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Batwara 1947 Review: विभाजन का दर्द, मजहबी दीवार... शानदार हैं शबाना; भावनाओं के सैलाब में सिमटी सनी की फिल्म

Updated: Fri, 14 Aug 2026 03:40 PM (IST)

सनी देओल (Sunny Deol) की फिल्म 'बंटवारा 1947' (Batwara 1947 Review) विभाजन के दर्द और इंसानियत की कहानी कहती है, जिसमें शबाना आजमी का अभिनय दमदार है। अब फिल्म देखें या ना देखें, जानने के लिए पढ़िए पूरा रिव्यू

भावनाओं के सैलाब में सिमटी सनी की फिल्म

भावनाओं के सैलाब में सिमटी सनी की फिल्म

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अंकित सिंह तोमर, नई दिल्ली। 'कोई भी मजहब अच्छा या बुरा नहीं होता है, अच्छा या बुरा तो इंसान होता है', बस इसी फलसफे के ताने-बाने से बुनी है 'बंटवारा 1947' (Batwara 1947 Movie)। सनी देओल की मचअवेटेड फिल्म आज सिनेमाघरों की दहलीज तक पहुंच गई है। फिल्म में बंटवारे का दर्द है, तो मजहबी दीवार भी है, तो वहीं भावनाओं का सैलाब इस कदर आया कि मानो सिनेमाघरों में बैठे हर दूसरे शख्स की आंखों में शायद आंसू ही थे।

आमतौर पर सनी देओल (Sunny Deol Movies) की फिल्मों से दर्शकों को अलग उम्मीद होती है, लेकिन ये उनकी बाकी फिल्मों से बेहद हटकर है। यह फिल्म बंटवारे के दर्द को कुछ इस कदर बयां करती है कि इसमें मजहब और इंसानियत की एक अलग ही तस्वीर दिखती है। अब बंटवारे के दर्द में सिमटी यह कहानी क्या वाकई दिल को छूती है, या सिर्फ भावनाओं के ढर्रे पर ही सिमटकर रह जाती है? आइए जानते हैं।

क्या है फिल्म की कहानी?

फिल्म की कहानी की शुरूआत बंटवारे से ही शुरू होती है। जहां सिकंदर मिर्जा (Sunny Deol), अपनी पत्‍नी हमीदा मिर्जा (Preity Zinta), बेटे जावेद (Karan Deol) और बेटी तनु (Khushi Hazare) के साथ रहता है। इसी बीच दंगे शुरू होते हैं और माहौल तनावपूर्ण होता है तो सिंकदर अपने पूरे परिवार के साथ लाहौर चला जाता है।

यहां आकर पहले वो परिवार के साथ कैंप्स में रुकता है और फिर हबीब (Ali Fazal) की मदद से उन्हें एक हवेली रहने को मिल जाती है। ये हवेली दुर्गावती किशनपाल देवी (Shabana Azmi) की होती है, जहां वो अपने परिवार से साथ रहती थीं। लेकिन दंगो और बंटवारे में उनके परिवार की हत्या कर दी जाती है। ऐसे में वो अकेले ही उस हवेली में छुपकर रहती हैं।

Sunny 1947

परिवार के साथ जब सिकंदर मिर्जा हवेली में पहुंचता है तो वो दुर्गावती को निकालने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाता है, पर दुर्गावती अपने घर को छोड़ने के लिए तैयार नहीं होती हैं और अपने बेटे के इंतजार में बैठी हैं। फिर यहीं से मजहब की दीवार टूटती है और दुर्गावती को सिंकदर अपनी माई (मां) मानने लगता है।

इस बीच दुर्गावती को पाकिस्तान से भगाने के लिए सब एकजुट होते हैं। यहीं पर याकूब खान (Abhimanyu Singh) दुर्गावती को भगाने के लिए हर जतन करता है। वो खुद को अपने धर्म का रखवाला बताता है और वो कट्टर हिंदू विरोधी है। इस बीच सिंकदर का बेटा जावेद (Karan Deol) भी अपने पिता और परिवार के खिलाफ जाकर याकूब की मदद करता है। देश और धर्म से ऊपर बढ़कर सिकंदर अपनी माई की ढाल बनता है और उनकी रक्षा करता है।

Ali Fazal

ऐसे में एक मां और बेटे के बीच से सभी धर्म की दीवारें टूट तो जाती हैं, अब क्या वाकई में सिकंदर दुर्गावती की रक्षा कर पाएगा? क्या धर्म और देश की सीमाओं से परेय दुर्गावती पाकिस्तान में अपना घर बना पाएंगी या नहीं? यही कहानी फिल्म में दिखाई गई है।

राजकुमार संतोषी का डायरेक्शन अधूरा

इस फिल्म के जरिए राजकुमार संतोषी ने एक बार फिर से सनी देओल के साथ हाथ मिलाया है। घायल, दामिनी, घातक जैसी शानदार फिल्मों के बाद राजकुमार संतोषी ने सनी देओल के साथ बटवारा 1947 से वापसी की। हालांकि फिल्म में उनका डायरेक्शन अधूरा सा लगता है। फिल्म की शुरूआत से ही ऐसा लगता है कि जैसे कहानी को सीधे ही पर्दे पर उतार दिया गया। हर थोड़ी देर में फिल्म में भावनाओं का सैलाब आ जाता है।

Shanbana

थोड़ी-थोड़ी देर में आने वाले इमोशनल सीन कहानी से जुड़ाव महसूस करा पाने में असमर्थ हो जाते हैं। फिल्म की कहानी को राजकुमार संतोषी और असगर वजाहत ने लिखा है। फिल्म के डायलॉग्स तो कमाल लगते हैं, लेकिन कहानी में जरूरत से ज्यादा ठहराव इसे बोरिंग बनाने लगता है। किरदारों की भूमिका बनती है, दूसरे पात्र भी इसमें जुड़ते हैं लेकिन संतुलन बिगड़ता है और कहानी अधूरी सी लगती है। इमोशन इतने दिखाए गए कि दूसरे पात्रों की कहानी के साथ न्याय नहीं हो पाता है।

फिल्म में दमदार हैं शबाना आजमी

फिल्म (Batwara 1947 Review) के किरदारों की बात करें तो सनी देओल ने फिल्म में अपनी भावनाएं सही उकेरी हैं। सिकंदर मिर्जा के किरदार में वो भावनाओं का बैलेंस बनाने में सफल रहे। एक्शन सीन्स में सनी देओल (Sunny Deol Batwara 1947) हमेशा की तरह शानदार लगे हैं। उनकी रौबदार और गड़गड़ाहट भरी आवाज के डायलॉग्स आपको ताली बजाने पर मजबूर जरूर करते हैं।

Preiy

वहीं हमीदा के किरदार में ठीक लगी हैं, लेकिन उनके किरदार को और बेहतर ढंग से लिखा जा सकता था। वहीं फिल्म में करण देओल अपने पापा सनी देओल के साथ ऑनस्क्रीन भी बेटे के किरदार में नजर आए। हालांकि यहां उनके किरदार की प्रेमकहानी को अधूरा ही छोड़ दिया गया। कनिका कपूर के साथ उनकी लवस्टोरी कहां शुरू हुई और कहां खत्म, ये पता तक नहीं चला। पूरी फिल्म में शबाना आजमी का किरदार बेहद शानदार रहा है।

दुर्गावती के रोल में शबाना आजमी कमाल दिखती हैं। पंजाबी लहजे में उनके डायलॉग्स जब आते हैं तो वो माई के रूप में भावनाओं का चित्रण बखूबी कर जाती हैं। स्क्रीन पर वो कई बार उनके डायलॉग्स रुलाने पर भी मजबूर कर देते हैं। अभिमन्यु सिंह खलनायक के किरदार में दिखे हैं, लेकिन वो ऐसे नहीं लगे, जिसे देखकर पर्दे पर खौफ नजर आए। अली फजल को स्क्रीन पर ज्यादा दिखाया जा सकता था।

देखने लायक है फिल्म?

फिल्म (Batwara 1947 Story) की कहानी में बेहद ठहराव है, वहीं कहानी को बेहतर ढंग से पेश किया जा सकता था। मां-बेटे के रिश्ते से ऊपर फिल्म में बंटवारे के दूसरे दृश्यों को और सही ढंग से पेश किया जा सकता था। वीएफएक्स और संगीत उतना प्रभावशाली नहीं है। हालांकि बैकग्राउंड स्कोर कहानी और भावनाओं के साथ थोड़ा जुड़ाव महसूस जरूर कराता है।

शबाना आजमी (Shabana Azmi Batwara 1947) का किरदार कहने को नजरबंद है, लेकिन लाहौर के जिस कट्टरपंथी इलाके में वो रहती हैं, वहां वो आसानी से बाजार घूमकर आती हैं और कोई उन्हें कुछ नहीं कहता, ये हजम नहीं होता है। फिल्म की कहानी महज मां-बेटे के रिश्ते और धर्म की दीवारों तक ही सिमट कर रह गई। बंटवारे को भी सही ढंग से पेश नहीं किया गया।

Abhimantyu

कहानी महज लाहौर के मोहल्ले तक ही रह गई। मशहूर राइटर असगर वजाहत ने अपने 1989 के मशहूर नाटक 'जो लाहौर नई वेख्या, ओ जम्या ए नई' पर फिल्म की कहानी को राजकुमार संतोषी (Rajkumar Santoshi) के साथ लिखा है। हालांकि फिल्म को बनाने के पीछे का उद्देश्य अच्छा है पर इसे और बेहतर तरीके से पेश किया जा सकता था।

पाकिस्तान और विभाजन के दौर में उलझी इस फिल्म में 1947 के बंटवारे की दर्दनाक टीस भी है और मजहब की आड़ में खड़ी दीवारें भी। लेकिन इसमें बहता भावनाओं का सैलाब इसकी कहानी को अधूरा छोड़ जाता है।