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    '20-25 पुलिसकर्मियों ने घेरा और ले गए जेल', रेवाड़ी के निर्मल चौहान ने याद किया आपातकाल में छात्र जीवन की प्रताड़ना का दौर

    Updated: Thu, 25 Jun 2026 10:30 AM (IST)

    आपातकाल के दौरान 18 वर्षीय छात्र निर्मल चौहान को 20-25 पुलिसकर्मियों ने गिरफ्तार कर रेवाड़ी थाने ले जाकर जेल में डाल दिया था। ...और पढ़ें

    18 वर्ष के छात्र को गिरफ्तार करने 25 पुलिस वालों ने डाला था घेरा (प्रतीकात्मक फोटो)

    18 वर्ष के छात्र को गिरफ्तार करने 25 पुलिस वालों ने डाला था घेरा (प्रतीकात्मक फोटो)

    HighLights

    1. आपातकाल में 18 वर्षीय निर्मल चौहान को किया गया गिरफ्तार।

    2. 25 पुलिसकर्मियों ने घेरकर रेवाड़ी थाने ले जाकर जेल भेजा।

    3. महेंद्रगढ़ किले और नारनौल जेल में बिताए यातना भरे दिन।

    अमित पोपली, झज्जर। यह कहानी सिर्फ आपातकाल के काले दौर का इतिहास भर नहीं है, बल्कि जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही सलाखों के पीछे धकेले गए एक 18 वर्षीय छात्र पर लगाई गई बंदिशों और उसके परिवार के आंसुओं व छटपटाहट की ऐसी मर्मस्पर्शी दास्तान है, जिसे सुन आज भी रूह कांप उठती है।

    फिलहाल, पेशे से वकालत कर रहे कोका गांव निवासी निर्मल चौहान के मुताबिक, वो ऐसा भयावह और क्रूर कालखंड था, जिसने प्रताड़ना और जुल्म के मामले में इतिहास के औरंगजेब के क्रूर दौर को भी पीछे छोड़ दिया था।

    निर्मल चौहान (श्रवण कुमार) उन दिनों कालेज में पढ़ते थे। अपने प्राध्यापकों से प्रेरित होकर वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े थे। वे कालेज की पढ़ाई खत्म करते ही आपातकाल लागू होने के कुछ दिन पहले ही उनका प्रथम वर्ष का परिणाम आया था।

    वे द्वितीय वर्ष में दाखिला लेकर कुलाना बस स्टैंड पर पहुंचे ही थे कि चीख-पुकार मच गई। करीब 20 से 25 भारी पुलिस बल ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया। खूंखार अपराधी की तरह पकड़कर रेवाड़ी थाना में ले जाया गया। उन दिनों पूरे रोहतक से लेकर नारनौल तक वे इकलौते ऐसे छात्र थे, जिन्हें इतनी कम उम्र में सीधे जेल की सलाखों के पीछे धकेला गया था।

    जब इंस्पेक्टर की पत्नी के रूप में जागी मां की ममता

    रेवाड़ी थाने में उन्हें बंद किया गया था, वहां सोनीपत के एक कड़क निरीक्षक की बतौर थाना प्रभारी ड्यूटी थी। उनी पत्नी ने 18 साल के सामान्य कद-काठी के निर्मल को हवालात में देखा, तो दिल पसीज गया। उन्होंने अपने हाथों से निर्मल को ममतावश खाना खिलाया था।

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    सीलन भरे किले की यातनाएं उन्हें महीनों तक

    महेंद्रगढ़ के किले और नारनौल की उस भयावह जेल के सीलन भरे कमरों में तन्हाई में काटनी पड़ी, जहां न खाने को ढंग का निवाला था और न ही तन ढकने को पूरा कपड़ा। दूसरी तरफ, उनका परिवार पूरे एक महीने तक इस आस में तड़पता और सिसकता रहा कि उनका बेटा जिंदा भी है या नहीं।