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'सरकार की पेंशन लाभ से वंचित करने की नीति ठीक नहीं', हिमाचल हाई कोर्ट ने विवादित आदेश पर अफसर को लगाया जुर्माना

By Rohit Nagpal Edited By: Rajesh Sharma
Published: Wed, 07 Oct 2026 06:32 PM (IST)

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने पेंशन लाभ से वंचित करने की राज्य सरकार की नीति पर नाराजगी जताई है। कोर्ट ...और पढ़ें

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का शिमला स्थित परिसर। जागरण आर्काइव

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का शिमला स्थित परिसर। जागरण आर्काइव

HighLights

  1. हाई कोर्ट ने पेंशन लाभ से वंचित करने पर नाराजगी जताई।

  2. संबंधित अधिकारी पर ₹10,000 का जुर्माना लगाया गया।

  3. जुर्माने की राशि पीड़ित कर्मचारी को दी जाएगी।

विधि संवाददाता, शिमला। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने पेंशन लाभ से वंचित करने की राज्य सरकार की नीति पर नाराजगी जताई है। कोर्ट ने सरकार की अपील को खारिज कर विवादित आदेश पारित करने वाले संबंधित अधिकारी पर ₹10,000 रुपये का जुर्माना लगाया है। मुख्य न्यायाधीश जीएस संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन सी नेगी की खंडपीठ ने आदेश दिए कि जुर्माने की राशि प्रतिवादी बुजुर्ग कर्मचारी को दी जाए। 

खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों (सुंदर सिंह और बालो देवी मामले) का हवाला दिया। इस नियम के अनुसार, दैनिक वेतनभोगी के रूप में की पांच साल की सेवा को एक साल की नियमित सेवा के बराबर माना जाता है।

ये अवधि पेंशन लाभ के लिए वैध

कर्म चंद की सात साल की दैनिक वेतन सेवा के बदले उनकी नियमित सेवा में एक साल और जोड़ा गया, जिससे उनकी कुल पेंशन योग्य सेवा नौ साल चार महीने हो गई। कोर्ट ने माना कि यह अवधि पेंशन लाभ के लिए वैध है।

सरकार ने कर दिया था इन्कार

याचिकाकर्ता कर्म चंद लोक निर्माण विभाग में साल 2006 से दैनिक वेतनभोगी बेलदार के रूप में कार्यरत था। आठ अक्टूबर 2013 को उसकी सेवाएं नियमित की गईं और 28 फरवरी 2022 को वह सेवानिवृत्त हुआ। उसकी नियमित सेवा आठ साल चार महीने की थी। सरकार ने यह कहकर उन्हें पेंशन देने से इन्कार कर दिया कि केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियमावली, 1972 के तहत न्यूनतम 10 साल की नियमित सेवा अनिवार्य है।

अधिकारी की जेब से जुर्माना वसूलने का दिया आदेश

इससे पहले एकलपीठ ने सरकार पर ₹10,000 का जुर्माना लगाया था और इसे चीफ जस्टिस डिजास्टर रिलीफ फंड में जमा करने को कहा था। खंडपीठ ने इसमें सुधार करते हुए आदेश दिया कि यह ₹10,000 का जुर्माना उस अधिकारी की जेब से वसूला जाए जिसने पेंशन रोकने का गलत आदेश जारी किया था, और यह राशि पीड़ित कर्मचारी को मानसिक उत्पीड़न के मुआवजे के रूप में दी जाए।

हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की इस अपील पर असंतोष जताते हुए कहा कि यह अपील केवल चतुर्थ श्रेणी के गरीब कर्मचारियों को बार-बार मुकदमेबाजी में घसीटने के सरकारी रवैये को दर्शाती है।

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