अदाणी समूह मंडी भाव से 300 रुपये कम दाम पर खरीदेगा सेब, हिमाचल के बागवानों को लगा झटका
अदाणी समूह द्वारा घोषित सेब खरीद दरें मौजूदा मंडी भाव से 300 रुपये प्रति पेटी कम हैं, जिससे हिमाचल के ...और पढ़ें

हिमाचल प्रदेश में अदाणी समूह ने सेब के दाम तय कर दिए हैं। प्रतीकात्मक फोटो
HighLights
अदाणी समूह ने मंडी भाव से 300 रुपये कम में सेब खरीदने की घोषणा की।
बागवानों को उम्मीद थी कि बड़ी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, दाम नहीं घटेंगे।
उत्पादन लागत बढ़ने के बावजूद अदाणी के रेट अपर्याप्त, बागवान चिंतित।
जागरण संवाददाता, शिमला। बागवानों को जिस समय सेब के अच्छे दाम मिलने की उम्मीद थी, उसी समय अदाणी समूह की ओर से जारी खरीद रेट ने चिंता बढ़ा दी है। मौजूदा मंडी भाव की तुलना में अदाणी प्रीमियम गुणवत्ता के सेब के लिए करीब 300 रुपये प्रति पेटी कम भुगतान करेगा। अदाणी के घोषित रेट के मुताबिक प्रीमियम सेब की पेटी करीब 2380 रुपये में खरीदी जाएगी, जबकि शिमला की पराला और भट्टाकुफर एपीएमसी मंडियों में इसी गुणवत्ता का सेब 2700 रुपये तक बिक रहा है। ऐसे में बड़ी कंपनी के कम खरीद रेट ने बागवानों के साथ आढ़तियों की भी चिंता बढ़ा दी है।
बागवानों का कहना है कि उन्हें उम्मीद थी कि अदाणी समेत बड़ी कंपनियों के खरीद रेट खुलने के बाद बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और सेब के दाम में और सुधार आएगा। हालांकि, अदाणी के रेट मंडी के मौजूदा भाव से कम होने के कारण अब उलटा मंडी में भी कीमतों पर दबाव बनने की आशंका है। यदि बड़ी मात्रा में सेब कंपनियों की ओर जाने लगा तो एपीएमसी मंडियों में खरीददारों पर भी रेट कम करने का दबाव बन सकता है।
मंडी में अभी मिल रहा बेहतर भाव
शिमला की प्रमुख मंडियों में इन दिनों अच्छी गुणवत्ता के सेब की मांग बनी हुई है। प्रीमियम किस्म का सेब 2600 से 2700 रुपये प्रति पेटी तक बिक रहा है। वहीं गुणवत्ता के अनुसार अन्य श्रेणियों के सेब के दाम में अंतर बना हुआ है। बागवानों के लिए मंडी में मिल रहा यह भाव फिलहाल कंपनियों के घोषित खरीद रेट से बेहतर है। ऐसे में बागवान इस बात को लेकर असमंजस में हैं कि सेब मंडी में बेचें या कंपनियों को दें।
23 रुपये किलो तक बढ़ा रेट, फिर भी राहत नहीं
अदाणी समूह के खरीद रेट पिछले वर्ष की तुलना में करीब 23 रुपये प्रति किलो तक अधिक बताए जा रहे हैं। इसके बावजूद बागवान इसे मौजूदा बाजार परिस्थितियों के अनुरूप पर्याप्त नहीं मान रहे हैं। उनका कहना है कि बीते वर्षों में खाद, दवाइयों, मजदूरी, पैकिंग और ढुलाई समेत उत्पादन लागत लगातार बढ़ी है। ऐसे में केवल पिछले वर्ष की तुलना में रेट बढ़ना पर्याप्त नहीं है, बल्कि मौजूदा मंडी भाव को देखते हुए कंपनियों को प्रतिस्पर्धी दर पर खरीद करनी चाहिए।
