'कम छात्र संख्या वाले स्कूल का विलय सही', हिमाचल हाई कोर्ट का फैसला; कहा- स्टाफ और संसाधनों का सही इस्तेमाल हो
हिमाचल हाई कोर्ट ने कम छात्र संख्या वाले सरकारी मिडल स्कूल के नजदीकी सीनियर सेकेंडरी स्कूल में विलय के सरकार के फैसले को सही ठहराया है।

हिमाचल हाई कोर्ट ने कम संख्या वाले स्कूल को मर्ज करने को सही ठहराया है। प्रतीकात्मक फोटो
HighLights
कम छात्र संख्या वाले स्कूल का विलय सही ठहराया।
संसाधनों की बर्बादी रोकने के लिए कोर्ट का अहम फैसला।
छात्रों को बेहतर सीखने का माहौल मिलेगा विलय से।
विधि संवाददाता, शिमला। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने बिलासपुर जिले के एक सरकारी मिडल स्कूल को नजदीकी सीनियर सेकेंडरी स्कूल में विलय करने के सरकार के फैसले को हरी झंडी दे दी है। अदालत ने कहा कि जिस स्कूल में नाममात्र के छात्र बचे हों, वहां विभाग के शिक्षण और गैर-शिक्षण स्टाफ जैसे कीमती संसाधनों को बर्बाद करने के बजाय उनका उपयोग उन स्कूलों में किया जाना चाहिए, जहां छात्रों की संख्या पर्याप्त है।
न्यायाधीश अजय मोहन गोयल और न्यायाधीश योगेश जसवाल की खंडपीठ ने स्कूल मैनेजमेंट कमेटी द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। याचिकाकर्ता स्कूल प्रबंधन समिति ने सरकार की 10 जून 2026 की उस अधिसूचना को चुनौती दी थी, जिसके तहत राजकीय मिडल स्कूल संडयार (शिक्षा ब्लॉक घुमारवीं-I, जिला बिलासपुर) को बंद करके उसका विलय नजदीकी राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला छत में कर दिया गया था।
12 छात्र थे और दो शिक्षक
सरकार की ओर से कोर्ट को सूचित किया गया कि जिस स्कूल में बच्चों को शिफ्ट किया गया है, उसकी दूरी सड़क मार्ग से महज 1.5 किलोमीटर और पैदल रास्ते से सिर्फ 500 मीटर है। विलय के समय मिडल स्कूल संडयार (कक्षा 6वीं से 8वीं) में कुल 12 छात्र नामांकित थे, जबकि स्टाफ में केवल 2 शिक्षक और 1 गैर-शिक्षण कर्मचारी शामिल था।
पढ़ाई की निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए 11 छात्रों को राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला छत और एक छात्र को राजकीय उच्च विद्यालय अंद्रोली में समायोजित कर दिया गया है।
....तो जरूर हस्तक्षेप करता कोर्ट
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल मिडल स्कूल (6वीं से 8वीं) का विलय किया गया है, जबकि राजकीय प्राथमिक स्कूल संडयार (नर्सरी से 5वीं तक) पहले की तरह स्वतंत्र रूप से चलता रहेगा, जहां वर्तमान में 15 छात्र पढ़ रहे हैं। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यदि छात्रों को ऐसे स्कूल में भेजा जाता, जहां पहुंचना उनके लिए आसान नहीं होता, तो कोर्ट इस मामले में जरूर हस्तक्षेप करता।
लेकिन वर्तमान स्थिति और दूरी को देखते हुए सरकार का यह फैसला बिल्कुल भी मनमाना या तर्कहीन नहीं है। संसाधनों के उचित उपयोग और बच्चों को एक बेहतर 'पीयर-ग्रुप' (सहपाठियों के बीच सीखने का माहौल) देने के लिए यह विलय न्यायसंगत है।
