Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    स्पेशल टेक्नोलॉजी से बनाई The Odyssey, ऑस्कर विनर डायरेक्टर क्रिस्टोफर नोलन ने फिल्म को लेकर खोले कई राज

    By Smita SrivastavaEdited By: Ashish Rajendra
    Updated: Wed, 15 Jul 2026 03:35 PM (GMT+05:30)

    हॉलीवुड के ऑस्कर विनर निर्देशक क्रिस्टोफर नोलन ने अपनी बहुचर्चित फिल्म द ओडिसी को लेकर खुलकर बात की है। ...और पढ़ें

    द ओडिसी डायरेक्टर (फोटो क्रेडिट- एक्स)

    द ओडिसी डायरेक्टर (फोटो क्रेडिट- एक्स)

    HighLights

    1. स्पेशल तकनीकि से बनाई द ओडिसी

    2. क्रिस्टोफर नोलन की बहुचर्चित फिल्म

    3. नोलन ने इंडिया में किया द ओडिसी का प्रमोशन

    स्मिता श्रीवास्‍तव, मुंबई ब्‍यूरो। द डार्क नाइट', 'इंसेप्शन' और ऑस्कर विजेता 'ओपेनहाइमर' जैसी फिल्मों के लिए मशहूर हॉलीवुड निर्देशक क्रिस्टोफर नोलन इस बार अपनी नई फिल्म 'द ओडिसी' लेकर आए हैं। यह फिल्म प्राचीन यूनानी कवि होमर के कालजयी महाकाव्य ओडिसी पर आधारित है।

    ट्राय के युद्ध के बाद नायक ओडीसियस की अपने घर इथाका लौटने की दस वर्षों की रोमांचक, संघर्षपूर्ण और आत्म-खोज से भरी यात्रा पर केंद्रित यह महाकाव्य साहस, धैर्य, प्रेम, निष्ठा और मानवीय जिजीविषा की अनूठी कहानी कहता है। नोलन ने आइमैक्‍स कैमरे पर शूट की गई अपनी इस महत्वाकांक्षी फिल्म, इसकी तकनीक जैसे पहलुओं पर खास बातचीत की :

    आप पहले भी मुंबई आ चुके हैं। भारत के साथ आपका रिश्ता समय के साथ कैसे विकसित हुआ है?

    मुझे भारत आना हमेशा बेहद पसंद है। यहां फिर से लौटकर बहुत अच्छा लग रहा है, खासकर मुंबई में। यह एक शानदार शहर है। मैं पहली बार द डार्क नाइट राइजेज (The Dark Knight Rises) की शूटिंग के लिए जोधपुर आया था। उस दौरान मुझे भारत के अलग-अलग हिस्सों में घूमने, यहां के नजारों, संस्कृति और माहौल को करीब से देखने और महसूस करने का मौका मिला। यह देश वास्तव में अद्भुत है।

    The Odyssey (3)

    इसके बाद मुझे टेनेट फिल्‍म की शूटिंग मुंबई में करने का अवसर मिला। यहां की स्थानीय फिल्म यूनिट के साथ काम करना और भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के साथ जुड़ना मेरे लिए एक शानदार अनुभव और सौभाग्य की बात थी। हालांकि, इससे पहले मुझे कभी भारत में अपनी किसी फिल्म का प्रीमियर करने का मौका नहीं मिला था, लेकिन इस बार द ओडिसी का प्रीमियर मुंबई में कर पाए।

    खबरें और भी

    The Odyssey (2)

    दुनिया में सबसे पहले जिन जगहों पर दर्शक इस फिल्म को सबसे पहले देख रहे हैं, उनमें भारत भी शामिल है। मैं जब पहली बार भारत आया था, तभी से मेरी इच्छा थी कि किसी फिल्म का प्रीमियर यहां करूं, क्योंकि इस देश में सिनेमा के प्रति लोगों का जो जुनून और प्यार है, वह सचमुच प्रेरित करने वाला है।

    एमा थामस (फिल्‍म की निर्माता और नोलन की पत्‍नी) ने द ओडिसी को बेहद चुनौतीपूर्ण बताया था। तो इस फिल्म को शुरू करने से पहले आप दोनों को सबसे बड़ा डर किस बात का था?

    मुझे लगता है कि इस कहानी का सबसे बड़ा आकर्षण ही इसका विशाल पैमाना है, लेकिन निर्माता के तौर पर यही सबसे बड़ी चुनौती भी बन जाता है। आप बैठकर सोचते हैं कि आखिर हम इसे पूरा कैसे करेंगे? खासकर इसलिए क्योंकि एक निर्देशक के रूप में मैं हमेशा दर्शकों को कहानी का वास्तविक अनुभव कराना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि उन्हें ऐसा महसूस हो जैसे वे सचमुच ओडीसियस की नाव पर सवार हों या साइक्लोप्स (एक आंख वाले दैत्य) की गुफा के भीतर मौजूद हों।

    The Odyssey

    यही बात सबसे ज्यादा डराने वाली थी। हम लगातार सोच रहे थे कि इन इतने बड़े और भव्य दृश्यों को आखिर कैसे फिल्माएंगे। साथ ही, कहानी में मौजूद फैंटेसी के तत्वों को भी शामिल करना जरूरी था, क्योंकि वे इस कथा का अहम हिस्सा हैं, लेकिन चुनौती यह थी कि उन फैंटेसी तत्वों को फिल्म के बाकी हिस्सों के टोन और यथार्थ के साथ संतुलित तरीके से कैसे पेश किया जाए। यही वह चीज थी, जो मुझे बहुत चुनौतीपूर्ण लगी।

    जेम्स कैमरून जैसे फिल्मकारों ने अवतार जैसी फिल्मों के लिए नई तकनीकें विकसित कीं। वहीं आपकी फिल्म आइूमैक्‍स कैमरे पर शूट हुई। क्या आपको लगता है कि महान सिनेमा की जिम्मेदारी सिर्फ बेहतर कहानियां सुनाना ही नहीं, बल्कि तकनीक को भी आगे बढ़ाना है?

    मुझे लगता है कि ऐसा होना चाहिए और आदर्श स्थिति यही है कि कहानी और तकनीक, दोनों साथ-साथ आगे बढ़ें। जेम्स कैमरून के काम की सबसे बड़ी खासियत मुझे हमेशा यही लगी है कि उन्होंने तकनीक को कहानी को बेहतर ढंग से कहने के लिए विकसित किया। मैं भी खुद को उसी परंपरा का हिस्सा मानना पसंद करता हूं। मेरे लिए आइमैक्‍स की सीमाओं को आगे बढ़ाना एक पुराने सपने को पूरा करने जैसा था।

    The Odyssey (1)

    मैं हमेशा से इस बेहतरीन इमेजिंग फॉर्मेट का इस्तेमाल करके कहानी कहना चाहता था। हमें पहले से पता था कि आइमैक्‍स बड़े एक्शन दृश्यों और शानदार प्राकृतिक नजारों को बेहद प्रभावशाली बना सकता है, लेकिन मेरी असली जिज्ञासा यह थी कि क्या यह फार्मेट दर्शकों को किरदारों के और भी करीब ला सकता है? क्या यह उनके सबसे भावनात्मक और मानवीय पलों को पहले से कहीं ज्यादा गहराई से महसूस करा सकता है?

    The Odyssey (5)

    उदाहरण के लिए, आइमैक्‍स में किसी इंसान की आंखों में पड़ती रोशनी को देखना अपने आप में बेहद खूबसूरत अनुभव है। मुझे इस बात पर गर्व है कि मेरा काम उस तकनीकी विकास का हिस्सा रहा है, जिसने सिनेमा को लगातार आगे बढ़ाने में योगदान दिया है। मैं यह देखने के लिए उत्साहित हूं कि दूसरे फिल्मकार इस तकनीक का किस तरह इस्तेमाल करेंगे। लेकिन मेरे लिए तकनीक का उपयोग हमेशा कहानी की जरूरतों से प्रेरित रहा है और आगे भी रहेगा।

    मारा उद्देश्य हमेशा ऐसी तकनीक विकसित करना होना चाहिए, जो जिस कहानी को हम कहना चाहते हैं, उसे सबसे प्रभावशाली और बेहतरीन तरीके से पर्दे पर प्रस्तुत करने में मदद करे।

    सिनेमा में ऐसी कौन-सी तकनीकी सीमा है, जिसे आप चाहते हैं कि इंजीनियर दूर करें? इसलिए नहीं कि वह असंभव है, बल्कि इसलिए क्योंकि वह कहानी कहने की संभावनाओं को सीमित करती है।

    यह जवाब देना थोड़ा मुश्किल है। हमने आईमैक्स तकनीक को काफी आगे बढ़ाया है और इसकी तकनीकी खूबियां वाकई शानदार हैं। लेकिन अभी भी हमें एक बहुत बड़े और भारी कैमरे के साथ काम करना पड़ता है, जिसका वजन 300 पाउंड (करीब 136 किलोग्राम) से भी ज्यादा होता है।

    इसके अलावा, कैमरे की मैगजीन में फिल्म की क्षमता भी काफी कम होती है। मैं यह देखने के लिए उत्साहित हूं कि हमने आईमैक्स के साथ जो तकनीक विकसित की है, उसका दूसरे फिल्मकार किस तरह इस्तेमाल करते हैं। साथ ही, मुझे यह भी लगता है कि अगर भविष्य में कैमरे छोटे और हल्के हो जाएं और उनकी फिल्म मैगजीन की क्षमता बढ़ जाए, तो ज्यादा से ज्यादा फिल्मकारों को अलग-अलग तरह की कहानियां कहने के लिए इस तकनीक का इस्तेमाल करने का अवसर मिलेगा।

    आपने द ओडिसी की शूटिंग कई देशों की वास्तविक लोकेशनों पर की। वर्चुअल प्रोडक्शन के इस दौर में भी इस कहानी के लिए असली लोकेशनों पर शूट करना इतना जरूरी क्यों था?

    मेरा हमेशा से यह मानना रहा है कि तकनीकी स्तर पर विजुअल इफेक्ट्स और वास्‍तविक सिनेमेफोटोग्राफी के बीच संतुलन को फिल्मकार को बहुत सोच समझकर तय करना चाहिए। यह इस बात पर निर्भर करता है कि फिल्म का टोन क्या है और पूरी फिल्म में उस टोन की निरंतरता कैसे बनाए रखी जाए।

    मुझे यकीन है कि दर्शक भी किसी न किसी स्तर पर यह आसानी से महसूस कर लेते हैं कि स्क्रीन पर जो कुछ दिख रहा है, वह वास्तव में कैमरे से फिल्माया गया है या फिर अधिकांश हिस्‍सा कंप्यूटर के जरिए तैयार किया गया है। इसलिए हम विजुअल इफेक्ट्स का इस्तेमाल वहीं करते हैं, जहां उनकी सबसे ज्‍यादा जरूरत होती है।

    यानी असली दुनिया में, असली लोगों और असली जगहों पर शूट किए गए दृश्यों को और बेहतर बनाना, उन्हें दूसरे दृश्य तत्वों के साथ जोड़ना और उन्हें थोड़ा ज्‍यादा प्रभावशाली बनाना, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में हम हमेशा यह ध्यान रखते हैं कि दृश्य की असली और प्राकृतिक अनुभूति बनी रहे, ताकि वह वास्तविक लगे।

    आपकी फिल्मों में अक्सर ऐसे असाधारण किरदार दिखाई देते हैं, जिन्हें असंभव लगने वाले फैसले लेने पड़ते हैं। आपके जीवन का वह कौन-सा एक फैसला था जिसने आपकी यात्रा की दिशा सबसे ज्‍यादा बदल दी?

    मैं ऐसे पेशे में काम करता हूं, जहां निर्देशक होने की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि आपको हर दिन सैकड़ों नहीं, बल्कि हजारों फैसले लेने पड़ते हैं। उनमें से कुछ सही साबित होते हैं और कुछ गलत। लेकिन क्योंकि आप लगातार फैसले लेते रहते हैं, इसलिए हर नया दिन अपने साथ नई चुनौतियां और नए फैसले लेकर आता है। हर दिन आपको अपनी दिशा तय करने और आगे का रास्ता बनाने का मौका मिलता है।

    इसी वजह से मैं अपनी जिंदगी को ऐसे नहीं देखता कि हर मोड़ पर सिर्फ दो ही रास्‍ते हों और उनमें से एक चुनना पड़े। मेरे लिए यह एक लगातार विकसित होने वाली यात्रा है, जिसमें मैं हर दिन छोटे-छोटे फैसलों के जरिए अपने जहाज को सही दिशा में आगे बढ़ाने की कोशिश करता हूं।

    आपने फिल्‍म टेनेट में डिंपल कपाड़िया के साथ काम किया था। क्या आपको लगता है कि अपनी प्रतिभा और लंबे अनुभव के बावजूद भारतीय कलाकारों को आज भी वैश्विक सिनेमा में वह प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया है, जिसके वे हकदार हैं?

    निश्चित रूप से। मेरा मानना है कि इसकी एक वजह फिल्म वितरण (डिस्ट्रिब्यूशन) का पुराना मॉडल भी रहा है, जिसमें अलग-अलग देशों की फिल्‍में अपने अपने दायरे तक सीमित रहती थी। लेकिन कुछ साल पहले फिल्‍म आरआरआर की सफलता देखें तो वह एक महत्‍वपूर्ण उदाहरण है कि भारतीय फिल्‍म का खासकर अमेरिकी बाजार में इतनी बड़ी सफलता हासिल करना बेहद अहम है। अमेरिका दुनिया के सबसे बड़े फिल्म बाजारों में से एक है।

    कई फिल्मों में वैश्विक कमाई का करीब आधा हिस्सा सिर्फ अमेरिकी बाजार से आता है। ऐसे में अमेरिका और अन्य पश्चिमी बाजारों में बढ़ती पहुंच दुनिया भर के फिल्मकारों के लिए नई संभावनाएं खोलती है, खास तौर पर भारतीय फिल्मकारों के लिए।

    द ओडिसी को बनाते हुए क्या आपने खुद के बारे में कुछ नया खोजा?

    इस समय इस सवाल का जवाब देना मेरे लिए थोड़ा मुश्किल है। मैं फिल्में सिनेमाघर के दर्शकों के लिए बनाता हूं। इसलिए मेरे लिए कोई भी फिल्म तब तक पूरी नहीं होती, जब तक वह दर्शकों तक नहीं पहुंच जाती। आखिरकार वही मुझे बताते हैं कि फिल्‍म उनके लिए क्‍या मायने रखती है और उन्‍होंने उसे किस रुप में अपनाया। फिलहाल मेरे लिए यह दौर जितना रोमांचक है, उतना ही घबराहट भरा भी है।

    मैं इस इंतजार में हूं कि लोग फिल्म देखकर उसके बारे में क्या सोचते हैं और उसे किस तरह समझते हैं। इसी वजह से इस समय अपने बारे में गहराई से आत्ममंथन करना मेरे लिए आसान नहीं है। मुझे लगता है कि जब फिल्म रिलीज हो जाएगी तब शायद मैं इस सवाल का बेहतर जवाब दे पाऊंगा।

    क्या आपको लगता है कि भारत की कोई ऐसी ऐतिहासिक घटना, साहित्यिक कृति या कहानी है, जिसे वैश्विक स्तर पर बड़े सिनेमाई रूपांतरण के तौर पर पेश किया जाना चाहिए?

    मैं इस विषय का बहुत गहरा जानकार नहीं हूं, लेकिन यह जानकर उत्साहित हुआ कि ओडिसी और भारतीय महाकाव्यों के बीच कुछ समानताएं हैं। ओडिसी पश्चिमी साहित्य की एक आधारभूत और अत्यंत महत्वपूर्ण कृति है। मुझे बताया गया है कि इसकी कुछ विषयवस्तुएं और विचार भारतीय महाकाव्यों तथा भारतीय साहित्य से भी मेल खाते हैं। मैं इसके बारे में और अधिक जानने के लिए उत्सुक हूं, लेकिन फिलहाल इस विषय में मेरी गहरी जानकारी नहीं है।