'इतनी कम उम्र में...', इन हसीनाओं ने नसीहत छोड़कर उठाया जोखिम, 'मां' बनकर रच दिया सिनेमा में इतिहास
एक समय था जब मां नायक को इस काबिल बनाती थी कि वह कहानी की दिशा मोड़ देता था, अब कई एक्ट्रेस ने करियर के पीक पर स्क्रीन पर मां का किरदार निभाकर इतिहास ...और पढ़ें
-1778237887864_m.webp)
जब रिस्क लेकर स्क्रीन पर यह एक्ट्रेसेस बनी मां / फोटो- Instagram

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। पिछले कुछ सालों में सिनेमा में मां की छवि केवल त्याग की प्रतिमूर्ति नहीं, बल्कि अपनी पहचान, अधिकार और अस्तित्व के लिए लड़ने वाली सशक्त स्त्री के रूप में सामने आई है। श्रीदेवी अभिनीत 'इंग्लिश विंग्लिश' में एक साधारण गृहिणी अपनी आत्मसम्मान की लड़ाई लड़ती है, तो 'निल बटे सन्नाटा' में एक मां अपनी बेटी के भविष्य के लिए खुद पढ़ाई करती है।
वहीं 'पा', 'मिमी', 'पंगा', 'तरला' और 'मॉम' जैसी फिल्में मां के संघर्ष, साहस और आत्मसम्मान की मिसाल बनकर उभरती हैं। इन फिल्मों में एक समानता यह है कि मां ही कहानी का केंद्र बनकर उभरती है। आने वाले समय में नेटफ्लिक्स पर रिलीज होने वाली माधुरी दीक्षित अभिनीत फिल्म 'मां बहन' भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाने की कोशिश करती नजर आएगी।
रानी को मां से मिली ताकत
हाल के वर्षों की बात करें तो सच्ची घटना से प्रेरित फिल्म 'मिसेज चटर्जी वर्सेज नॉर्वे' में रानी मुखर्जी एक ऐसी मां की भूमिका में हैं, जो अपने बच्चों को वापस पाने के लिए पूरे सिस्टम और दूसरे देश की सरकार से लड़ जाती हैं। इस बेहतरीन अभिनय के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से भी नवाज़ा गया। रानी ने कहा,
"यह फिल्म मेरे पास उस समय आई थी जब गर्भपात के कारण मैंने अपना दूसरा बच्चा खो दिया था। उस वक्त मेरे भीतर खोने का एहसास बहुत गहरा था, और जब मैंने उस फिल्म की कहानी सुनी, तो मैं उससे इतनी जुड़ गई कि मुझे लगा यह कहानी मुझे लोगों तक पहुंचानी ही है।" इस भूमिका को निभाने की प्रेरणा उन्होंने अपनी मां से ली थी।
रानी के मुताबिक, "चाहे हमें अपने हाथों से खाना खिलाना हो या हमारे माथे पर टीका लगाना, मैंने अपनी मां से ही ताकत और प्रेरणा ली है।"
बच्चे और 'हक' के लिए मां ने लड़ी कानूनी लड़ाई
मां के किरदार को भावनात्मक पहलुओं के साथ सामाजिक और कानूनी संघर्षों से भी जोड़ा गया है। उदाहरण के तौर पर यामी गौतम की हालिया फिल्म ‘हक’ प्रख्यात शाह बानो मामले से प्रेरित है। इसमें उन्होंने शाजिया बानो की भूमिका निभाई है, जो अपने अधिकारों के लिए खड़ी होती हैं। यह फिल्म मुख्य रूप से मुस्लिम पर्सनल लॉ, महिलाओं के अधिकारों और तीन तलाक के मुद्दे पर आधारित है। फिल्म में मां का किरदार निभाने को लेकर यामी कहती हैं,
खबरें और भी
"मैं सोचती थी कि पिछली सदी के सातवें और आठवें दशक में किसी महिला को अपने दम पर खड़े होने के लिए कितना साहस चाहिए होता होगा, जब न सोशल मीडिया था, न कोई तालियां, न बहसें, न समर्थन... कुछ भी नहीं। मुझे तो नहीं लगता कि वह यह भी सोच सकती थीं कि यह घटना इतना बड़ा मोड़ लेगी कि 40 साल बाद भी हम इसके बारे में बात कर रहे होंगे, या इस पर कोई फिल्म भी बनेगी। इस मायने में मैं खुद को बहुत भाग्यशाली मानती हूं कि मुझे ऐसे व्यक्ति को पर्दे पर जीने का मौका मिला जिसने इतना गहरा प्रभाव छोड़ा हो।" किरदार की तैयारी को लेकर उन्होंने कहा था, "मुझे लगता है कि मानसिक और भावनात्मक तैयारी ज्यादा महत्वपूर्ण है। उस व्यक्ति की भावनात्मक तरंगों को समझना, पहले दिल से जुड़ना और दिमाग से जुड़ना जरूरी है। शरीर की भाषा तो अपने आप आ जाती है।"
यह भी पढ़ें- Mother's Day के मौके पर के एल राहुल ने शेयर की Athiya और इवारा की अनदेखी तस्वीर, लिखा- 'मुझे और प्यार हो गया'
कृति को 'मां' का रोल निभाने से पहले मिली थी नसीहत
अभिनेत्री कृति सैनन ने फिल्म 'मिमी' में एक सरोगेट मां का किरदार निभाया, जिसके लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। लेकिन इस फिल्म को स्वीकार करने से पहले उन्हें कई तरह की नसीहतें मिली थीं। कृति के मुताबिक, "जब 'मिमी' मेरे पास आई, तो बहुत से लोगों ने सलाह दी कि 'इतनी कम उम्र में मां क्यों बन रही हो?' या 'ऐसा रोल क्यों कर रही हो? यह सरोगेसी पर आधारित है, बहुत गंभीर विषय होगा, अभी अपने करियर के शुरुआत में आर्टी फिल्में मत करो।' कुछ ने कहा कि 'तुम 15 किलो वजन बढ़ा रही हो, यह अच्छा नहीं लगेगा, आगे दूसरे काम कैसे करोगी?'" इसके बावजूद कृति ने जोखिम लिया और साबित किया कि मजबूत कहानियां कलाकारों को नई पहचान देती हैं। उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि ऐसा मौका बार-बार नहीं मिलता। नेशनल अवॉर्ड ने मुझे मानसिक रूप से एक तरह की सुरक्षा दी, जहां मुझे लगा कि अब मुझे खुद को साबित करने की जरूरत नहीं है, अब मैं बस अपने काम का आनंद ले सकती हूं।"
विद्या बालन ने उठाया था जोखिम
इसी तरह विद्या बालन ने फिल्म 'पा' में उम्र में खुद से बड़े हिंदी सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन की मां की भूमिका निभाई थी, जो शुरुआत में उन्हें बेहद असामान्य लगा था। उन्हें चेतावनी भी दी गई थी कि इतनी कम उम्र में मां का किरदार निभाने से उनका करियर प्रभावित हो सकता है। हालांकि, निर्देशक आर. बाल्की से स्क्रिप्ट सुनने के बाद उन्होंने अपने दिल की सुनी और यह जोखिम उठाया। विद्या ने माना कि एक कलाकार के लिए अपने भीतर की आवाज सुनना जरूरी है, न कि केवल बाहरी सलाहों पर निर्भर रहना। इस फिल्म के लिए सराहना बटोरने के साथ ही उन्हें कई अवॉर्ड भी मिले।
-1778237939685.jpg)
मां बनने के बाद खत्म नहीं होते सपने
इसी तरह कंगना रनौत अभिनीत फिल्म 'पंगा' दर्शाती है कि मां बनने के बाद भी महिला के सपने खत्म नहीं होते। मां होना केवल जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि अपने अस्तित्व को पहचानने और उसे जीने की एक यात्रा भी है। सही मायने में मां की असली ताकत उसकी संवेदनशीलता के साथ उसके अटूट साहस में भी निहित है। यही परिवर्तन पर्दे पर इन भूमिकाओं को खास बनाता है और मां के अदम्य साहस को सलाम करता है।
-1778237662096.jpg)
