'विलेन के फंदे में फंस गया...' जॉन अब्राहम और अर्जुन रामपाल को देख हीरो बनने आए निकितिन धीर कैसे बन गए खलनायक?
अभिनेता निकितिन धीर, जो कभी हीरो बनने की ख्वाहिश रखते थे, अब खुद को निगेटिव रोल में स्थापित कर चुके हैं और 'रक्तांचल 3' में भी खलनायक बने हैं।


समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
प्रियंका सिंह, मुंबई। कभी हीरो बनने की ख्वाहिश रखने वाले अभिनेता निकितिन धीर (Nikitin Dheer) अब निगेटिव रोल में खुद को स्थापित कर चुके हैं।हालांकि उनका मानना है कि अब पहले जैसे विलेन नहीं हुआ करते हैं। एमएक्स प्लेयर के वेब शो रक्तांचल 3 में निगेटिव रोल में दिखे निकितिन कहते हैं कि गंभीर किस्म के निगेटिव रोल मेरे साथ जुड़ गए हैं। उसमें जितनी फिल्में की हैं, वह हिट रही हैं, इसलिए विलेन का टैग लग गया है।
कैसे विलेन के रोल में फंसे निकेतन?
हालांकि विलेन की बजाय हीरो का रोल करना थोड़ा सा आसान होता है, लेकिन सच कहूं, तो मैं भी फिल्मों में हीरो बनने की मंशा के साथ ही आया था। मैंने डांस सीखा, बॉडी बनाई। उस दौर के हीरो जान अब्राहम, अर्जुन रामपाल थे। सब लंबे-चौड़े हैं, तो उस वक्त लगा कि मेरा भी काम हीरो के तौर पर चल जाएगा। हालांकि पहली ही फिल्म रुक गई। जब विलेन का रोल किया, तो वह हिट हो गई और मैं उसी में फंस गया।
अब वैसे रोल लिखे नहीं जाते- निकेतन
कई सीनियर्स ने कहा कि जब विनोद खन्ना साहब, शत्रुघ्न सिन्हा साहब विलेन बन सकते हैं, तो तुम भी थोड़ी उम्मीद रखो। आप जब किसी पात्र के फंदे में फंस जाते हैं, तो वहां से निकलना बहुत मुश्किल होता है। फिर मैंने मान लिया कि विलेन का रोल ही मेरे लिए सही। अगर मैं प्राण साहब या अमरीश पुरी साहब के नाखुन बराबर भी बन गया, तो बहुत है। हालांकि अब वैसे विलेन के रोल लिखे ही नहीं जाते हैं।
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निकेतन वापस चाहते हैं पुराना दौर
पहले के विलेन गाने भी गाते थे, जैसे अमरीश पुरी के साथ गजर ने किया है इशारा... जैसे गाने फिल्माए गए हैं। पूरी कहानी उनके आसपास घूमती थी, आज ऐसा नहीं है। पुराना दौर फिर आना चाहिए। दक्षिण भारतीय फिल्मों में विलेन के लिए खास जगह होती है, इसलिए वहां के विलेन याद रह जाते हैं। हिंदी में सब कुछ एक ही कलाकार करने लगते हैं। सारे डायलॉग, पंचेज एक कलाकार बोले ऐसा नहीं होना चाहिए।
आज से 20-25 साल पहले हमारे लिए विलेन, कॉ़मेडियन समेत कई पात्र हुआ करते थे। उस जमाने में निर्माता अपने सिनेमा में यकीन करते थे। अपने घर से पैसा लगाते थे। अब कार्पोरेट कल्चर है, 10 रुपये की चीज को हजार रुपये में बनाया जाता है।
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क्या डार्क रोल निभाने के बाद दिक्कतें होती हैं या उसे सेट पर ही निकितिन छोड़ देते हैं?
इस पर वह कहते हैं कि मेरा अगला पात्र भी डार्क ही है, जो बिहार की पृष्ठभूमि पर बना है। वह रोल एक्शन और कट के बीच सेट पर ही रहता है। ऐसे पात्र हमसे इतने दूर हैं कि इन्हें सेट के अलावा कहीं और जीने की जरुरत नहीं है। मैं मानता हूं कि कितने भी डार्क रोल करो, अपने भीतर के उजाले को बनाए रखो। ऐसे पात्रों को निभाकर आप खुद को और समझने लगते हैं। वह पात्र जो आपसे अलग हैं,उन्हें निभाने पर ही बतौर कलाकार आप आगे बढ़ सकते हैं।
रक्तांचल 3 की शूटिंग वाराणसी में हुई है। इस पर निकितिन कहते हैं कि शूटिंग के दौरान मैं वाराणसी में जब रुका था, तो वहां की गलियां छान ली थीं, मंदिर भी गया था।

