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    यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Apr 23, 2021 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

    आमिर खान की 'सरफरोश' में दिखाए गए महल के पीछे है ये दिलचस्प कहानी, फिल्म के लिए 50 साल बाद खोला गया था उसका ताला

    By Priti KushwahaEdited By:
    Updated: Sat, 24 Apr 2021 09:44 AM (IST)

    आमिर के फिल्म से जुडऩे के बाद फाइनेंसर मिलने लगे। एक साल की रिसर्च के दौरान मैं राजस्थान में काफी घूमा था। वहां के बॉर्डर एरिया पर जाकर पता चला कि ऊंट ...और पढ़ें

    Photo Credit- Sarfarosh Midday Website Photo Screenshot
    Photo Credit- Sarfarosh Midday Website Photo Screenshot

    स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। साल 1999 में रिलीज हुई फिल्म 'सरफरोश' की कहानी तत्कालीन फिल्मों के विषयों से काफी अलग थी। आमिर खान, नसीरुद्दीन शाह, सोनाली बेंद्रे और मुकेश ऋषि अभिनीत इस फिल्म से जुड़े दिलचस्प किस्से साझा किए फिल्म के निर्देशक जॉन मैथ्यू मैथन ने।

    मैं उन दिनों विज्ञापन बनाता था। एक बार जब मैं काम के सिलसिले में दिल्ली गया था, तब खालिस्तान आंदोलन चल रहा था। उसका असर दिल्ली पर भी था। शाम को छह बजे सड़कें खाली थीं। होटल की तरफ निकला तो मुझे रोका गया, पुलिस वालों ने मेरा बैग खोल के देखा तो मुझे लगा कि इस गंभीर हालात के बारे में कहानी बननी चाहिए, वहीं से इस फिल्म पर सोचना शुरू किया। मुझे पता था कि कमर्शियल फिल्म बनाने वाले इस फिल्म को फाइनेंस नहीं करेंगे। मेरे पास जो पैसा था वह इस फिल्म पर लगा दिया था। 

    उस वक्त दिल्ली में आमिर खान और जुही चावला की एक फिल्म थिएटर में लगी थी। मुझे लगा कि आमिर से संपर्क करना चाहिए। जब मैं आमिर खान के पास फिल्म लेकर पहुंचा, तो उन्होंने स्क्रिप्ट सुनते ही हां कह दिया। आमिर के फिल्म से जुडऩे के बाद फाइनेंसर मिलने लगे। एक साल की रिसर्च के दौरान मैं राजस्थान में काफी घूमा था। वहां के बॉर्डर एरिया पर जाकर पता चला कि ऊंट को कैसे बॉर्डर पार करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे लोकेशन्स ढूंढ़े जहां पहले किसी फिल्म की शूटिंग नहीं हुई थी। जैसलमेर से सौ किलोमीटर दूर मैंने एक महल में शूटिंग की थी। वह महल साल 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान पाकिस्तान का हिस्सा बनने वाला था, लेकिन आखिरी वक्त पर भारत के हिस्से में आ गया था। जिस महाराजा का उस महल पर कब्जा था, उसने उस पर ताला लगा दिया था। 

     

    50 साल बाद मैं पहला ऐसा शख्स था, जो ताला खोलकर उस महल के अंदर गया था। क्लाइमेक्स उसी महल में शूट किया था। वहां के गांव वालों के साथ शूटिंग की थी। आमिर उस गांव में काफी मशहूर थे, वह माइक पर जो बोलते थे गांव वाले चुपचाप सुन लेते थे। हमने कोई कॉस्ट्यूम डिजाइनर फिल्म में नहीं रखा था। जिस दर्जी के पास आमिर अपने कपड़े सिलवाते थे। वहीं से सामान्य कपड़े सिलाए थे। मेकअप कम से कम रखा था। मुकेश ऋषि से जब मैंने कहा था कि आपका एक टेस्ट लूंगा, तो उन्होंने कहा कि मैं दस फिल्में कर चुका हूं। मैंने कहा एक्टिंग का टेस्ट नहीं करना है, मेरे दिमाग में जो किरदार है, उसमें आप फिट होंगे या नहीं वह देखना है। अगले दिन एक स्टूडियो में मुकेश पुराने कपड़े पहनकर किरदार के गेटअप में पहुंच गए। टेस्ट में उन्हें रोने वाला सीन करना था। वह बढिय़ा हुआ वह फाइनल हो गए।  

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    हालांकि फिल्म में आमिर के साथ जो उनका गले मिलकर इमोशनल सीन था, उस शूट करने में वक्त लगा था। नसीरुद्दीन शाह के पास मैं पुलिस वाले रोल के लिए ही गया था, जिसे बाद में मुकेश ने निभाया था। उन्होंने कहा कि मैं पुलिस वाला रोल नहीं करूंगा। मैं गुलफाम हसन का किरदार करूंगा। सोनाली बेंद्रे के साथ मैं तीन-चार विज्ञापन कर चुका था। वहां से उनका सलेक्शन हुआ था। पहले दिन की शूटिंग हमने दिल्ली के एक कॉलेज में की थी। वहां पहला सीन हुआ, जिसमें सोनाली बैठी हैं। वह स्कार्फ टेबल पर छोड़कर उठ जाती हैं और आमिर आकर वह स्कार्फ उठाते हैं। सेट पर कोई जूनियर आर्टिस्ट नहीं थे, सारे कॉलेज स्टूडेंट्स थे। सबसे मुश्किल था फिल्म का क्लाइमेक्स शूट करना। जैसलमेर में हमने कई दिनों तक शूटिंग की थी। आमिर को शाम चार बजे बुलाया जाता था

     

     

     

     

     

     

     

     

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    नसीर साहब को जल्दी शॉट लेकर छोड़ देते थे, ताकि उन्हें नींद सही से मिले। नसीर साहब और आमिर के बीच जो आखिरी सीन था, वह मुझे पसंद नहीं आ रहा था। दो साल लगे फिल्म की शूटिंग पूरी होने में। मुंबई लौटकर मैंने जैसलमेर का सेट स्टूडियो के भीतर लगाया और उसे दोबारा शूट किया। क्लाइमेक्स का आधा सीन जैसलमेर और आधा मुंबई का है। 

    फिल्म में मुझे एक गजल चाहिए थी, किसी ने मुझे निदा फाजली से मिलवाया था। मैं किसी को फिल्म की कहानी नहीं बताना चाहता था कि इसमें पाकिस्तान का भी एक एंगल है। मैंने उनसे कहा कि ऐसी गजल लिखिए, जिसमें प्यार की बात हो। सात-आठ गजल लिखने के बाद उन्होंने मुझसे कहा कि तुम्हें क्या चाहिए मैं समझ नहीं पा रहा हूं। मैं उन्हें बता नहीं पा रहा था कि जब तक दोनों मुल्कों में इश्क वाला संबंध नहीं होगा, तो चीजें सुलझ नहीं सकती हैं। उन्होंने मुझे एक शेर सुनाया, मैंने उन्हें कहा कि यही चीज गाने में चाहिए। फिर उन्होंने होशवालों को खबर क्या जिंदगी क्या चीज है... गजल लिखी।