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फरीदाबाद में जिस जमीन ने दी एनआईटी को पहचान, उसके वारिस 66 साल बाद भी बेअधिकार

Published: Mon, 22 Jun 2026 03:42 PM (IST)

फरीदाबाद के मॉडल विलेज प्रतापगढ़ (पूर्व मनयारू गांव) के ग्रामीण 66 साल बाद भी अपने घरों के मालिकाना हक से वंचित हैं।

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HighLights

  1. मॉडल विलेज प्रतापगढ़ के ग्रामीण 66 साल से बेघर।

  2. एनआईटी फरीदाबाद के लिए अधिग्रहित भूमि के वारिस।

  3. मुख्यमंत्री से मालिकाना हक दिलाने की गुहार लगाई।

प्रवीन कौशिक, फरीदाबाद। एक था मनयारू गांव। शायद इस गांव का नाम अब एनआईटी यानी न्यू इंडस्ट्रियल टाउनशिप में रहने वाले लोगों को याद भी नहीं होगा। जबकि शहर का बड़ा हिस्सा इसी गांव की जमीन पर बसा हुआ है। अपनी जमीन पर इतना बड़ा औद्योगिक व रिहायशी शहर बसाने वाला गांव आज अपनी पहचान को ही मोहताज है।

गांव के लोगों को तो दूसरी जगह जाकर बसा दिया गया जिसे माडल विलेज प्रतापगढ़ के नाम से जाना जाता है लेकिन 66 साल बीत जाने के बाद भी इन्हें अपने मकानों का मालिकाना हक नहीं मिल सका है। यानी आज भी पूरे गांव में किसी के पास अपने मकान की रजिस्ट्री नहीं है। इसलिए लोग परेशान हैं।

डर लगा रहता है कि कहीं शासन-प्रशासन कोई कार्रवाई न कर दे। अब ग्रामीण प्रदेश के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी से मिलकर समाधान का आग्रह करेंगे। याद रहे मनयारू गांव के अलावा एनआइटी शहर बसाने के लिए सारन, मुजेसर और फतेहपुर चंदीला गांव के लोगों की भी जमीन ली गई थी।

सरकार ने ली थी छह हजार बीघा जमीन

आजादी के बाद विभाजन की त्रासदी झेलकर पाकिस्तान से आए शरणार्थियों के पुनर्वास के लिए 1949 में एनआइटी नाम से शहर बसाया गया था। जहां अरावली गोल्फ क्लब है, वहां मनयारू गांव बसा हुआ था। बड़खल से लेकर नेहरू ग्राउंड और इधर मुजेसर तक इस गांव की करीब छह हजार बीघा जमीन थी जिसे सरकार ने अधिगृहीत कर लिया था।

यहां बसे हुए लोगों को गौंछी गांव के रकबे में जमीन दे दी गई थी। अब एनआइटी शहर देश में अपनी अलग पहचान रखता है। यहां अरावली गोल्फ क्लब, राजा नाहर सिंह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम, नागरिक अस्पताल, दशहरा मैदान, निगम मुख्यालय सहित प्रमुख एक नंबर मार्केट सहित निजी व सरकारी संस्थान हैं। अनेक बैंक, अस्पताल भी हैं।

1960 में गांव का नाम रखा

24 मार्च 1960 में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों के नाम पर इस गांव का नाम माडल विलेज प्रतापगढ़ रखा गया। लोगों को पुनर्वास (लाई-भाई) योजना के तहत करीब 40 प्लाट दिए गए थे। सरकार ने सड़क, बिजली, पानी, स्कूल, लाइब्रेरी आदि सुविधाएं उपलब्ध कराई हुई हैं। अब यह गांव नगर निगम के अधीन है। लोग प्रापर्टी टैक्स अदा कर रहे हैं। यहां करीब 75 घर हैं और 500 लोग रह रहे हैं।

2003 में आया था संकट

2003 में तत्कालीन सरकार द्वारा इस गांव में बने मकानों को अवैध मानते हुए नोटिस जारी किए थे। अदालत में ग्रामीणों के हक में फैसला आया। लेकिन ग्रामीणों की चिंता कम नहीं हुई। तभी से ग्रामीण परेशान हैं। वह चाहते हैं कि मकानों की रजिस्ट्री हो जाएगी तो लोन ले सकेंगे, किसी और को बेच सकेंगे। भावी पीढ़ी को तोड़फोड़ का डर नहीं रहेगा।

सोमवार को ग्रामीणों का प्रतिनिधिमंडल मुख्यमंत्री के मीडिया समन्वयक मुकेश वशिष्ठ से उनके कार्यालय में मिला। मुकेश वशिष्ठ ने गांव जाकर ग्रामीणों से बात की और इस मांग की फाइल केंद्रीय राज्य मंत्री कृष्णपाल गुर्जर के माध्यम से मुख्यमंत्री तक पहुंचाने का आश्वासन दिया है।

 

बहुत लंबा इंतजार हो गया है। समय-समय पर विभिन्न प्लेटफार्म पर यह मुद्दा उठाया है लेकिन समाधान नहीं हो सका।
- सत्यवीर भारद्वाज

 

 

हमारी जमीन पर इतना बड़ा औद्योगिक व रिहायशी शहर बस गया और हमें अपने ही मकानों का मालिकाना हक नहीं मिला। यह तो नाइंसाफी है।
- अशोक

 

 

हर वक्त दिमाग में बेवजह की टेंशन रहती है। मालिकाना हक मिल जाएगा तो बड़ी राहत मिल जाएगी। इसलिए मुख्यमंत्री से गुहार लगा रहे हैं।
- धर्म नंबरदार

 

इस मामले की जांच कराई जाएगी। मुख्यमंत्री से बात कर समाधान निकलवाया जाएगा।


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- कृष्णपाल गुर्जर, केंद्रीय राज्य मंत्री

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