'रक्षक जब भक्षक बन जाएं तो बर्खास्तगी बिल्कुल जायज', हिमाचल हाई कोर्ट ने सख्त टिप्पणी के साथ खारिज की याचिका
हिमाचल हाईकोर्ट ने मादक पदार्थ अधिनियम के तहत दोषी ठहराए गए पुलिसकर्मियों की सेवा बहाली याचिकाएं खारिज कर दीं। कोर्ट ने कहा कि कानून के रक्षक ही भक्षक ...और पढ़ें

हिमाचल हाई कोर्ट का शिमला परिसर। जागरण आर्काइव
HighLights
पुलिसकर्मियों की सेवा बहाली याचिकाएं हाईकोर्ट ने खारिज कीं।
मादक पदार्थ अधिनियम में दोषी पाए गए थे कांस्टेबल।
कानून तोड़ने वाले रक्षकों की बर्खास्तगी को उचित ठहराया।
विधि संवाददाता, शिमला। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने मादक पदार्थ अधिनियम के तहत दोषी ठहराए गए पुलिसकर्मियों की सेवा बहाली याचिकाओं को खारिज करते हुए एक बड़ा नजीर पेश करने वाला निर्णय सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट तौर पर कहा कि समाज में कानून व्यवस्था बनाए रखने और ड्रग्स तस्करी जैसे अपराधों को रोकने की जिन पर भारी जिम्मेदारी थी, जब वे रक्षक ही स्वयं कानून तोड़ने वाले बन जाएं, तो उन्हें सेवा से बर्खास्त करना पूरी तरह उचित और न्यायसंगत है।
न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल की एकल पीठ ने दो कॉन्स्टेबलों की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई के बाद यह फैसला दिया। याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि हाईकोर्ट ने आपराधिक अपीलों की पेंडेंसी के दौरान निचली अदालत द्वारा उन्हें दी गई सजा को निलंबित कर रखा है।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देकर कानूनी स्थिति साफ की। कोर्ट ने कहा कि अपीलीय अदालत द्वारा केवल जेल की सजा को स्थगित किया गया है, लेकिन उनके दोषी होने के निचली अदालत के फैसले पर कोई स्टे नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों के अनुसार, जब तक सक्षम उच्च न्यायालय दोषसिद्धि के फैसले को पूरी तरह पलट नहीं देता, तब तक ऐसे गंभीर दागी व्यक्ति को अनुशासित पुलिस बल की सेवा में बनाए रखना प्रशासनिक मोराल और जन विश्वास को पूरी तरह से ठेस पहुंचाता है।
याचिकाकर्ताओं का क्या था तर्क
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि संविधान के अनुच्छेद 311(2) के तहत बिना किसी विस्तृत विभागीय जांच के पुलिस महानिदेशक ने सीधे उन्हें नौकरी से निकाल दिया जो कि नियमों के विरुद्ध है।
दलील खारिज
हाई कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि संविधान का विशेष प्रावधान स्पष्ट अधिकार देता है कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी को किसी आपराधिक मामले में कोर्ट द्वारा 'दोषी' मान लिया जाता है, तो सक्षम प्राधिकारी को यह अधिकार है कि वह बिना किसी नए सिरे से विभागीय इंक्वायरी या कारण बताओ नोटिस के सीधे उसे सेवा से बर्खास्त, हटा या डिमोट कर सकता है।
2016 में चरस के साथ पकड़ा था पुलिस कॉन्स्टेबल
मामले के अनुसार एक कॉन्स्टेबल साल 2016 में सुंदरनगर के पास चेकिंग के दौरान '1003 ग्राम चरस' (व्यावसायिक मात्रा) बरामद हुई थी। इसके बाद विशेष अदालत (स्पेशल जज, मंडी) ने उन्हें NDPS एक्ट के तहत दोषी पाते हुए 3 साल के कठोर कारावास और ₹25,000 जुर्माने की सजा सुनाई थी।
2019 में नशीले पदार्थ के साथ पकड़ा गया दूसरा
दूसरे कांस्टेबल को भुंतर (कुल्लू) पुलिस ने साल 2019 में नशीली दवाओं की बड़ी खेप की तस्करी के मामले में सह-आरोपियों के साथ गिरफ्तार किया था। इन्हें भी रामपुर बुशहर की विशेष अदालत ने दिसंबर 2023 में ड्रग्स तस्करी का दोषी करार दिया था।
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डीजीपी ने बर्खास्त किए हैं दोनों
इन अदालती फैसलों के आने के बाद जनवरी 2026 में तत्कालीन डीजीपी ने हिमाचल प्रदेश पुलिस अधिनियम, 2007 की धारा 63 और संविधान के नियमों के तहत इन दोनों पुलिसकर्मियों को सेवा से तत्काल बर्खास्त करने के आदेश जारी किए थे। हाईकोर्ट ने डीजीपी के इन दोनों आदेशों में किसी भी प्रकार की कानूनी अवैधता या त्रुटि न पाते हुए दोनों रिट याचिकाओं को मेरिट के अभाव में खारिज कर दिया।