विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

123 भारतीयों को रोड रोलर से कुचला, 796 लोगों की गई थी जान; 83 दिन की आजादी के बाद 19 अगस्त को फिर गुलाम हुआ था हिसार

By Pawan SirohaEdited By: Prince Sharma
Updated: Wed, 19 Aug 2026 12:44 PM (IST)

हिसार ने 29 मई 1857 को अंग्रेजों से 83 दिनों की आजादी हासिल की थी, लेकिन 19 अगस्त को ब्रिटिश सेना ने क्रूरता से शहर पर फिर कब्जा कर लिया।

83 दिन की आजादी के बाद 19 अगस्त को फिर गुलाम हुआ था हिसार (फाइल फोटो)

83 दिन की आजादी के बाद 19 अगस्त को फिर गुलाम हुआ था हिसार (फाइल फोटो)

HighLights

  1. हिसार 29 मई 1857 को 83 दिन के लिए स्वतंत्र हुआ

  2. 19 अगस्त को अंग्रेजों ने क्रूरता से हिसार पर पुनः कब्जा किया

  3. अंग्रेजों ने 123 भारतीयों को रोडरोलर से कुचलकर मार डाला

पवन सिरोवा, हिसार। 19 अगस्त 1857 हिसार के इतिहास का वह दिन, जिसे याद करते ही आज भी आजादी की कीमत और गुलामी का दर्द एक साथ महसूस होता है। 83 दिनों तक अंग्रेजी हुकूमत से मुक्त रही हिसार की धरती पर उस दिन फिर अंग्रेजों का कब्जा हो गया। जीत के साथ अंग्रेजों ने जिस तरह भारतीयों पर कहर बरपाया, उसने इस तारीख को हिसार के इतिहास के सबसे दर्दनाक अध्यायों में शामिल कर दिया।

डॉ. महेंद्र सिंह बताते है कि 29 मई 1857 को हिसार ने अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ विद्रोह का बिगुल बजाया था। क्रांतिकारियों ने अंग्रेज अधिकारियों को खदेड़कर खजाने पर कब्जा किया, जेल तोड़ी और बंदियों को मुक्त कराया। इसके बाद हिसार करीब 83 दिनों तक अंग्रेजी शासन से स्वतंत्र रहा।

लेकिन अंग्रेज इस हार को भूल नहीं पाए। उन्होंने अपनी सत्ता वापस पाने के लिए फिर सैन्य कार्रवाई की और 19 अगस्त को हिसार पर दोबारा कब्जा कर लिया। यह केवल सत्ता की वापसी नहीं थी, बल्कि उस आजादी की छोटी-सी सुबह का अंत था, जिसे हिसारवासियों ने अपने खून और साहस से हासिल किया था।

बस स्टैंड के सामने मुख्य मार्ग की सड़क बनी मौत का मैदान

अंग्रेजों की जीत के बाद बदले की आग और भी भयानक रूप में सामने आई। डॉ. महेंद्र सिंह ने बताया कि बस स्टैंड के सामने तलाकी गेट के पास मुख्य मार्ग पर 123 भारतीयों को रोडरोलर के नीचे कुचलकर मार दिया गया। जिस रास्ते से रोजमर्रा की जिंदगी गुजरती थी, उसी सड़क पर उस दिन चीखें, खून और मौत का मंजर था।

इस संघर्ष में दोनों पक्षों के करीब 796 लोगों के मारे जाने का उल्लेख मिलता है। इनमें 90 प्रतिशत से अधिक भारतीय बताए जाते हैं। जीतने के बाद अंग्रेजों ने जिस तरह भारतीयों को दंडित किया, वह उनकी सत्ता की क्रूरता का भयावह उदाहरण बन गया।

एक हाथी, एक योद्धा और आजादी की कीमत

29 मई की क्रांति में फिरोजशाह तुगलक के महल पर कब्जा करना सबसे कठिन चुनौती थी। इतिहासकार डॉ. महेंद्र सिंह के अनुसार, महल का मजबूत दरवाजा अंग्रेजी सैनिकों के लिए सुरक्षा कवच बना हुआ था।

क्रांतिकारियों ने दरवाजा तोड़ने के लिए हाथी का सहारा लिया। हाथी बार-बार दरवाजे से टकराता, लेकिन उसमें लगी लोहे की नुकीली कीलें उसके शरीर को घायल कर देतीं। तभी गुरबख्श सिंह आगे आए। उन्होंने अपने शरीर को उन कीलों के सामने खड़ा कर दिया, ताकि हाथी बिना घायल हुए दरवाजे पर अंतिम प्रहार कर सके। आखिरी टक्कर में दरवाजा टूट गया, महल का रास्ता खुल गया, लेकिन गुरबख्श सिंह मातृभूमि के लिए अपना जीवन न्योछावर कर चुके थे।

आजादी की छोटी सी लौ जो बन गई इतिहास

19 अगस्त को अंग्रेजों ने हिसार पर फिर कब्जा कर लिया, लेकिन 29 मई से 19 अगस्त तक के 83 दिन इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गए। यह वह समय था जब हिसार ने अंग्रेजी सत्ता को चुनौती देकर यह साबित किया कि आजादी की इच्छा किसी शासन की बंदूक से बड़ी होती है।

19 अगस्त की तारीख हमें उस संघर्ष की याद दिलाती है, जिसमें जीत और हार से कहीं बड़ा था आजादी का सपना। अंग्रेजों ने हिसार को फिर अपने अधीन कर लिया था, लेकिन इन 83 दिनों में स्वतंत्रता का जो बीज इस धरती पर बोया गया, वह आगे चलकर पूरे देश के स्वतंत्रता संग्राम की चेतना का हिस्सा बना।