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हिमाचल की सुक्खू सरकार तीसरी बार उपचुनावी परीक्षा से गुजरेगी, रामपुर में 567 वोट के अंतर ने बदले पुराने समीकरण

By Anil Thakur Edited By: Rajesh Sharma
Published: Thu, 05 Nov 2026 06:24 AM (IST)Updated: Thu, 05 Nov 2026 11:12 AM (IST)

हिमाचल प्रदेश की रामपुर विधानसभा सीट पर होने वाला उपचुनाव राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण संकेत देगा। यह कांग्रेस के लिए अपना परंपरागत गढ़ बचानेकी परीक्षा होगी।

हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर। जागरण आर्काइव

हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर। जागरण आर्काइव

HighLights

  1. रामपुर उपचुनाव कांग्रेस के लिए परंपरागत गढ़ बचाने की बड़ी चुनौती।

  2. यह उपचुनाव सुक्खू सरकार के चार साल के कामकाज का रिपोर्ट कार्ड।

  3. वीरभद्र सिंह की विरासत और संगठन के समीकरण टिकट चयन में अहम।

अनिल ठाकुर, शिमला। हिमाचल की सत्ता का अगला सियासी संकेत रामपुर से मिल सकता है। विधायक नंद लाल के निधन से रिक्त हुई इस विधानसभा सीट पर उपचुनाव होना है। यह मुकाबला कांग्रेस के लिए केवल अपना परंपरागत गढ़ बचाने की चुनौती नहीं, बल्कि पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वीरभद्र सिंह की राजनीतिक विरासत और मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू की मौजूदा सियासत के बीच जनसमर्थन की परीक्षा भी होगा।

दिसंबर में सुक्खू सरकार के चार साल पूरे होने हैं। ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले होने वाला यह उपचुनाव सरकार के कामकाज का रिपोर्ट कार्ड भी बनेगा। कांग्रेस के सामने पुराने गढ़ में जनाधार बनाए रखने की चुनौती होगी, जबकि भाजपा इसे सरकार के चार साल के कामकाज पर जनता की राय जानने के अवसर के रूप में देखेगी। 

सुक्खू सरकार का तीसरा उपचुनाव

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष विनय कुमार के नेतृत्व में यह पहला उपचुनाव होगा। सरकार गठन के बाद तीसरी बार सुक्खू सरकार उपचुनावी परीक्षा से गुजरेगी। इससे पहले दो चुनावी दौर में कांग्रेस को सफलता मिली थी। ऐसे में रामपुर का परिणाम सरकार और संगठन दोनों के लिए महत्वपूर्ण होगा और इसके राजनीतिक संकेत 2027 के विधानसभा चुनाव तक जा सकते हैं।

567 मतों के अंतर ने बदले चुनावी समीकरण

रामपुर लंबे समय से कांग्रेस का मजबूत गढ़ रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वीरभद्र सिंह का गृह क्षेत्र होने के कारण इसका राजनीतिक महत्व भी विशेष रहा है। अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट होने से वीरभद्र सिंह यहां से चुनाव नहीं लड़ सके, लेकिन उनकी लोकप्रियता और राजनीतिक पकड़ का लाभ कांग्रेस को मिलता रहा। वर्ष 1977 में जनता पार्टी ने यहां जीत दर्ज की थी। इसके बाद कांग्रेस ने अपनी पकड़ बनाए रखी।

वर्ष 2007 से 2022 तक नंदलाल लगातार विधायक चुने गए। हालांकि, 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने युवा चेहरे कौल नेगी को मैदान में उतारकर मुकाबला कड़ा कर दिया। नंदलाल और कौल नेगी के बीच जीत-हार का अंतर महज 567 मतों का रहा। इस नतीजे ने संकेत दिया कि वीरभद्र सिंह की विरासत और परंपरागत जनसमर्थन के बावजूद रामपुर में चुनावी मुकाबला अब आसान नहीं रहा है।

टिकट चयन में विरासत और संगठन के समीकरण अहम

उपचुनाव में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती प्रत्याशी चयन की होगी। वीरभद्र सिंह के गृह क्षेत्र में टिकट का फैसला राजनीतिक और संगठनात्मक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण रहेगा। इस दौरान वीरभद्र परिवार की पसंद-नापसंद पर भी नजर रहेगी। पार्टी में चार से पांच दावेदार सक्रिय बताए जा रहे हैं। हाल ही में पूर्व कैलाश फेडरेशन अध्यक्ष बृजलाल का करीब 300 समर्थकों के साथ कांग्रेस में शामिल होना भी नए समीकरणों की ओर संकेत करता है। इससे टिकट की दौड़ और दिलचस्प हो गई है।

भाजपा के पास एक विकल्प

दूसरी ओर, भाजपा के पास कौल नेगी के रूप में पहले से चुनाव लड़ चुके प्रत्याशी का विकल्प मौजूद है। वर्ष 2022 में नंदलाल को कड़ी टक्कर देने के बाद पार्टी उनके नाम पर दोबारा विचार कर सकती है। भाजपा के सामने पिछली चुनावी बढ़त को उपचुनाव में राजनीतिक सफलता में बदलने की चुनौती रहेगी।

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