The Kerala Story 2 Review: सतर्क करती कहानी, अधूरे सवाल; हैरान करती है फिल्म की स्टोरी
द केरल स्टोरी 2' लव जिहाद और हिंदू लड़कियों के जबरन धर्मांतरण पर आधारित है, जो केरल, मध्य प्रदेश और राजस्थान तक फैली है। फिल्म तीन लड़कियों की कहानी ब ...और पढ़ें
-1772277703862_m.webp)
केरला स्टोरी 2 का पोस्टर

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
प्रियंका सिंह, मुंबई। 'जो ताकत मुहब्बत में है, वो बारूद में नहीं। काफिर लड़की सिर्फ एक लड़की नहीं होती है, वह एक पोटेंशियल फैमिली ट्री होती है, उसे वहां से तोड़कर, अपने साथ जोड़ लो तो आने वाली पूरी नस्ल बदल जाती है।' द केरल स्टोरी 2 : गोज बियांड फिल्म का यह संवाद काफी हद तक साफ कर देता है कि फिल्म किस मुद्दे पर बनी है। कई विवादों से गुजरने और केरल हाईकोर्ट के फिल्म से रोक हटाने के बाद द केरल स्टोरी 2 सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है।
साल 2023 में बनी फिल्म द केरल स्टोरी में हिंदू लड़कियों के धर्मांतरण का मुद्दा था, जबकि फ्रेंचाइज की इस दूसरी फिल्म में लव जिहाद और प्यार का झांसा देकर हिंदू लड़कियों को जबरन इस्लाम धर्म अपनाने का मुद्दा है। फिल्म इस बार केरल तक सीमित न रहकर मध्य प्रदेश और राजस्थान तक जाती है।
तीनों लड़कियों को अपने प्यार के जाल में फंसाते हैं
कहानी है तीन लड़कियों की, यूपीएससी की तैयारी कर रही केरल की सुरेखा (उल्का गुप्ता) को पत्रकार बनने का नाटक करने वाले कंजवर्जन गिरोह का सलीम (सुमित गहलावत) अपने प्यार के जाल में फांसता है। मध्य प्रदेश की नेहा (ऐश्वर्या ओझा), जैवलिन के खेल में नेशनल खेलने की तैयारी में है, उसे फैजान (अर्जन सिंह औजला) अपना झूठा नाम राजू बताकर प्यार का झांसा देता है। वहीं राजस्थान की 16 साल की डांसिंग इंफ्लूएंसर दिव्या (अदिति भाटिया) को फालोवर्स बढ़ाने का लालच देकर रशिद (युक्ताम खोसला) निकाह कर लेता है। तीनों का ही धर्मांतरण कर उन्हें इस्लाम अपनाने के लिए कहा जाता है। नेहा, नफिसा बन जाती है, दिव्या, आलिया और सुरेखा बन जाती है सलमा।
-1772275465496.jpg)
यह भी पढ़ें- The Kerala Story 2 को मिली हरी झंडी, हाई कोर्ट ने फिल्म की रिलीज से हटाई रोक
हिंदू लड़कियों के बेनवॉश की है कहानी
फिल्म की कहानी विपुल अमृतलाल शाह और अमरनाथ झा ने लिखी है। विपुल ने शुक्रवार को हुई प्रेस कांफ्रेंस में कहा था कि फिल्म केवल समाज के अपराधियों को दिखाती है। अंत में उन अपराधियों का जिक्र भी है, जिन्होंने ब्रेनवाश कर हिंदू लड़कियों को लव जिहाद का निशाना बनाया था, लेकिन इसके बावजूद कई जगहों पर फिल्म एक तरफा होकर रह जाती है, जहां विशेष धर्म समुदाय को ही पूरी तरह से स्याह दिखाया जाता है। हालांकि जिस तरीके से लड़कियों को लव जिहाद का निशाना बनाया जाता है, वह डरावना और सतर्क करने वाला है।
खबरें और भी
झकझोर देंगे फिल्म के कई सीन
निकाह और धर्मांतरण के बाद उन लड़कियों का जो हश्र दिखाया जाता है, वह हृदयविदारक है। हिंदू परिवारों में बच्चों को अपनी संस्कृति, पूजा-पाठ, मंत्रों का ज्ञान क्यों नहीं दिया जाता है, इस पर संवादों में सवाल उठाकर फिल्म बस आगे बढ़ जाती है। बलात्कार, जान से मारने के बाद शरीर को काटकर बोरे में भरने वाले दृश्य विचलित करने के साथ ही गुस्सा और मजबूरी का अहसास कराएंगे। फिल्म का अंत फिल्मी, न होकर बेहतर हो सकता था। फिल्म देखते वक्त मन में कुछ सवाल भी उठते हैं कि जो लड़कियां पढ़ी-लिखी हैं, उनके पास फोन है, वह भागने या पुलिस की मदद लेने की कोशिश क्यों नहीं करती हैं। अगर कहानी को प्रभावशाली तरीके से दिखाना था, तो स्क्रीनप्ले में इन बातों का ख्याल रखा जाना चाहिए था।

फिल्म के लिए लंबे समय की रिसर्च
मदद की गुहार लगाते माता-पिता का यह कहना की हमें एक साथ होना होगा, उस पर किसी का यह कह देना कि राइट विंग कट्टरपंथियों की तरह बात मत करो, बचकाना लगता है। डाक्यूमेंट्री जस्टिस डिलेड बट डिलीवर्ड के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित निर्देशक कामख्या नारायण सिंह ने बताया था कि वह इस मुद्दे पर काफी समय से रिसर्च कर रहे है, इसकी झलक उनके निर्देशन में दिखती है। हालांकि फिल्म का प्रोडक्शन वैल्यू बेहतर हो सकता था। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर अच्छा है, जो पात्रों की मनोदशा को प्रभावशाली बनाता है।
ये काफिर सेक्यूलर कहलाने के लिए मरे जाते हैं... हम कभी नास्तिक नहीं होते हैं, सिर्फ तुम हिंदू काफिर होते हो... जैसे संवाद और फिल्म के एक सीन में गजवा-ए-हिंद 2047 (देश को 2047 तक इस्मामिक देश बनाने का मिशन) का पोस्टर सोचने पर मजबूर करता है। साथ ही यह संदेश भी है कि माता-पिता को अपने बच्चियों का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए, फिर भले ही उन्होंने अपनी मर्जी से शादी कर ली हो।
कैसी है तीनों एक्ट्रेस की एक्टिंग?
अभिनय की बात करें, उल्का गुप्ता, ऐश्वर्या ओझा और अदिति भाटिया तीनों ने ही स्क्रिप्ट के दायरों में रहकर अच्छा काम किया है। प्यार में धोखा, माता-पिता से दूरी, अलग धर्म को अपनाने की मजबूरियां ऐसी कई भावनाओं को तीनों बखूबी निभाती हैं। माता-पिता के रोल में अभिषेक शंकर, लक्ष्मी, रामजी बाली, पूर्वा पराग, राजीव कुमार, श्वेता मुंशी का काम सराहनीय है। अल्का अमीन अनुभवी अभिनेत्री हैं, उन्हें बेहतर रोल दिया जाना चाहिए था।