Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jan 10, 2025 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

    Match Fixing Review: सवाल बड़े लेकिन कहानी की पिच पर फिसल गई 'मैच फिक्सिंग', यहां पर पढ़ें पूरा रिव्यू

    Updated: Fri, 10 Jan 2025 05:03 PM (IST)

    क्रिकेट के मैदान में तो मैच फिक्सिंग आपने कई बार होती देखी होगी लेकिन इस बार ये फिक्सिंग राजनीति के मैदान में हुई है। केदार गायकवाड के निर्देशन में बन ...और पढ़ें

    मैच फिक्सिंग-द नेशन एट स्‍टेक रिव्यू/ फोटो- Jagran Graphics
    मैच फिक्सिंग-द नेशन एट स्‍टेक रिव्यू/ फोटो- Jagran Graphics

    स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। मैच फिक्सिंग का जिक्र आने पर दिमाग में क्रिकेट का नाम कौंधता है। हालांकि हर मैच खेल के मैदान पर फिक्‍स नहीं होता। कुछ मैच राजनीति के पिच पर भी फिक्‍स होते है। नए साल की शुरुआत मैच फिक्सिंग से हो रही है।

    पूर्व सैन्‍य अधिकारी कर्नल कंवर खटाना की किताब 'द गेम बिहाइंड सैफ्रन टेरर' पर आधारित यह फिल्‍म दिखाती है कि किस प्रकार राजनीतिक साजिश ने उनकी जिंदगी को प्रभावित किया। किस प्रकार शक्तिशाली राजनेता ने वोट की राजनीति के चलते देश में हिंदू आतंकवाद नैरटिव को गढ़ने के लिए पाकिस्‍तान का सहयोग किया।

    समझौता एक्सप्रेस से लेकर 26/11 हमले की कहानी दर्शाती फिल्म

    फिल्‍म का आरंभ साल 2007 से होता है जब भारत पाकिस्‍तान के प्रतिनिधि एकदूसरे से मुलाकात कर रहे थे ताकि मतभेदों को दूर किया जा सके। उसी दौरान समझौता एक्‍सप्रेस पर आतंकी हमला होता है। उधर, अपनी दागदार छवि से परेशान पाकिस्‍तान के हुक्‍मरान इस हमले को अलग रंग देने की कोशिशों में जुट जाते हैं।

    यह भी पढ़ें: Fateh Review: 'विषय सॉलिड कमजोर कहानी', क्या बॉक्स ऑफिस पर होगी Sonu Sood की 'फतेह'? पढ़ें रिव्यू

    इसके तहत भारतीय सैन्‍य अधिकारी कर्नल अविनाश पटवर्धन (विनीत कुमार सिंह) को बलि का बकरा बनाना तय करते हैं, जो देश में विभिन्न आतंकवादी हमलों और बम विस्फोटों के बीच संबंधों को उजागर करते हैं। अविनाश पुणे ट्रांसफर लेकर आते हैं। यहां पर उन्‍हें देशविरोधी तत्‍वों के सक्रिय होने की जानकारी मिलती है। उधर पाकिस्‍तान भारत पर हमले की तैयारी कर रहा होता है। इस बीच सत्तारूढ़ पार्टी के बड़े नेता पाकिस्‍तान के साथ साठगांठ के चलते अविनाश को एक बड़ी साजिश का मोहरा बना देते है।

    खबरें और भी

    Photo Credit- Youtube Video 

    कहानी समझौता एक्सप्रेस में हुए बम धमाकों से शुरू होकर, मालेगांव बम ब्लास्ट और 26/11 हमलों के घटनाक्रमों को दिखाती है। फिल्म में यह भी दर्शाया गया है कि अविनाश ने 26/11 हमला होने की जानकारी एकत्रित कर ली थी। अविनाश हिरासत में रहने के दौरान थर्ड डिग्री की प्रताड़ना देने वाले एटीएस प्रमुख किशोर कर्माकर (किशोर कदम) के साथ जानकारी साझा करते हैं, लेकिन वह उस फाइल को रद्दी में फेंक देते हैं। अगर इस जानकारी को गंभीरता से लिया जाता तो शायद मुंबई हमले को रोका जा सकता है। इस जानकारी को हल्‍के में लेने वाले कर्माकर उसी आतंकी हमले में शहीद हो जाते हैं।

    Photo Credit- Youtube Video

    क्या-क्या चीजें फिल्म में करेंगी आपको कंफ्यूज?

    फिल्‍म को काल्‍पनिक बताया गया है लेकिन स्‍पष्‍ट रूप से तत्‍कालीन सरकार के कई नेताओं को कटघरे में खड़ा करती हैं। पात्रों के लुक से इन चिरपरिचित राजनेताओं को पहचानना आसान होगा। हालांकि यह कार्टून ज्‍यादा लगते हैं। सिनेमेटोग्राफी से डायरेक्शन में कदम रखने वाले केदार गायकवाड निर्देशित यह फिल्म पाकिस्तानी सेना के षड्यंत्र, भ्रष्‍टाचार, राजनीतिक चालों, देश के जाबांज अधिकारियों के समर्पण के साथ आतंकवादियों और राजनेताओं के बीच गठजोड़ जैसे पहलुओं को शामिल करती है लेकिन उनके साथ समुचित न्‍याय नहीं कर पाती। अविनाश की बहादुरी, ईमानदार के बावजूद सेना उसके साथ खड़ी नजर नहीं आती।

    फिल्‍म में साध्‍वी का जिक्र भी है। साध्‍वी ने अविनाश को क्‍यों दान दिया? यह स्‍पष्‍ट नहीं किया गया है। अविनाश को हिरासत में प्रताडि़त करने का प्रसंग हो या पारिवारिक पक्ष उसमें इमोशन की कमी साफ झलकती है। पाकिस्‍तानी पक्ष का चित्रण भी कमजोर है। आतंकी हाफिद सईद, जकीउर रहमान का ट्रेनिंग प्रसंग बहुत बचकाना लगा। अगर आप इन घटनाक्रम से वाकिफ नहीं है तो कहानी समझने में भी दिक्‍कत पेश आ सकती है।

    किन सितारों ने अपने किरदार के साथ किया न्याय? 

    कलाकारों में विनीत कुमार सिंह ने अविनाश के साहस, कठिनाइयों और जिजीविषा को समुचित तरीके से अंगीकार किया है। उनकी पत्नी की भूमिका में अनुजा साठे खूबसूरत लगी हैं। हालांकि उनके हिस्‍से में कोई दमदार सीन नहीं आया है। पाकिस्‍तानी राष्‍ट्रपति मुशर्रफ की भूमिका में मनोज जोशी हैं।

    मुशर्रफ अपने तेजतर्रार मिजाज के लिए विख्‍यात थे। मनोज उनके व्‍यक्तित्‍व के आसपास नजर नहीं आते। कर्नल इमाम की भूमिका में अर्जुन राज का काम उल्‍लेखनीय है। वह अपनी लय बनाए रखते हैं। एक सिपाही कर दे तबाही... कहानी के साथ सुसंगत है। यह फिल्‍म बेहतरीन राजनीतिक थ्रिलर बन सकती थी अगर पटकथा और स्‍क्रीन प्‍ले पर बारीकी से काम किया जाता।

    यह भी पढ़ें: Baby John Review: ये कैसा क्लाइमैक्स है! Pushpa 2 को छोड़कर बेबी जॉन देखने का बना रहे हैं मन, यहां पढ़ें रिव्यू