
शारदीय नवरात्र के प्रथम दिन, आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को मां जगदंबा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा-अर्चना की जाती है। पर्वतराज हिमालय के घर कन्या रूप में जन्म लेने के कारण माता का नाम शैलपुत्री पड़ा। उनका स्वरूप अत्यंत सुंदर और दिव्य माना गया है।
मां शैलपुत्री का वाहन वृषभ (बैल) है। वे एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में कमल धारण करती हैं। मां का निवास पर्वत पर माना गया है। उनकी आराधना से भक्त को शक्ति, साहस, धैर्य और आरोग्य का आशीर्वाद मिलता है। मां की कृपा से जीवन की कठिनाइयों का सामना करने और सफलता की ओर बढ़ने का संबल प्राप्त होता है।
मां को सफेद और लाल रंग प्रिय हैं। उन्हें पुष्प, सिंदूर और दूध से बने मिष्ठान का भोग अर्पित किया जाता है। श्रद्धापूर्वक पूजा करने से मां सुख-शांति और समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं।
ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः॥



नवरात्र के दूसरे दिन मां जगदंबा के दूसरे स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना की जाती है। मां का स्वरूप शांत और तेजस्वी है। वे एक हाथ में कमंडल और दूसरे हाथ में जपमाला धारण करती हैं।
मां ब्रह्मचारिणी को तप, संयम और साधना की देवी माना जाता है। मान्यता है कि भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए उन्होंने कठिन तपस्या की थी। उनकी पूजा करने से भक्त को धैर्य, आत्मबल और कठिन परिस्थितियों में भी शांत रहने की शक्ति मिलती है। मां की कृपा से मन को शांति मिलती है और जीवन में सही मार्ग पर चलने का साहस मिलता है।
मां को गुड़हल और कमल के फूल प्रिय माने जाते हैं। उन्हें चीनी, मिश्री और पंचामृत का भोग अर्पित किया जाता है। श्रद्धा से पूजा करने पर मां सौभाग्य, दीर्घायु और सफलता का आशीर्वाद देती हैं।
ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः॥



शक्ति की अधिष्ठात्री जगदंबा - परांबा की आराधना - उपासना के विशेष काल शारदीय नवरात्र के तीसरे दिन देवी के तृतीय स्वरूप चंद्रघंटा का दर्शन - पूजन किया जाता है। देवी दुष्ट शक्तियों को नष्ट कर धर्म की रक्षा करती हैं। देवी के मस्तक पर घंटे के आकार का अर्द्धचंद्र है। इनके दस हाथ हैं, जिनमें एक हाथ में कमल का फूल, दूसरे में कमंडल, तीसरे में त्रिशूल, चौथे में गदा, पांचवें में तलवार, छठे में धनुष और सातवें में बाण है। शेष तीन हाथों में एक हाथ हृदय पर, एक आशीर्वाद मुद्रा में और एक अभय मुद्रा में रहता है। ये रत्न जड़ित आभूषण धारण करती हैं। गले में सफेद फूलों की माला रहती है। इनका वाहन बाघ है। यह भयानक घंटे के नाद मात्र से शत्रु व दैत्यों का वध करती हैं। इनका स्वरूप दानव, दैत्य, राक्षसों को कंपाने वाला तथा इनकी प्रचंड ध्वनि उनकी ऊर्जा से युक्त कर देने वाली होती है। इनकी चंद्रघंटे की ध्वनि बुरी शक्तियों को भागने पर विवश करती है। इसके विपरीत साधकों और भक्तों को इनका स्वरूप शांत और भव्य दिखाई देता है। देवी चंद्रघंटा अपने भक्तों को अभय वरदान देने वाली तथा परम कल्याणकारी हैं। ये घंटे के कंपन के समान मन की नकारात्मक ऊर्जा को सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित कर भक्तों के भाग्य को समृद्ध करती हैं। इनकी आराधना से साधक में न केवल साहस और निर्भयता का बल्कि सौम्यता और विनम्रता का भी विकास होता है। नवरात्र के तीसरे दिन मां के इस स्वरूप को दूध या उससे बने पदार्थों का भोग लगाने से मन नियंत्रित रहता है।
ॐ देवी चंद्रघंटायै नमः॥




कहा जाता है कि जब सृष्टि में चारों ओर अंधकार था, तब मां कूष्मांडा की एक मंद मुस्कान से ब्रह्मांड प्रकाश से भर उठा। यही कारण है कि उन्हें सृष्टि की आदिशक्ति के रूप में पूजा जाता है। नवरात्र के चौथे दिन मां दुर्गा के चतुर्थ स्वरूप मां कूष्मांडा की आराधना की जाती है।
मां कूष्मांडा का वाहन सिंह है। उनकी आठ भुजाओं में कमंडल, धनुष-बाण, कमल, अमृत कलश, चक्र, गदा और जपमाला सुशोभित हैं। माता का तेज सूर्य के समान माना जाता है। उनकी पूजा से ऊर्जा, उत्साह, बुद्धि और सकारात्मकता बढ़ती है।
मां को मालपुए का भोग लगाना शुभ माना जाता है। श्रद्धापूर्वक पूजा करने से रोग, भय और दुख दूर होने के साथ सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।
ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः॥




मां जगदंबा - परांबा का पंचम स्वरूप स्कंदमाता का है। शक्ति आराधना के विशेष काल शारदीय नवरात्र की पंचमी तिथि में इनका ही दर्शन - पूजन व साधना - आराधना की जाती है। देवी इच्छा शक्ति, ज्ञान शक्ति और क्रिया शक्ति का समागम हैं। ब्रह्मांड में व्याप्त शिव तत्व का जब मिलन इन त्रिशक्ति के संग होता है तो स्कंद (कार्तिकेय) का जन्म होता है। अपनी गोद में ये भगवान स्कंद को बैठाए रखती हैं। स्कंदमाता का विग्रह चार भुजाओं वाला है। दाएं ओर ऊपर वाली भुजा से धनुष बाणधारी, छह मुखों वाले (षडानन) बाल रूप स्कंद को पकड़े रहती हैं। बाईं ओर की ऊपर वाली भुजा आशीर्वाद और वर प्रदाता मुद्रा में है। नीचे वाली दोनों ओर की भुजाओं में माता कमल पुष्प रखती हैं। इनका वर्ण पूरी तरह निर्मल कांति वाला श्वेत है। ये कमलासन पर विराजती हैं। इनका वाहन सिंह है। यह वात्सल्य विग्रह हैं, अतः कोई शस्त्र धारण नहीं करती हैं। मां स्कंदमाता की आराधना से जीवन में सही दिशा में ज्ञान का उपयोग कर उचित कर्मों द्वारा सफलता, सिद्धि प्राप्त होती है। इनकी कांति का अलौकिक प्रभा मंडल इनके उपासक को भी मिलता है। इनकी उपासना से साधक को मृत्यु लोक में ही परम शांति और सुख मिलता है। उसकी कोई लौकिक कामना शेष नहीं रहती। नवरात्र के पांचवें दिन मां को प्रसन्न करने के लिए केले का भोग लगाना चाहिए या फिर इसे प्रसाद स्वरूप दान करना चाहिए। इससे परिवार में सुख - शांति का वास होता है।
ॐ देवी स्कंदमातायै नमः॥




शक्ति की अधिष्ठात्री मां जगदंबा - परांबा की आराधना - साधना के विशेष काल शारदीय नवरात्र की षष्ठी तिथि में देवी के षष्ठ स्वरूप मां कात्यायनी का दर्शन - पूजन किया जाता है। सुनहरे और चमकीले वर्ण वाला देवी का स्वरूप चार भुजाओं वाला है। दाहिनी ओर की ऊपर वाली भुजा अभय देने वाली मुद्रा में तथा नीचे वाली भुजा वर देने वाली मुद्रा में रहती हैं। बायीं ओर की ऊपर वाली भुजा में वे चंद्रहास खड्ग (तलवार) धारण करती हैं, जबकि नीचे वाली भुजा में कमल का फूल रहता है। रत्नाभूषणों से अलंकृत कात्यायनी देवी आक्रामक और झपट पड़ने वाली मुद्रा में रहने वाले सिंह पर सवार रहती हैं। ये महिषासुर का मर्दन करने वाली हैं। ये रूप त्रिदेवों यानी ब्रह्मा, विष्णु और शिवजी के अंश से प्रकट हुआ है। शास्त्रानुसार देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिए महर्षि कात्यायन के आश्रम में प्रकट होकर भगवती कात्यायनी के नाम से विख्यात हुईं। इनका स्वरूप अत्यंत भव्य व दिव्य है। एकाग्रचित और पूर्ण समर्पित भाव से कात्यायनी देवी की उपासना करने वाला भक्त बड़ी सहजता से चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति कर लेता है। नवरात्र के छठे दिन भगवती के इस रूप को प्रसन्न करने के लिए मधु (शहद) का भोग लगाकर स्तवन करने से साधक को सुंदर यौवन प्राप्त होता है। साथ ही मां लक्ष्मी के रूप में माता घर में वास करती हैं। कात्यायनी देवी की पूजा - आराधना से कामकाज में आ रही समस्त प्रकार की रुकावटें दूर होती हैं।
ॐ देवी कात्यायन्यै नमः॥



जब हर ओर भय का अंधेरा छा जाए, तब मां कालरात्रि अपने भक्तों की ढाल बनकर खड़ी होती हैं। नवरात्र के सातवें दिन मां दुर्गा के सप्तम स्वरूप मां कालरात्रि की पूजा की जाती है। उनका भयानक स्वरूप दुष्ट शक्तियों के विनाश का प्रतीक है, लेकिन भक्तों के लिए वे अत्यंत शुभकारी और कल्याणकारी मानी जाती हैं।
मां कालरात्रि का वाहन गर्दभ है। उनकी चार भुजाओं में खड्ग और कटार सुशोभित हैं, जबकि दो हाथ अभय और वर मुद्रा में रहते हैं। उनकी आराधना से भय, नकारात्मकता और बाधाएं दूर होती हैं। नवरात्र के सातवें दिन मां को गुड़ का भोग अर्पित करना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इससे दुख दूर होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
ॐ देवी कालरात्र्यै नमः॥



मां की एक झलक मन के सारे बोझ को हल्का कर दे और उनकी शीतल छाया जीवन में शांति भर दे—ऐसा ही दिव्य स्वरूप है मां महागौरी का। शारदीय नवरात्र के आठवें दिन मां दुर्गा के अष्टम स्वरूप मां महागौरी की पूजा-अर्चना की जाती है। उनका स्वरूप अत्यंत उज्ज्वल, शांत और सौम्य माना जाता है। मां महागौरी का वाहन वृषभ है और उनकी चार भुजाओं में त्रिशूल, डमरू तथा अभय और वर मुद्रा सुशोभित हैं।
मां की आराधना से मन की अशांति दूर होकर जीवन में सुख, शांति और सकारात्मकता आती है। मान्यता है कि उनकी कृपा से भक्तों के कष्ट दूर होते हैं और इच्छाएं पूर्ण होती हैं। इस दिन मां को नारियल का भोग अर्पित करना शुभ माना जाता है।
ॐ देवी महागौर्यै नमः॥



नवरात्र की साधना जब अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंचती है, तो मां सिद्धिदात्री के रूप में भक्तों को पूर्णता और सिद्धि का आशीर्वाद मिलता है। शारदीय नवरात्र की नवमी तिथि को मां दुर्गा के नवम स्वरूप मां सिद्धिदात्री की पूजा-अर्चना की जाती है। चतुर्भुज मां कमल पर विराजमान रहती हैं और उनका वाहन सिंह है। उनके हाथों में चक्र, गदा, शंख और कमल सुशोभित हैं।
मां सिद्धिदात्री को सभी सिद्धियां प्रदान करने वाली देवी माना जाता है। उनकी कृपा से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होने का आशीर्वाद मिलता है। मान्यता है कि भगवान शिव ने भी मां की कृपा से सिद्धियां प्राप्त की थीं। इस दिन हलवा, पूरी, चना, खीर और पुआ का भोग लगाना शुभ माना जाता है।
ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः॥



