विक्रमादित्य सिंह के अफसरों पर दिए बयान के क्या हैं मायने, नेगी व अनिरुद्ध की प्रतिक्रिया के बीच अब डिप्टी CM की चुप्पी क्यों?
विक्रमादित्य सिंह ने यूपी-बिहार के कुछ आईएएस/आईपीएस अधिकारियों पर 'हिमाचलियत' की धज्जियां उड़ाने का आरोप लगाया है। उनके इस बयान पर राजस्व मंत्री जगत स ...और पढ़ें

हिमाचल प्रदेश के लोक निर्माण विभाग मंत्री विक्रमादित्य सिंह। जागरण आर्काइव
HighLights
विक्रमादित्य सिंह ने यूपी-बिहार के अफसरों पर 'हिमाचलियत' का आरोप लगाया।
जगत सिंह नेगी और अनिरुद्ध सिंह ने बयान से असहमति जताई।
उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री की चुप्पी पर उठे सवाल।
नवनीत शर्मा, धर्मशाला। कई वर्ष पूर्व की बात है। प्रशासनिक सुधारों को समर्पित एक कार्यक्रम टीवी पर लाइव आ रहा था। तत्कालीन प्रधानमंत्री ने अच्छे कार्य के लिए हिमाचल प्रदेश को सम्मानित किया। पुरस्कार एक महिला आइएएस ने प्राप्त किया। प्रधानमंत्री ने अपनी बेहद शालीन मगर घुटी हुई आवाज में मंच से कहा कि देश में भ्रष्टाचार बहुत बढ़ गया है। प्रश्न उठा कि यदि भ्रष्टाचार है तो आप से शक्तिशाली कौन है, कार्रवाई कीजिए।
यह घटना हिमाचल प्रदेश के लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह की इंटरनेट मीडिया पोस्ट देख कर ताजा हो गई। हाल में राजा बुशहर अचानक क्रोधित हुए और फेसबुक पर लिखा कि उत्तर प्रदेश, बिहार के कुछ आला आइएएस और आइपीएस अधिकारी हिमाचलीयत की धज्जियां उड़ा रहे हैं।
उन्होंने न केवल सरकार के तीन वर्ष पूरे होने पर मंडी में दिए गए उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री के भाषण को याद किया कि वह ठीक ही कह रहे थे... यह भी कहा कि ये लोग सेवा करें, शासक न बनें...यह भी कहा गया कि समय रहते निपटना पड़ेगा।
आइएएस अधिकारियों के लिए हिमाचलीयत की बात सुन कर याद आए मराठी मानुष और मराठी मानुष वाले आग्रह के साथ ही कौंध गए उद्धव ठाकरे और 'नाटी' संजय राउत।
उसे दुख धरा का सुनाना पहाड़ो कि अंबर तुम्हारे बहुत पास होगा...विक्रमादित्य सिंह मंत्रिपरिषद का भाग हैं...मुख्यमंत्री के साथ भी दिखते हैं, क्या इतनी सी बात वहां नहीं हो सकती थी? और यदि नहीं हो सकती थी तो अफसरों या जनता का दोष क्या है? उसका खामियाजा कई पक्ष उठा रहे हैं। पहला पक्ष स्वयं सरकार का भाग विक्रमादित्य सिंह हैं, जिन्होंने सरकार में होते हुए भी अपनी विवशता प्रकट की, निरूपा राय की तरह निरुपाय होना दिखाया।
दूसरा पक्ष कांग्रेस पार्टी है जो स्वयं को राष्ट्रीय दल कहती है लेकिन अफसरों को लेकर उत्तर प्रदेश, बिहार करती है। तीसरा पक्ष सरकार है, जिस पर आक्रमण करने का अवसर प्रतिपक्ष को थमा दिया गया। चौथा पक्ष वे नौकरशाह हैं जो अखिल भारतीय परीक्षा उत्तीर्ण करके किसी भी प्रांत को अपनी कर्मस्थली के रूप में चुनते हैं। सरदार पटेल ने स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात इस सेवा का चरित्र स्थानीय नहीं, राष्ट्रीय बनाया था क्योंकि राष्ट्र पहले है। हिमाचल प्रदेश में स्थानीय और अस्थानीय की दरार इन आरोपों से चौड़ी न हो जाए, ऐसी प्रार्थना ही की जा सकती है।
नेगी और अनिरुद्ध की प्रतिक्रिया से ज्यादा खींची रार
राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी भी सरकार का भाग हैं। वे कहते हैं कि इससे अधिकारियों का मनोबल गिरता है और इस प्रकार की स्वीपिंग स्टेटमेंट नहीं देनी चाहिए…, नाम बताना चाहिए आदि। जगत सिंह दूसरे कोने की ओर निकल गए, जहां वह यह कहना चाह रहे थे कि उधर से यदि ऐसे अधिकारी आते हैं तो इधर भी ऐसे अधिकारी हो सकते हैं। पंचायती राज मंत्री अनिरुद्ध सिंह भी विक्रमादित्य के बयान से सहमत नहीं। वह तो यह भी कह गए कि अफसरों से काम लेना आना चाहिए।
हिमाचल के कई अधिकारी यूपी व बिहार के
विक्रमादित्य सिंह कहते हैं कि नाम भी समय आने पर बताया जाएगा। हिमाचल प्रदेश में तो कई अधिकारी ऐसे हैं जो उत्तर प्रदेश और बिहार से आते हैं। क्या सब के नाम बताएंगे? और यदि कुछ के ही नाम बताएंगे तो बाकी के अधिकारियों को यह मानसिक दंड क्यों? श्रेयस्कर होता यदि नाम बताते, घटनाएं बताते।
मुकेश अग्निहोत्री क्यों साधी चुप्पी
जिन मुकेश अग्निहोत्री ने कहा था कि कुछ अधिकारी रात के अंधेरे में भाजपा नेताओं के घर जाते हैं, विक्रमादित्य सिंह ने उसी का संदर्भ लेकर अपना कथन खड़ा किया लेकिन मुकेश चुप हैं। सामंजस्य या समन्वय नहीं है। मुकेश तो आज तक यह नहीं बता पाए कि साजिशें कौन और कब कर रहा था।
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अधिकारियों पर सवाल क्यों
आइएएस अधिकारी चुप हैं। उनका निर्णय है कि विक्रमादित्य सिंह के इस बयान पर कोई राय ही न दी जाए। इस सबके बावजूद यह अधिकारियों को भी सोचना होगा कि राजनीतिक लोग उन्हें अपने मैदान का फुटबाल क्यों बनाते हैं। आखिर उनके कामकाज या व्यवहार में ऐसा क्या आ जाता है कि मंत्रिपद पर बैठे व्यक्ति को भी उन पर आरोप लगाने पड़ते हैं। आपको पहले दिन से चालक, वाहन और सुरक्षा अधिकारी मिलता है।
...यहां सामंतवादी सोच नहीं
इसके बावजूद एक वरीय आला अधिकारी ने सेवानिवृत्ति से कुछ माह पहले यह क्षोभ व्यक्त किया था..’ हिमाचल आकर गलती कर ली। यहां है ही क्या।’ सच यह है कि यहां सामंतवादी सोच नहीं है। कई राज्यों में एमएलए और एसडीएम ही लंबा चौड़ा रुआब लेकर चलते हैं, हिमाचल प्रदेश में स्थिति अलग है। यहां जिलाधीश, जिला मजिस्ट्रेट या कलेक्टर नहीं कहते जो नियंत्रण दिखाता है। यहां उपायुक्त कहते हैं जो विकास से जुड़ा है। उपायुक्त। न उससे अधिक, न कम।
राज्य के परिवेश को समझना और उसमें ढलना तो पहली अनिवार्यता है ही, अन्यथा कैसा प्रशासन जनता के द्वार। इस वातावरण में जब सरकार और आइएएस लेने से इन्कार कर चुकी है, अपनी उपयोगिता और प्रासंगिकता तो बनाए रखनी ही होगी। इसके बावजूद, अफसरों को प्रांतीय आधार पर बांटना उचित है न व्यावहारिक। अधिकारी तो अधिकारी हैं, श्रम के सदर्भ में भी हिमाचल प्रदेश से उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ को हटा देंगे तो आपके पास है ही क्या?