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92 साल पुरानी भारत की सबसे सुरीली सिंगर! जिस्म पर थे 56 घाव; चेहरा छुपाने के लिए घूंघट में गाती थी गाना

Updated: Sat, 15 Aug 2026 05:31 PM (IST)

प्रयागराज की मशहूर शास्त्रीय गायिका जानकी बाई इलाहाबादी, जिन्हें 'छप्पन छुरी' के नाम से जाना जाता था, अपनी मधुर आवाज के लिए प्रसिद्ध थीं।

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एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। प्रयागराज के आजाद नगर में जर्जर सी मजार है जिसे 'छप्पन छुरी की मजार' (Chappan Chhuri) कहा जाता है। छप्पन छुरी एक बेहद खूबसूरत महिला थीं और उनकी आवाज इतनी मधुर की ब्रिटेन के जॉर्ज पंचम तक उनके मुरीद थे।

इस महिला ने तवायफ के दर्जे को ललकार कर संगीत की दुनिया में कदम रखा था। आज के प्रसंग में बात करेंगे मशहूर गायिका छप्पन छुरी उर्फ जानकी बाई (Janki Bai) की।

ठुमरी, गजल आदि गाने में थीं माहिर

जानकी बाई इलाहाबादी का जन्म 1880 में हुआ था और वो भारत के ग्रामोफोन युग की शुरुआती और बेहद प्रसिद्ध हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायिका थीं। वह प्रयागराज की रहने वाली थीं और ठुमरी, दादरा, चैती व गजल गायकी में माहिर थीं।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि गायिका एक हमेशा अपना चेहरा छुपाकर ही गाना गाती थी। क्या है वो मशहूर किस्सा और उन्हें क्यों उठाना पड़ा ऐसा कदम चलिए जानते हैं।

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काफी छोटी उम्र से शुरू कर दी थी गायिकी

जानकी गीत और संगीत में काफी रुचि रखती थीं। उन्होंने 8 साल की उम्र से ही गाना शुरू कर दिया था। जानकी की आवाज में वो जादू था कि जो एक बार उनकी आवाज सुन लेता था वो उन पर फिदा हो जाया करता था। जानकी बाई की आवाज 12 साल की उम्र में एक पुलिस कॉन्सटेबल ने सुनी और वो उनपर फिदा हो गया। तब जानकी बाई जमुना तट श्याम खेले होली गा रही थीं।

किसने किया जानकी बाई को जख्मी?

ये कॉन्सटेबल जानकी बाई से शादी करना चाहता था और जब जानकी देवी ने उसका प्रस्ताव ठुकरा दिया। तो एक दिन वो उनके घर में तलवार लेकर घुस गया और उनके चेहरे और जिस्म पर 56 वार किए। इसी के बाद से उन्हें छप्पन छुरी का नाम दिया गया।

इस जख्म से जानकी बाहर तो आ गईं लेकिन वो हमेशा से मुंह ढक कर गाना गानें लगीं। जानकी को हिंदू,उर्दू और अंग्रेजी पर अच्छी पकड़ थी। उन्होंने उर्दू में एक किताब लिखी थी दीवाने जानकी।

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ग्रामोफोन पर रिकॉर्ड करने वाली पहली महिला

जानकी पहली भारतीय महिला थीं जिनकी आवाज मार्च 1907 में पहली बार ग्रामोफोन पर रिकॉर्ड हुई। इसके लिए उन्हें 300 रुपये मिले थे। इसके बाद जानकी ने लगभग 20 सालों तक लोगों का मनोरंजन किया।

जानकी के कुछ प्रसिद्ध गीतों की बात करें तो 'समधी देखो बांका निराला है रे, तोरी बोलिया सुनै कोतवाल तूती बोलै ले, नदी नारे न जाओ स्याम पैयां परूं, तू ही बाटू जग में जवान सांवर गोरिया, बाबू दरोगा कौने करनवा धइला पियवा मोर' उनके कुछ प्रसिद्ध गाने हैं।

18 मई 1934 को अचानक जानकी का निधन हो गया। उनकी कब्र आज भी प्रयागराज के आदर्श नगर में स्थित कालाडांडा कब्रिस्तान में मौजूद है।

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