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नेपाल की त्रासदी के बाद हिमाचल में अलर्ट, ग्लेशियर झीलों पर 24 घंटे सेटेलाइट से हो रही निगरानी

Published: Thu, 27 Aug 2026 10:02 PM (IST)

नेपाल की त्रासदी के बाद हिमाचल प्रदेश ने उच्च हिमालयी क्षेत्रों में संभावित ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) के खतरे को देखते हुए 24 घंटे निगरानी शुरू कर दी है।

नेपाल की त्रासदी के बाद हिमाचल अलर्ट पर, ग्लेशियर झीलों पर 24 घंटे नजर।

नेपाल की त्रासदी के बाद हिमाचल अलर्ट पर, ग्लेशियर झीलों पर 24 घंटे नजर।

HighLights

  1. नेपाल त्रासदी के बाद हिमाचल में ग्लेशियर अलर्ट जारी

  2. 48 संवेदनशील झीलों सहित पूरे उच्च हिमालयी क्षेत्र की निगरानी

  3. प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और आपदा तैयारी को मजबूत किया जा रहा

राज्य ब्यूरो, शिमला। नेपाल में हालिया ग्लेशियर और बाढ़ की घटना के बाद हिमाचल में अलर्ट लारी कर दिया है। सरकार ने उच्च हिमालयी क्षेत्रों में संभावित ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड के खतरे को लेकर चौबीस घंटे निगरानी शुरू कर दी है।

हिमाचल प्रदेश ने इस चुनौती से निपटने के लिए निगरानी और आपदा तैयारी को कई स्तरों पर मजबूत करना शुरू कर दिया है। 48 अति-संवेदनशील झीलें हिमाचल में हैं। अब चार तरह से नजर रखी जाएगी। जिसमें संवेदनशील हिमनद झीलों के केवल आकार में होने वाले बदलाव पर ही नजर नहीं रहेगी, बल्कि अस्थिर ग्लेशियर, बर्फ और चट्टानों के हिमस्खलन, भूस्खलन और नदियों में बनने वाले अस्थायी अवरोधों की भी निगरानी की जाएगी।

राज्य में महत्वपूर्ण और संभावित रूप से संवेदनशील हिमनद झीलों की सैटेलाइट और रिमोट सेंसिंग तकनीक से नियमित निगरानी की जा रही है। हिमालय क्षेत्र की सबसे बड़ी लाहुल-स्पीति की गेपांगगथ झील भी इस निगरानी के दायरे में है।

वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार इस झील का क्षेत्रफल 1970 के दशक में करीब 27 हेक्टेयर था, जो 2019 में बढ़कर लगभग 99 हेक्टेयर हो गया। झील के क्षेत्रफल और अन्य संकेतकों में होने वाले बदलाव पर लगातार नजर रखी जा रही है, ताकि खतरे की पहचान समय रहते हो सके।

संवेदनशील हिमनद झीलों के नीचे आने वाले क्षेत्रों का डाउनस्ट्रीम बाढ़ जोखिम मानचित्रण भी किया जा रहा है। गेपांगगथ झील के डाउनस्ट्रीम क्षेत्र में नदी से 300 मीटर तक के हिस्से को रेड, येलो और ग्रीन जोन में चिन्हित करने का काम शुरू किया गया है।

इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि अचानक बाढ़ आने पर कौन से गांव, आबादी और महत्वपूर्ण ढांचा सबसे अधिक प्रभावित हो सकता है। संभावित बाढ़ के स्तर को भी जमीन पर चिन्हित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य वैज्ञानिक आकलन को स्थानीय लोगों के लिए ऐसी सरल सूचना में बदलना है, जिसे आपदा के समय तुरंत समझकर सुरक्षित स्थान की ओर निकला जा सके।

चेतावनी से लेकर निकासी तक तैयारी

हिमाचल प्रदेश सी-डैक के सहयोग से अर्ली वार्निंग सिस्टम को मजबूत कर रहा है। निगरानी से मिलने वाली वैज्ञानिक जानकारी को समय पर चेतावनी में बदलकर डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों में रहने वाले लोगों तक पहुंचाने की व्यवस्था विकसित की जा रही है।

साथ ही आपदा प्रबंधन अधिकारियों और फील्ड स्टाफ का नियमित प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण किया जा रहा है, ताकि चेतावनी जारी होने के बाद तेजी से निकासी और प्रभावी राहत-बचाव सुनिश्चित हो सके।

अब सिर्फ झील नहीं, पूरा हाई-अल्टीट्यूड सिस्टम निगरानी में

विशेषज्ञों और अधिकारियों के मुताबिक हिमनद टूटने की घटना के बाद बेहद कम समय में अस्थायी झील बन सकती है और उसका पानी अचानक नीचे की ओर बह सकता है। ऐसे मामलों में पारंपरिक बाढ़ पूर्वानुमान प्रणाली को चेतावनी जारी करने के लिए बहुत कम समय मिल सकता है।

इसलिए हिमाचल अब एकीकृत उच्च हिमालयी खतरा निगरानी प्रणाली विकसित करने की दिशा में बढ़ रहा है। इस प्रणाली में हिमनद झीलों के साथ-साथ अस्थिर ग्लेशियर, बर्फ-चट्टान के हिमस्खलन, भूस्खलन और नदियों में बनने वाले प्राकृतिक अस्थायी बांधों की पहचान भी शामिल होगी। यानी खतरा पैदा होने के बाद प्रतिक्रिया देने के बजाय खतरे के संकेत मिलते ही चेतावनी और निकासी की तैयारी पर जोर होगा।

आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के विशेष सचिव पुष्पेंद्र राणा ने बताया कि सभी अलर्ट पर हैं। इसके लिए चार प्रकार से निगरानी और प्रबंधन किया जा रहा है। अधिकारियों के साथ लगातार बैठक कर बदलाव के साथ सारी रुपरेखा को तैयार कर लिया गया है।