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    Subedaar Review: अनिल कपूर- राधिका मदान की एक्टिंग ने जीती बाजी, उलझी कहानी ने बिगाड़ा खेल

    By Smita SrivastavaEdited By: Tanya Arora
    Updated: Thu, 05 Mar 2026 04:15 PM (IST)

    अनिल कपूर और राधिका मदान स्टारर फिल्म 'सूबेदार' ओटीटी प्लेटफॉर्म अमेजन प्राइम वीडियो पर आ चुकी है। इस फिल्म में रेत माफिया से लेकर सत्ता, महिला सुरक्ष ...और पढ़ें

    सूबेदार मूवी रिव्यू/ फोटो- Instagram

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    स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। निर्देशक सुरेश त्रिवेणी ने अपनी नई फिल्म सूबेदार को पिछली सदी के 8वें दशक के मेनस्ट्रीम सिनेमा को समर्पित बताया है, जिस सिनेमा को देखकर वह बड़े हुए हैं। उन्‍होंने इसे अभिनेता अनिल कपूर के मशहूर किरदार ‘मुन्ना’ (फिल्म तेजाब) की विरासत को भी ट्रिब्‍यूट बताया था। वह समय जब हिंदी फिल्मों का नायक गुस्सैल होता था, अन्याय के खिलाफ आवाज उठाता था और अकेले ही कई लोगों से भिड़ जाने की क्षमता रखता था।

    सूबेदार भी उसी मिजाज की फिल्म है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां नायक कोई युवा नहीं बल्कि सेना से सेवानिवृत्त सूबेदार है। हालांकि, कई दिलचस्प विचारों के बावजूद उलझी हुई पटकथा और पात्रों का अधूरा विकास फिल्म को पूरी तरह प्रभावी बनने से रोक देता है।

    क्या है सूबेदार की कहानी?

    फिल्म की कहानी का बैकड्रॉप एक छोटे कस्बे में सक्रिय अवैध रेत खनन का है। जेल में बंद बबली दीदी (मोना सिंह) का अवैध रेत तस्करी का धंधा बाहर से ही संचालित होता रहता है। इस पूरे नेटवर्क को उसका सौतेला भाई प्रिंस (आदित्य रावल) और उसका साथी साफ्टी (फैसल मलिक) संभालते हैं। अवैध खनन की वजह से एक साल के भीतर 15 बच्चों की मौत ने लोगों के गुस्से को और बढ़ा दिया है। दूसरी ओर सेना से सेवानिवृत्त सूबेदार अर्जुन मौर्य (अनिल कपूर) अपनी पत्नी सुधा (खुशबू सुंदर) को खो देने के दुख में जी रहा है।

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    प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच पूर्व सैन्‍यकर्मी गर्व से कहता है कि वह गोली खा सकता है, लेकिन अपमान बर्दाश्त नहीं कर सकता। उसकी बेटी श्यामा (राधिका मदान) उससे नाराज है, क्योंकि पिता मां की जरूरत के समय उनके साथ नहीं थे।

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    कहानी तब मोड़ लेती है जब अर्जुन और प्रिंस के बीच गाड़ी की पार्किंग को लेकर  विवाद हो जाता है। यह टकराव धीरे-धीरे अहंकार और प्रतिशोध की लड़ाई में बदल जाता है। इसी बीच बबली अपनी जमानत की कोशिशों में लगी है, जबकि श्यामा की अपनी अलग लड़ाई चल रही है। कॉलेज में एक लड़का उसे लगातार परेशान करता है और अश्लील वीडियो भेजता है। श्यामा इस स्थिति का सामना खुद करती है। पिता से कुछ नहीं कहती। फिल्म अंततः सूबेदार और प्रिंस के बीच बढ़ती टकराहट के अंजाम की ओर बढ़ती है।

    एक विषय पर पूरी गहराई से नहीं टिकती फिल्म

    सुरेश त्रिवेणी के निर्देशन में बनी इस फिल्म में रेत माफिया, सत्ता के दुरुपयोग, कमजोर लोगों पर अत्याचार, महिला सुरक्षा और दोस्ती जैसे कई सामाजिक मुद्दे शामिल किए गए हैं। समस्या यह है कि फिल्म इन सभी विषयों को छूती तो है, लेकिन किसी एक पर भी पूरी गहराई से ठहर नहीं पाती। नतीजतन कहानी कई दिशाओं में बिखरी हुई महसूस होती है।

    पटकथा में सूबेदार का गुस्सा मुख्य रूप से तब सामने आता है जब उसकी गाड़ी या उसकी बेटी के साथ कुछ गलत होता है, जबकि अन्याय की कई घटनाओं पर वह अपेक्षाकृत शांत दिखाई देता है। इससे उसके चरित्र का प्रभाव कुछ कम हो जाता है। इसी तरह बबली का किरदार भी पूरी तरह विकसित नहीं हो पाया है। जिस तरह उसकी ताकत और रसूख का उल्लेख किया गया है, वह पर्दे पर उतना प्रभावशाली नहीं दिखता। साफ्टी के अतीत के बारे में भी कहानी ज्यादा जानकारी नहीं देती। प्रिंस और बबली के रिश्ते की परतें भी पूरी तरह सामने नहीं आ पातीं।

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    फिल्म की तकनीकी पक्ष अपेक्षाकृत मजबूत है। बैकग्राउंड स्कोर कई दृश्यों में तनाव को प्रभावी ढंग से बढ़ाता है। छोटे कस्बे की सिनेमैटोग्राफी खूबसूरती से की गई है और कहानी के माहौल को विश्वसनीय बनाती है। क्लाइमेक्स और कुछ अहम एक्शन दृश्यों को भी प्रभावी ढंग से फिल्माया गया है। हालांकि, फिल्म की कुल टोन काफी गंभीर और भारी बनी रहती है। एक्शन और टकराव से भरी कहानी में हल्के फुल्‍के हास्य की कमी महसूस होती है।

    अनिल कपूर का अभिनय जीत लेगा दिल

    अभिनय की बात करें, तो अनिल कपूर फिल्म की सबसे बड़ी ताकत साबित होते हैं। वह अपने संयमित अभिनय से सूबेदार अर्जुन मौर्य के किरदार को मजबूती देते हैं। एक उम्रदराज सैनिक के रूप में उनका अनुशासन, स्वाभिमान और दबा हुआ गुस्सा प्रभावशाली तरीके से सामने आता है। एक्शन दृश्यों में भी उनकी ऊर्जा प्रभावित करती है।

    आदित्य रावल प्रिंस के किरदार में अलग अंदाज में नजर आते हैं। उन्होंने इस घमंडी और अप्रत्याशित चरित्र को आत्मविश्वास के साथ निभाया है। राधिका मदान भी अपने किरदार में ईमानदार अभिनय करती हैं। सहायक भूमिकाओं में सौरभ शुक्ला और फैसल मलिक प्रभाव छोड़ते हैं, हालांकि उनके किरदारों को और विस्तार मिल सकता था। मोना सिंह माफिया सरगना के रूप में नजर आती हैं, लेकिन कमजोर लेखन के कारण उनका किरदार बहुत प्रभावशाली नहीं बन पाया है। खुशबू सुंदर मेहमान भूमिका में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हैं।

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    सूबेदार कई महत्वपूर्ण विचारों और मजबूत कलाकारों के बावजूद एक ऐसी फिल्म बनकर रह जाती है, जिसमें संभावनाएं तो बहुत हैं, लेकिन उन्हें पूरी तरह साकार होने के लिए पर्याप्त जगह नहीं मिल पाती। फिल्म के अंत में इसके संभावित सीक्वल का संकेत भी दिया गया है।

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