीन को बेवजह घूमा दूं, क्योंकि पैसे कमाने हैं। अगर फिल्म को तोड़-मरोड़कर कमर्शियल किया जा सकता, तो नाकामयाब फिल्म कभी बनती ही नहीं।

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आपने कहा था कि आपके पिता गुलजार आपकी फिल्म को कहानी के स्तर पर ही पढ़ना पसंद करते हैं, जबकि मां राखी फिल्म पूरी होने पर देखती हैं। दबाव किस वक्त ज्यादा रहता है?

दबाव होता ही नहीं, मुझे पता है कि उनको मेरा काम पसंद आएगा, उनकी बेटी हूं मैं। मुझे उनसे कुरेद कर पूछना पड़ता है कि आपको इसमें गलत क्या लगा। दबाव नहीं रहता है, लेकिन यह जरूर सोचती हूं कि पापा की तरफ से कहानी को लेकर क्या आएगा। मां जब देखती हैं, तो उस वक्त फिल्म पूरी हो चुकी होती है, उसमें कुछ बदलने का मौका नहीं होता है। मेरे लिए जरूरी यह है कि मेरे माता-पिता को मेरा कोई भी काम देखकर झिझक या शर्म महसूस न हो कि उनकी बेटी ने यह फिल्म बनाई है। मेरा काम का दायरा बड़ा है, ज्यादा लोगों तक पहुंचता है, तो मेरे काम की आलोचनाएं, प्रशंसा पब्लिक होती है।

आप आलोचनाओं को कैसे लेती हैं?

मैं किसी भी चीज को खारिज नहीं करती हूं, ना उसे खुद पर हावी होने देती हूं। हम सब इंसान हैं, जिनमें कमियां, खूबियां होती हैं। जब गलतियां होती हैं, तो प्रयास यही होता है कि अगली बार उसे सुधार लिया जाए। मैं यह बात समझती हूं कि आप हर बार, हर किसी को खुश नहीं कर सकते हैं। कुछ लोगों को मेरा काम पसंद आएगा, कुछ को नहीं।

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