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हिमाचल में पूर्व आपदा प्रबंधन क्या फाइलों तक ही सीमित, मौसम में बदलाव से पहले क्यों नहीं तैयारी? ...तो न बनती ऐसी छवि

By Digital Desk Edited By: Rajesh Sharma
Published: Thu, 29 Jan 2026 11:46 AM (GMT+05:30)

हिमाचल प्रदेश में आपदा प्रबंधन की प्रतिक्रियात्मक शैली पर सवाल उठाए गए हैं। मौसम विभाग की चेतावनी के बावजूद, बर्फबारी ...और पढ़ें

मनाली में गत दिनों बर्फबारी के बीच हाईवे पर फंसे पर्यटक व अन्य लोग। जागरण आर्काइव

मनाली में गत दिनों बर्फबारी के बीच हाईवे पर फंसे पर्यटक व अन्य लोग। जागरण आर्काइव

HighLights

  1. हिमाचल में प्रतिक्रियात्मक आपदा प्रबंधन से बिगड़ती छवि।

  2. मौसम चेतावनी के बावजूद सक्रिय तैयारी का अभाव स्पष्ट।

  3. पर्यटकों को भी यात्रा के प्रति जिम्मेदार होना आवश्यक।

नवनीत शर्मा, धर्मशाला। कई वर्ष पूर्व एक उपायुक्त यानी जिलाधीश का स्थानांतरण हुआ। विदाई पार्टी में अधिकारियों के साथ साथ समाज के लोग भी शामिल हुए। स्थानांतरित होने वाले अधिकारी से लोगों ने कहा-आप के चार वर्ष के कार्यकाल में हमें तत्काल हर समस्या का समाधान मिला। तीन प्रमुख घटनाओं का जिक्र करते हुए लोगों ने उन्हें कहा कि उस समय आपने खूब मोर्चा संभाला। 

जिला अधिकारी महोदय ने सबकी बात सुनने के बाद कहा कि मेरे रहते जो समस्याएं आईं उनके हल हुए तो आप मुझे श्रेय दे रहे हैं...यह उन अधिकारियों के साथ अन्याय है जिनके रहते कोई समस्या आई ही नहीं...आप उनके कार्य को कम नहीं आंक सकते। उनका संकेत पूर्व आपदा प्रबंधन की ओर था। संयोगवश, अब मूल कार्य को छोड़, कुछ और करके चर्चा में बने रहना कतिपय अधिकारियों का प्रिय कार्य प्रतीत होता है। 

हिमाचल प्रदेश में इस घटना का स्मरण इसलिए हो आया क्योंकि हिमाचल प्रदेश के साथ अजीब विरोधाभास जुड़े हैं। साढ़े तीन माह तक वर्षा हुई न हिमपात। किसान कराह रहा था, बागवान बुझे हुए थे, धरती की धमक में चमक नहीं थी और सामान्य लोग खांसते हुए... खुश्क मौसम के विरुद्ध आरोपपत्र बना रहे थे। 

तीन माह के इंतजार के बाद बरसे बादल तो दिखी अव्यवस्था

मौसम विभाग ने चेतावनी जारी की और इस बार सटीक भी बैठी...बर्फ गिरी। अगले दिन से जनजीवन को अस्तव्यस्त बता कर उसी मौसम को बर्फ और वर्षा के कारण 'खराब' बताया जाने लगा, हिमाचल प्रदेश साढ़े तीन माह से जिसकी प्रतीक्षा में था। इतने ट्रांसफार्मर, इतनी सड़कें, इतनी पेयजल योजनाएं....सबके आंकड़े आने लगे। रोहतांग, शिमला का ऊपरी क्षेत्र, कुल्लू के कुछ क्षेत्र...सब स्थानों पर पर्यटकों के फंसने की सूचनाएं भी आती हैं।

प्रशासन पहले सक्रिय हो तो नहीं फंसेंगे पर्यटक

कुछ पर्यटकों को वाहनों में रात गुजारनी पड़ी। वाहनों का मेला लग गया। प्रशासन यदि प्रतिक्रिया बल यानी रिएक्शनरी ताकत के रूप में काम करने के बजाय प्रोएक्टिव यानी पहले से सक्रिय हो कर कार्य करे तो न पर्यटक अटकेगा, न फंसेगा, न उसे वाहन में रात गुजारनी होगी और न पर्यटन के लिए छवि बनाने वाले हिमाचल प्रदेश का नाम प्रदेश से बाहर अप्रिय कारणों से लिया जाएगा। 

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जलशक्ति, बिजली या ऐसे विभागों के वे कर्मचारी अवश्य साधुवाद और धन्यवाद के पात्र हैं जो मौके पर रह कर अपनी जान जोखिम में डाल कर कर्तव्यनिष्ठा का परिचय देते हैं। कोई बर्फ में बिजली के खंबे पर चढ़ा है तो कोई पानी जमी पाइप के साथ अपनी पूरी ताकत लगा कर जूझ रहा है।  

पूर्व आपदा प्रबंधन क्या फाइलों तक ही सीमित

बहरहाल, अधिकारी स्तर पर पूर्व आपदा प्रबंधन, फाइलों पर कागज-कागज खेलने का बहाना गया प्रतीत होता है। नवंबर और दिसंबर में आपदा प्रबंधन की बैठकों में निर्देश ये थे कि राशन की आपूर्ति समय पर सुनिश्चित हो, हिमपात के दौरान सड़कों की बहाली के लिए मशीनरी तैनात हो, यातायात व्यवस्था को बनाए रखा जाए। 

उत्तराखंड से सीखने की जरूरत

हमसे कई वर्ष बाद अस्तित्व में आए उत्तराखंड से यह सीखा जा सकता है कि किस सीमा तक पर्यटक वाहनों को अनुमति देनी है, किस सीमा तक नहीं। संवेदनशील स्थानों पर कितने पर्यटकों को आने देना है, कितनों को नहीं। कोई एक लेन ही खाली रखी जाए, कोई प्रबंध दिखें। पर्यटन को बढ़ा कर पैसा कमाना है तो पार्किंग भी समुचित होनी चाहिए। अन्यथा सड़क के किनारे खड़े वाहन आंगन में आए नाराज अतिथियों का आभास देते हैं। 

इससे होता यह है कि पहले से ही अति पर्यटन झेल रहा हिमाचल कुल सकल घरेलू उत्पाद में तो आठ प्रतिशत से ऊपर नहीं कमाता लेकिन पर्यटक गृह राज्यों में लौट कर ऐसा आभास देता है जैसे कोई अवांछित युद्ध जीत कर आया हो। 

पर्यटकों के भी कुछ कर्तव्य

कुछ कर्तव्य पर्यटकों के हिस्से भी आते हैं, जिन्हें वे भूल जाते हैं। पूर्व आपदा प्रबंधन सरकारों या अधिकारियों के लिए ही नहीं है, लोगों के लिए भी है। सूचना तकनीकी के इस युग में पल पल की अपडेट मिलती है। यात्रा के नियोजन में उसका लाभ लें। जब अपने ही वाहन से आगे तक जाना है और पता है कि फंस सकते हैं तो एक रात काटने का खाने-पीने का सामान क्यों न हो।
 

अनुशासन सीखने की भी जरूरत

इस सारे प्रसंग में उस महिला का प्रसंग छोड़ रहा हूं जिसने बर्फ में खड़े होकर साड़ी का त्याग कर दिया और रील बनाई। उन पर्यटकों का प्रसंग भी छोड़ रहा हूं जो कार की सन रूफ वाले हिस्से से झांकते हैं, वाहन पर बैठे होते हैं और वाहन चल रहा होता है। उनकी बात भी नहीं कर रहा जो पुलिस के लिए ही डंडे निकाल लेते हैं। बर्फ को देखने, उसके नजदीक जाने का एक अनुशासन होता है, जिसे सीखना चाहिए। 

लाइक्स के मोह में दुखांतक कहानी बन गए युवा

चंबा जिले में भरमौर के एक युवा और एक किशोर ने रील के चक्कर में ही जान गंवा दी। ये दोनों संभावनाओं का अनंत आकाश थे किंतु अपरिपक्वता, उचित मार्गदर्शन के अभाव और इंटरनेट मीडिया पर लाइक्स के मोह के कारण दुखांतक कहानी बन गए। हिमाचल प्रदेश में सबका स्वागत है किंतु कभी-कभी हिमाचल पथ परिवहन निगम की बसों में लिखे शब्द भी पढ़ने चाहिए...सवारी अपने सामान की (अपनी भी) स्वयं जिम्मेवार है।

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