CWG 2026: यूं ही नहीं भिवानी है मिनी क्यूबा, ग्लासगो में बेटियों ने कर दिया कमाल; 30 मिनट में मारे दो गोल्डन पंच
भिवानी की जैस्मिन लंबोरिया और प्रीति साई पवार ने ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल 2026 में स्वर्ण पदक जीतकर "मिनी क्यूबा" की मुक्केबाजी विरासत को नई ऊंचाइयों प ...और पढ़ें
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हरियाणा की प्रीति पवार और जैस्मिन लंबोरिया ने जीदा गोल्ड मेडल। फोटो एक्स
HighLights
जैस्मिन और प्रीति ने ग्लासगो 2026 में स्वर्ण पदक जीते।
भिवानी ने "मिनी क्यूबा" की मुक्केबाजी विरासत को कायम रखा।
बेटियों ने भारतीय मुक्केबाजी में नया स्वर्णिम अध्याय जोड़ा।
सुरेश मेहरा, भिवानी। यह सिर्फ स्वर्ण पदकों की कहानी नहीं है, बल्कि उस मिट्टी के सम्मान की गूंज है जिसने वर्षों से देश को मुक्केबाजी के चैंपियन दिए हैं। हरियाणा के भिवानी की बेटियों ने ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल 2026 में जब स्वर्ण पदक जीतकर तिरंगा सबसे ऊंचा लहराया तो यह जीत केवल जैस्मिन लंबोरिया और प्रीति साई पवार की नहीं रही, बल्कि पूरे ''मिनी क्यूबा'' की पहचान और भारतीय मुक्केबाजी की समृद्ध विरासत की जीत बन गई।
एक समय कैप्टन हवा सिंह औरउसके बाद विजेंद्र, अखिल जितेंद्र, दिनेश के मुक्कों से दुनिया को चौंकाने वाली यही धरती अब अपनी बेटियों के सुनहरे पंचों से नया इतिहास लिख रही है। यह संदेश भी दे रही है कि भिवानी की माटी आज भी चैंपियन गढ़ती है और देश को विश्व विजेता बनाने का माद्दा रखती है। बेटे सचिन सिवाच ने भी ग्लासगों की धरती पर अपने मुक्काें की ताकत का लोहा मनवाया है।

जैस्मिन लंबोरिया ने जीता स्वर्ण पदक
नई ऊंचाई पर पहुंचा स्वर्णिम सफर
भिवानी में मुक्केबाजी की मजबूत नींव देश के महान मुक्केबाज कैप्टन हवा सिंह ने रखी थी। हरियाणा गठन के बाद पहले ओलंपियन और अर्जुन अवार्डी भीम सिंह ने खेल संस्कृति को नई दिशा दी। वर्ष 2004 के एथेंस ओलंपिक से शुरू हुआ स्वर्णिम सफर आज नई ऊंचाइयों पर पहुंच चुका है।
कभी विजेंद्र सिंह, अखिल कुमार और जितेंद्र सीसर ने इस शहर को विश्व मानचित्र पर स्थापित किया था, तो अब जैस्मिन लंबोरिया और प्रीति पंवार, प्रिया घनघस, साक्षी चौधरी जैसी बेटियां उसी विरासत को और बुलंद कर रही हैं। साक्षी चौधरी ढांडा और प्रिया घनघस एक ही गांव धनाना से हैं जबकि जैस्मिन और प्रीति एक ही शहर से हैं।
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इतिहास रचते हुए प्रीति पवार
अब बेटियों के हाथ में विरासत
वर्ष 2006 के मेलबर्न राष्ट्रमंडल खेलों से लेकर 2008 बीजिंग ओलंपिक, 2010 दिल्ली राष्ट्रमंडल खेल और उसके बाद के अंतरराष्ट्रीय मंचों तक भिवानी के मुक्केबाज लगातार भारत की शान बढ़ाते रहे। 2008 बीजिंग ओलंपिक में भारत के पांच में से चार मुक्केबाज भिवानी के थे और विजेंद्र सिंह का कांस्य भारतीय मुक्केबाजी का ऐतिहासिक मोड़ बना था।
अब यह विरासत बेटियों के हाथों में है। जैस्मिन लम्बोरिया के कोच संदीप लम्बोरिया बताते हैं कि पूजा रानी बोहरा के बाद महिला मुक्केबाजी में नई ऊर्जा आई और अब जैस्मिन लम्बोरिया, प्रीति साई पवार, साक्षी चौधरी तथा प्रिया घनघस जैसी खिलाड़ी देश की नई पहचान बन रही हैं। ग्लासगो में जैस्मिन और प्रीति के स्वर्ण पदक इस बदलाव की सबसे बड़ी मिसाल हैं।
वर्ष 2004 के बाद भिवानी भारतीय मुक्केबाजी का सबसे बड़ा केंद्र बन गया था। अब नई पीढ़ी, विशेषकर बेटियां, उसी परंपरा को नई ऊंचाइयों तक ले जा रही हैं। ग्लासगो में गूंजे इन स्वर्णिम मुक्कों ने एक बार फिर साबित कर दिया कि भिवानी केवल एक शहर नहीं, बल्कि भारतीय मुक्केबाजी की वह पाठशाला है जहां सपने नहीं, चैंपियन तैयार होते हैं।
- जगदीश सिंह, द्रोणाचार्य अवार्डी कोच