The Raja Saab Review: सब्र का इम्तिहान लेती है 'द राजा साब', कमजोर कहानी का बस एक सहारा
The Raja Saab Review: प्रभास की फिल्म 'द राजा साब' सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। हॉरर कॉमेडी फिल्म से दर्शकों की काफी उम्मीदें जुड़ी हैं। फिल्म की क ...और पढ़ें

द राजा साब मूवी रिव्यू / फोटो- Jagran Graphics

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। प्रभास ने अपनी 'द राजा साब' के प्रमोशन के दौरान क्लाइमेक्स को बेहद विस्फोटक बताते हुए इसे मशीन गन की तरह लिखा गया बताया था।, संभवत उन्हें ये एहसास हो गया था कि ये हॉरर-कामेडी फैंटेसी के तौर पर प्रचारित फिल्म दुर्भाग्य से न तो हॉरर पैदा कर पाती है, न ही हंसा पाती है। भावनात्मक पक्ष पूरी तरह नदारद हैं।
कमजोर पटकथा की वजह से प्रभास जैसे सितारे की मौजूदगी भी उसे डूबने से बचा नहीं पाती है। हो सकता है कि लेखक और निर्देशक मारूति की कहानी में धोखा, प्रतिशोध, रोमांस, भ्रम, दिमाग से खेलने जैसे तत्वों को लेकर गढ़ा आइडिया कागजों पर रोमांचक रहा हो, लेकिन पर्दे पर उसका प्रभाव नहीं बन पाता। वास्तव में यह फिल्म दर्शकों के धैर्य की कड़ी परीक्षा लेती है।
क्या है 'द राजा साब' की कहानी?
कहानी की शुरुआत एक वार्ड ब्वॉय (सत्या) से होती है, जो किसी की अस्थियों से भरी हांडी लेकर एक सुनसान, रहस्यमयी और मायावी हवेली में पहुंचता है। यहीं से कहानी का आधार बनता है। वहां से कहानी राजू (प्रभास) की जिंदगी में आती है जो अल्जाइमर (याददाश्त संबंधी बीमारी) से पीड़ित अपनी दादी (जरीना वहाब) के साथ रहता है। दादी को सिर्फ अपने पति कनकराजू (संजय दत्त) के बारे में याद है और उन्हें पूरा यकीन है कि वह अभी जिंदा हैं।
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वह राजू उर्फ राजा साहब से अपने दादा को खोज कर लाने की जिद करती है। नाटकीय घटनाक्रम में राजू को पता चलता है कि दादा हैदराबाद में हैं। इस दौरान नन बेस्सी (निधि अग्रवाल) को देखते ही राजू उस पर फिदा हो जाता है। दादा की खोज को लेकर राजू अपने अंकल (वीटीवी गणेश) से मदद मांगता है जो पुलिस कांस्टेबल हैं। इसी दौरान भैरवी (मालविका मोहनन) से उसकी मुलाकात होती है। उसके जरिए राजू को पता चलता है कि उसके दादा नरसापुर जंगलों में छिपे हैं।
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राजू अपने दोस्त, भैरवी और अंकल के साथ जाता रहस्यमयी हवेली पहुंचता है, जहां पर पहले से वार्ड ब्वॉय कैद है। कनकराजू कहां हैं? वह अपनी पत्नी को छोड़कर क्यों भागा ? क्या राजू अपनी दादा को दादा से मिला पाएगा कहानी इन सवालों के जवाब को खोजती है।
मूल मकसद तक पहुंचने में काफी समय लेती है फिल्म
मूल रुप से तेलुगु में बनी यह फिल्म डब होकर हिंदी, कन्नड़, तमिल और मलयालम में प्रदर्शित हुई है। दादी और पोते के बीच से आरंभ हुई कहानी बाद में दादा और पोते के बीच आपसी संघर्ष में बदल जाती है। हिप्नोटिज्म, प्रतिशोध, लालच, दुष्ट ताकतों जैसे मसालों को मिलाकर गढ़ा आइडिया पटकथा के स्तर पर बेहद कमजोर है। कहानी अपने मूल मकसद पर आने में काफी समय लेती है।
मध्यांतर से पहले की कहानी राजू और उसके बेवजह के रोमांस से भरी है। वह दृश्य बेहद खींचे हुए और उबाऊ हैं। इंटरवल पर कहानी में ट्विस्ट आता है तब तक दर्शकों का धैर्य जवाब दे चुका होता है। खैर मध्यांतर के बाद की कहानी ज्यादातर रहस्यमयी हवेली के अंदर सिमट जाती है, जहां न डर का अहसास होता है ना ही किसी के रोमांच का। खलनायक भले ही दुष्ट बताया हो, लेकिन उसकी दुष्ट प्रवृत्तियां कहीं दिखती नहीं। उसके अतीत का चित्रण भी अधूरा है। भैरवी और उसके नाना का मकसद भी भटका हुआ लगता है। बीच-बीच डाले गए गाने भी जबरन ठूंसे हुए लगते हैं।
प्रभास भले ही फिल्म में स्टाइलिश दिखे हैं लेकिन उनका पात्र लेखन स्तर पर बहुत कमजोर है। हिंदी डबिंग में कई दृश्य लिपसिंक से मेल नहीं खाते हैं। अभिनेत्रियों में मालविका मोहन के हिस्से में एक्शन सीन भी आया है। हालांकि, उनका पात्र कहानी में कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाता। निधि अग्रवाल और रिद्धि कुमार के पात्र शो पीस बन कर रह जाते हैं। खलनायक की भूमिका में संजय दत्त का काम ठीक है। दादी की भूमिका के साथ जरीना वहाब न्याय करती हैं। संक्षिप्त भूमिका में बमन ईरानी प्रभाव छोड़ नहीं पाते हैं।
कहानी के बजाय मेकर्स का इन चीजों पर फोकस
तकनीकी पक्ष की बात करें तो फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर बहुत लाउड है। बप्पी लाहिड़ी के मशहूर गाने नाचे नाचे के रीमिक्स का इस्तेमाल और चित्रण बहुत सतही हुआ है। क्लाइमेक्स के कुछ दृश्य अवश्य अच्छे बन पड़े हैं लेकिन कहानी के बजाय ग्राफिक्स पर फोकस फिल्म को बेस्वाद बना देता है।
कुल मिलाकर मारुति हॉरर, कॉमेडी, फैंटेसी के साथ इमोशन का संतुलन साधने में संघर्ष करते नजर आते हैं। क्लाइमेक्स को छोड़ दें तो फिल्म में कुछ भी ऐसा नहीं है जो देर तक याद रहे। मारूति ने अंत में पार्ट 2 बनाने का जिक्र किया है बेहतर होता कि वह इसे ही मुकम्मल फिल्म बना लेते। तब शायद आगे की कहानी के लिए उत्सुकता भी बन पाती।