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    मंडी-पठानकोट NH पर फिर डरा रहा कोटरोपी का पहाड़, IIT का शोध- मंडरा सकता है बड़ा संकट; ...तब 49 लोगों की हुई थी मौत

    By Digital Desk Edited By: Rajesh Sharma
    Updated: Sun, 05 Jul 2026 12:33 PM (GMT+05:30)

    आईआईटी मंडी के शोध के अनुसार, पठानकोट-मंडी राष्ट्रीय राजमार्ग पर कोटरोपी भूस्खलन क्षेत्र फिर अस्थिर हो गया है। भारी वर्षा से यहां दोबारा भूस्खलन का खत ...और पढ़ें

    मंडी पठानकोट एनएच पर कोटरोपी में 2017 में दरके पहाड़ का हाल।

    मंडी पठानकोट एनएच पर कोटरोपी में 2017 में दरके पहाड़ का हाल।

    HighLights

    1. कोटरोपी का दाहिना हिस्सा अत्यधिक अस्थिर, भूस्खलन का खतरा।

    2. आईआईटी मंडी के शोध में सुरक्षा गुणांक एक से नीचे।

    3. 2017 में 49 लोगों की मौत हुई थी यहां।

    हंसराज सैनी, मंडी। पठानकोट-मंडी राष्ट्रीय राजमार्ग पर पद्धर उपमंडल स्थित कोटरोपी भूस्खलन प्रभावित क्षेत्र फिर धंस सकता है। आइआइटी मंडी के विज्ञानियों के शोध में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। अध्ययन के अनुसार इस क्षेत्र का दाहिना हिस्सा अस्थिर हो चुका है। भारी वर्षा से यहां फिर भूस्खलन का खतरा मंडरा रहा है। विशेषज्ञों ने कोटरोपी की भौगोलिक स्थिति और मिट्टी-चट्टानों की मजबूती को मापने के लिए आधुनिक यूएवी (ड्रोन) मैपिंग, उपग्रह इमेजरी (टैनडेम-एक्स) और कंप्यूटर सिमुलेशन जैसी उन्नत तकनीकों का सहारा लिया।

    विज्ञानियों ने पूरी पहाड़ी ढलान का अध्ययन करने के लिए सात अलग प्रोफाइल तैयार किए। जांच में पाया कि पूरे क्षेत्र का सुरक्षा गुणांक एक से नीचे गिर चुका है, जो इस बात का संकेत है कि पूरी पहाड़ी ही आंतरिक रूप से बेहद कमजोर हो चुकी है।

    2 बसें दब गई थी मलबे में

    यहां 2017 में पहाड़ी दरकने से एचआरटीसी की दो बसों के मलबे की चपेट में आने से 49 लोगों की मौत हो गई थी। कोटरोपी पहाड़ी के दाहिने हिस्से का फैक्टर आफ सेफ्टी महज 0.35 से 0.5 के बीच आंका गया है जो बेहद खतरनाक श्रेणी में आता है। बायां और मध्य भाग कुछ हद तक स्थिर हैं। 

    भूस्खलन की क्या है वजह

    उपग्रह से प्राप्त आंकड़ों (2021 और 2022 के मानसून आंकड़ों) से भी पुष्टि हुई है कि पहाड़ी का दाहिना भाग लगातार खिसक रहा है और इसका शीर्ष क्षेत्र चौड़ा होता जा रहा है। कोटरोपी में बार-बार भूस्खलन होने की मुख्य वजह क्षेत्र से गुजरने वाली मुख्य सीमा भ्रंश रेखा और टेक्टोनिक गतिविधियां हैं। चट्टानों की गलत दिशा, गहरी दरारें और जोड़ों के कारण वर्षा का पानी जमीन में चट्टानों और मिट्टी की पकड़ को खत्म कर रहा है। शोध में भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय तथा जर्मन एयरोस्पेस सेंटर ने तकनीकी सहयोग किया है।

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    इन्होंने किया शोध, नेचर पोर्टफोलियो जर्नल में प्रकाशित

    शोध आइआइटी मंडी के स्कूल आफ सिविल एंड एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग के एसोसिएट प्रोफेसर डेरिक्स पी शुक्ला की देखरेख में शोधार्थी नितेश धीमान, अंकित सिंह, जियोमैटिक्स इंजीनियरिंग विभाग, त्रिभुवन विश्वविद्यालय पश्चिमांचल कैंपस पोखरा नेपाल के नीरज केसी व हेलमहोल्टज सेंटर फार एनवायरनमेंटल रिसर्च यूएफजेड लीपजिग जर्मनी के शरद कुमार गुप्ता ने किया है। शोध नेचर पोर्टफोलियो जर्नल में प्रकाशित हुआ है।

    शोध से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर कोटरोपी में भविष्य में होने वाली जान-माल की हानि को रोकने के लिए समय रहते ठोस कदम उठाए जा सकते हैं और सुरक्षात्मक दीवारें या ड्रेनेज सिस्टम जैसी मजबूत शमन रणनीतियां तैयार की जा सकती हैं।
    -डेरिक्स पी शुक्ला, एसोसिएट प्रोफेसर आइआइटी मंडी।

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