'अफसरों को आती नहीं, किसान से पढ़ा जाता नहीं', हरियाणा के सिरसा में उर्दू-फारसी का 1800 साल पुराना रिकॉर्ड बना मुसीबत
सिरसा में राजस्व और स्वास्थ्य विभाग के पुराने उर्दू-फारसी रिकॉर्ड को समझने में भारी दिक्कत आ रही है, क्योंकि अब उन्हें पढ़ने वाले कर्मचारी नहीं बचे हैं।

किसान उर्दू का रिकार्ड पढ़वाने के लिए अपने साथ उर्दू ज्ञाता को लेकर आया है। जिसने रिकॉर्ड देखकर जानकारी दी। जागरण।
HighLights
सिरसा में पुराने उर्दू-फारसी रिकॉर्ड समझने में भारी दिक्कतें
राजस्व और स्वास्थ्य विभाग में जानकार कर्मचारी नहीं बचे
किसान दूर से अनुवादक बुलाने को मजबूर, समय-धन व्यय
सनमीत सिंह, सिरसा। कभी दरबारों और दफ्तरों की शान रही फारसी आज अपने ही घर में पराई हो चली है। पुरनियों में कहावत थी, पढ़ें फारसी बेचें तेल, ये देखो कुदरत का खेल, यानी विद्वता कमाकर भी जीविका के लिए उसी से मुंह मोड़ लेना पड़े।
सिरसा में इस कहावत का एक नया ही रूप उभर आया है, यहां फारसी लिखी तो पड़ी है, पर उसे बांचने वाला कोई नहीं बचा। राजस्व विभाग का 1882 से 1960 तक और स्वास्थ्य विभाग का 1800 से 1964 तक का रिकॉर्ड उर्दू-फारसी की जिल्दों में इस तरह कैद है, मानो कोई प्राचीन पोथी अपने भाष्यकार की बाट जोहते-जोहते मौन हो गई हो।
इसे स्वर देने वाला कोई नियमित कर्मचारी अब विभाग के पास शेष नहीं बचा। दूर गांवों से आने वाले लोग अपनी वंशगत थाती की भाषा तलाशते हुए किसी मौलवी की देहरी पर उपस्थित होते हैं तो किसी वयोवृद्ध पटवारी के द्वार पर आस बांधे ठहरे रहते हैं।
सिरसा जिले के ऐलनाबाद क्षेत्र के एक किसान की व्यथा इस विडंबना को मुखर करती है कि अपनी ही मृदा का चरित इतिहास पढ़ने के लिए कैसी दूरियां नापनी पड़ती हैं।
साल 1960 से पहले का उर्दू-फारसी रिकॉर्ड समझने के लिए उसे राजस्थान के टिब्बी क्षेत्र से उर्दू ज्ञाता को साथ लाना पड़ा, मानो अपने ही आंगन की गाथा सुनने के लिए सुदूर प्रांत से भाष्यकार आमंत्रित करना पड़ गया हो।
नाम गोपनीय रखने की शर्त पर किसान ने बताया कि तीन दिन से रुपये व्यय कर तीस किलोमीटर दूर टिब्बी गांव से व्यक्ति बुलाया जा रहा है, जबकि टिब्बी से सिरसा की दूरी स्वयं सौ किलोमीटर के निकट बैठती है।
किसान का प्रश्न सीधा और मार्मिक है, नए पटवारियों को उर्दू का ज्ञान नहीं, तो शासन पुराने रिकॉर्ड का हिंदी अनुवाद करवाकर आमजन की यह वेदना क्यों नहीं हर लेता।
- सिरसा में किसान को राजस्थान से उर्दू ज्ञाता को साथ लेकर आना पड़ा
- टूटे पैर के बावजूद घर बैठे अनुवाद कर रहे बुजुर्ग पटवारी
- मौलवी और पुराने पटवारियों का लिया जा रहा सहारा
- पटवारी उर्दू का पेपर तो पास करते, पर प्रवाह नहीं रहता
