मालिक गांव छोड़ गए, पर नहीं मिटा रुतबा, बहादुरगढ़ के मातन गांव की हवेलियां सुना रही हैं अतीत की दास्तान
बहादुरगढ़ के मातन गांव में दशकों पुरानी हवेलियां आज भी अपनी भव्यता बनाए हुए हैं, जो अतीत की समृद्ध वास्तुकला और जीवनशैली का प्रमाण हैं।

बहादुरगढ़ के गांव मातन में खड़ी कई दशक पुरानी हवेलियां। जागरण
HighLights
मातन गांव की दशकों पुरानी हवेलियां आज भी संरक्षित हैं।
मूल मालिकों के जाने पर भी नए मालिकों ने सहेजा।
ये हवेलियां अतीत की भव्यता और वास्तुकला दर्शाती हैं।
जागरण संवाददाता, बहादुरगढ। झज्जर के बहादुरगढ़ के मातन गांव में दशकों पुरानी हवेलियां आज भी सहेजी विरासत की तरह खड़ी हैं। कभी समृद्ध परिवारों की पहचान रही इन हवेलियों के मूल मालिक वर्षों पहले गांव छोड़कर अलग-अलग शहरों में जा बसे, लेकिन उनकी बनाई इमारतें पीछे छूट गईं।
समय के साथ इन हवेलियों का स्वामित्व गांव के ही दूसरे परिवारों के पास पहुंचा, मगर उन्होंने भी इस विरासत को मिटने नहीं दिया। मातन के धीरजान मुहल्ले में सेठ शांति स्वरूप और पन्ना लाल की हवेलियां आज भी साथ-साथ खड़ी हैं।
पहली नजर में यहां चार हवेलियां दिखाई देती हैं, लेकिन वास्तव में इनकी संख्या दो ही है। दोनों हवेलियों के चार बड़े दरवाजे हैं, जो अपने समय की भव्यता और स्थापत्य शैली की झलक देते हैं।
आज भी दिखती है हवेलियों में भव्यता
इन हवेलियों के पास से गुजरते हुए ऐसा लगता है जैसे समय कुछ पल के लिए पीछे लौट आया हो। इसके अलावा और भी हवेलियां हैं। जिन परिवारों ने इनका निर्माण कराया वे तो अधिकतर गांव छोड़ गए, लेकिन उनके द्वारा निर्मित इन हवेलियों में भव्यता आज भी दिखती है।
इन हवेलियों को उस दौर में बनाया गया था, जब घर केवल रहने की जगह नहीं होते थे, बल्कि परिवार की प्रतिष्ठा और सामर्थ्य का भी परिचय देते थे। निर्माण में मजबूती के साथ खूबसूरती का भी ध्यान रखा जाता था।
बड़े प्रवेश द्वार, विस्तृत परिसर और पारंपरिक बनावट उस समय के भवन निर्माण की सोच को सामने रखते हैं। आज आधुनिक निर्माण के दौर में जब पुराने मकानों की जगह नई इमारतें ले रही हैं, तब ऐसी हवेलियां बीते समय की स्थापत्य विरासत को बचाए हुए हैं।
इन हवेलियों की सबसे खास बात यह है कि इनके मूल परिवार भले ही यहां नहीं रहते, लेकिन इमारतों का अस्तित्व आज भी बना हुआ है।
वर्षों पहले जब परिवारों ने गांव छोड़कर दूसरे शहरों का रुख किया तो उनके पीछे छूट गई हवेलियां धीरे-धीरे दूसरे परिवारों के स्वामित्व में आ गईं। इसके बावजूद इन्हें पूरी तरह बदला नहीं गया। वर्तमान मालिकों ने इनके पुराने स्वरूप को काफी हद तक बनाए रखा है।
नई पीढ़ी को अतीत की कहानी सुनाती हैं ये हवेलियां
गांव निवासी ब्रह्मजीत दलाल बताते हैं कि इन हवेलियों को देखने से आज की पीढ़ी को अतीत और उस समय की भवन निर्माण कला को समझने का अवसर मिलता है।
ये पुरानी हवेलियां केवल ईंट-पत्थर की संरचनाएं नहीं हैं, बल्कि इनमें गांव के सामाजिक जीवन, परिवारों की समृद्धि और उस दौर की जीवनशैली की कहानी भी छिपी हुई है।
मातन की इन हवेलियों को देखकर यह अहसास होता है कि विरासत केवल पुरानी चीजों को सुरक्षित रखने का नाम नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को अपने इतिहास से जोड़ने का माध्यम भी है।
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