सिरमौरी नाटी की एक नहीं 10 विधाएं, हिमाचल के साथ उत्तराखंड में भी प्रचलन; खास मौके पर होता है हर नृत्य
यह लेख हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के प्रसिद्ध लोक नृत्य सिरमौरी नाटी और उसकी दस विविध विधाओं का विस्तृत ...और पढ़ें

सिरमौरी नाटी की एक नहीं, बल्कि 10 विधाएं हैं।
HighLights
सिरमौरी नाटी हिमाचल और उत्तराखंड का प्रसिद्ध लोक नृत्य है।
इसमें दीपक, ठोडा, परात जैसे दस प्रमुख नृत्य शामिल हैं।
ये नृत्य शादी, त्योहारों और धार्मिक अवसरों पर किए जाते हैं।
जागरण टीम, नाहन। हिमाचल प्रदेश की सिरमौरी नाटी जिला सिरमौर का प्रसिद्ध नृत्य है। जिसे शादी-विवाह, मेलों, त्यौहारों तथा अन्य धार्मिक एवं मांगलिक अवसरों पर किया जाता है। सिरमौरी नाटी में दीपक नृत्य, रिहाल्टी गी, परात नृत्य, हुड़क नृत्य इत्यादि विभिन्न विधाएं आती हैं। मूलत: सिरमौरी नाटी में नर्तक पारंपरिक पहाड़ी वेशभूषा पहनकर एक घेरे में लयबद्ध तरीके से कदमताल करते हैं। हिमाचल के साथ उत्तराखंड में भी इसका प्रचलन है।
दीपक नृत्य
हिमाचल प्रदेश में भगवान शिव की अराधना विभिन्न रूपों में की जाती है जैसे शिरगुल, महादेव, रूद्र, बिजट इत्यादि। 'दीपक नृत्य' नृत्य शैली द्वारा अराध्य ईष्ट देव की अराधना करने का एक ढंग है। कलाकार पानी से भरे पात्र को सिर पर उल्टा रख कर तथा उस पर चार भुजाओं वाले जलते हुए दीपक को रख कर साष्टांग प्रणाम करते हुए जमीन पर पड़े रूमाल को मुंह से उठाते हैं तथा गीतों में बिजट व शिरगुल महाराज तथा रेणुका माता की शक्ति का बखान करते हैं।
ठोडा नृत्य
सिरमौर के ठोडा नृत्य का संबंध महाभारत काल से माना जाता है। यह नृत्य विशेषकर जिला सिरमौर व शिमला जिला में होने वाले विशु मेलों में किया जाता है। यह नृत्य कौरव समर्थक शाठड़, पांडव समर्थक पाशड़ खश कनैत राजपूत की ओर से किया जाता है। ठोडा मात्र एक नृत्य ही नहीं बल्कि लोक नृत्य, लोक क्रीड़ा व लोक नाट्य की त्रिविधा है। ठोडा नृत्य केवल खश कनैत राजपूत द्वारा ही किया जाता है। इस नृत्य व खेल में अन्य खेलों की भान्ति कोई निर्णायक नहीं होता है, बल्कि ठोडा के खिलाड़ी स्वयं ही निर्णायक होते हैं।
कोई भी ठोडा के खुंद का दल अपने समर्थक दल के साथ नहीं खेलता है उदाहारण के तौर पर शाठड़ खश कनैत राजपूत के किसी भी शाठड़ दल के साथ नहीं खेलता है वह अपने प्रतिद्वंदी पांशड़ दल के खश कनैत राजपूत के साथ ही ठोडा खेलता है। निस्संदेह आज के युग में ठोडा नृत्य हमें युगों-युगों पुरानी युद्ध परंपरा व धर्म की विजय और अधर्म की पराजय की याद दिलाता है।

रिहाल्टी गी
रिहाल्टी, हरयाली का अपभ्रंश माना गया है। विशेषकर बरसात में जब चारों ओर हरयाली होती है तो हरे-भरे पेड़-पौधों के हिलोरे की तरह गांव के युवक और युवतियां भी एक जैसे नृत्य कदमों के साथ नृत्य करते हैं। वैसे यह नृत्य विशेष रूप से हरियाली अथवा बरसात का नृत्य है परंतु अनेक देव पर्वों व मांगलिक अवसरों पर भी यह नृत्य समूह में किया जाता है। रिहालटी गी नृत्य कई बार पूरे दिनभर भी चलता है सैकड़ों की संख्या में महिलाएं व पुरुष एक कदमताल में नृत्य करते है।
मुंजरा गी
मुंजरा, शादी विवाह व अनेक खुशी व मांगलिक अवसर पर किया जाने वाला नृत्य है। इसमें गांव के लोग गोलदारे में बैठकर पुरुष व महिला बारी-बारी से खड़े होकर नृत्य करते हैं। अन्य लोग मिलकर गीत गाकर व तालियां बजाते हुए इस नृत्य का आनंद लेते हैं। इस नृत्य में ज्यादातर श्रृंगाररस प्रधान गीत गाए जाते हैं। शादी विवाह आदि एवं सिरमौर में होने वाले अनेकों त्यौहारों में मुंजरा लगाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है।
गांव के किसी बड़े आंगन अथवा खलियान में सभी लोग एकत्र होकर मुंजरा लगाते हैं। मुंजरा में एक युवक और युवती का जोड़े में भी नृत्य कई बार प्रणय कारण भी बना है। मुंजरा के बिना किसी भी प्रकार के मांगलिक अवसर अधूरे माने जाते हैं। यहां तक कि गांव के लोग घास काटने, गोबर ढोने तथा अन्य सामूहिक कार्य के लिए इकट्ठा होते हैं तो दिनभर काम कर रात्रि को मुंजरा लगाकर दिन की थकान दूर करते हैं।
परात नृत्य
परात नृत्य जिला सिरमौर का प्रसिद्ध नृत्य है। इस नृत्य में लोक कलाकार हाथ की अंगुली पर परात घुमाते हुए नृत्य करते हैं और घुमती हुई परात को कई बार उंगली से उछाल कर लकड़ी की छड़ी पर नियंत्रित करके घूमते हुए नृत्य करते हैं। परात नृत्य का संबंध भगवान विष्णु की ओर से धारण किए गए सुदर्शन चक्र से माना जाता है। उंगली पर धूमती हुई परात ठीक सुदर्शन चक्र की भांति नजर आती है।

रासा नृत्य
रासा नृत्य की उत्पति रास शब्द से मानी जाती है जिस प्रकार भगवान श्री कृष्ण ब्रज में गोपियों के संग रास रचाया करते थे, उसी प्रकार सिरमौर के युवक-युवतियां भी एक दूसरे के हाथ पकड़कर एक लय व कदमताल में तावली नाटी में रासा नृत्य करते हैं।

बुड़ाह नृत्य
बुड़ाह नृत्य दिवाली व सिरमौर जिला में दिवाली के एक माह पश्चात् बूढ़ी दिवाली में किया जाता है। इस नृत्य में कलाकार चोलटू पहनकर हुड़ग की थाप पर घटना प्रधान गीत लंबे गाथा गीत जिन्हें हारुल कहा जाता है, का गायन कर नृत्य करते हैं। यह परंपरा विशेष रूप से सिरमौर जिला के संगड़ाह व शिलाई क्षेत्रों में विद्यमान है।
सिंहटू नृत्य
जिला सिरमौर का लगभग 500 वर्ष पुराना आदिकालीन नृत्य है। सिंहटू नृत्य देव परंपरा से जुड़ा एक प्राचीन नृत्य है, जिसमें कलाकार लकड़ी, लकड़ी के बुरादे व मशीठी के पारंपरिक तरीके से बनाए गए मुखौटे पहनकर नृत्य करते हैं। सिंहटू सिरमौरी बोली में शेर के बच्चे को कहा जाता है। यह दुर्लभ परंपरा मंदिर स्थलियों से आदिकाल से जुड़ी हुई है। पुराने समय में यह परंपरा सिरमौर जिला के अनेकों मंदिरों में थी। मगर समय के साथ-साथ युवाओं की रुचि की कमी के कारण यह लुप्त होती चली गई। आज भी सिरमौर जनपद के मटलोड़ी कुप्फर और लेउ नाना गांव में देवता के मंदिर के प्रांगण में 'सिंहटू नृत्य' दीपावली और एकादशी के दिन वर्ष भर में केवल एक बार ही किया जाता है।

"भड़ाल्टू नृत्य"
"भड़ाल्टू” यह नृत्य विधा उस समय की है जब सिरमौर एक रियासत थी और इसका विस्तार उत्तरांचल के कालसी तक फैला था। यह क्षेत्र अतीत में कबायली क्षेत्र था। यहां भेड़-बकरी पालना एक व्यवसाय था। ये गडरिये गर्मियों में ऊंची चोटियों पर जाते थे और गुफाओं में रहते थे। गर्मियों के महीने यहीं जंगलों में बिताते थे तथा सर्दियों में भेड़-बकरियों को गर्म इलाकों में ले जाते थे। ये घुमन्तू लोग अशोज व भादों की सक्रांति की रात को जंगल में एक समारोह करते थे जिसे भड़ाल्टी संगरांद कहा जाता था। ये गडरीये (बढ़ाले) इस रात को जंगल में लकड़ियों का एक बड़ा ढेर लगाकर जलाते थे और शिरगुल देवता को भोग लगाते थे। भेड़-बकरियों की खालों से बनी पोशाक पहनकर, हुड़क की थाप पर नृत्य करते थे। भेड़-बकरी पालकों द्वारा किए जाने वाले इस नृत्य को "भड़ाल्टू" नृत्य कहते हैं। भेड़ बकरी पालक इस समारोह के बाद प्रातः गर्म इलाकों की ओर जाना प्रारंभ करते थे।
डगेली नाच
डगेली नाच एक प्रकार का स्वांग नृत्य है। डगेली नाच का संबंध कृष्ण जन्म से माना गया है। डगेली का संबंध कृष्ण जन्म अष्टमी की आस्था से जुड़ा है। डगेली नृत्य को कृष्ण की बाल लीला की कड़ी माना जाता है। कृष्ण जन्म अष्टमी के सात दिन बाद पंचांग के अनुसार त्रयोदश और चतुर्दश तिथि को कृष्ण पक्ष की डगेली नाच का पर्व आता है। डगेली नाच स्वांग में कलाकार डगेली के भिन्न-भिन्न प्रकार के भयंकर मुखौटे पहन कर अजीबोगरीब वेशभूषा में नृत्य करके जहां आम जनमानस में डगेली की रात के डर को समाप्त करने का प्रयास करते हैं।

सिरमौर के ख्याति प्राप्त लोक कलाकार
- विद्यानंद सरैक : संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार, पद्मश्री पुरस्कार, हिमाचल गौरव
- पं. डॉ. कृष्ण लाल सहगल: संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार, हिमाचल गौरव
- डॉ. जोगेन्द्र सिंह हाब्बी: संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार, इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्डस, एशिया बुक ऑफ रिकॉर्डस, वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्डस
- गोपाल सिंह हाब्बी: संगीत नाटक अकादेमी द्वारा 'उस्ताद बिस्मिल्लाह खां युवा पुरस्कार।
यह भी पढ़ें: कुल्लवी नाटी: अकेले नहीं एक लय में थिरकता है पूरा समाज, गांव से विश्व पटल तक कैसे बनाई हिमाचल के नृत्य ने पहचान?
