विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Nov 19, 2012 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

सुहाग चिन्ह

By Edited By:
Published: Mon, 19 Nov 2012 12:27 PM (IST)

हर राज्य की अपनी परंपराएं और रीति-रिवाज होते हैं। यही बात आभूषणों पर भी लागू होती है। हर राज्य के ...और पढ़ें

News Article Hero Image

हर राज्य की अपनी परंपराएं और रीति-रिवाज होते हैं। यही बात आभूषणों पर भी लागू होती है। हर राज्य के कुछ खास पारंपरिक गहने हैं जो विवाहित स्त्री की पहचान होते हैं। पंजाब, बिहार, बंगाल, महाराष्ट्र, कश्मीर और उत्तराखंड में कौन से आभूषण हैं सुहाग के प्रतीक, जानें यहा

चूड़ा चढ़ाना

पंजाबी शादी की जरूरी रस्म

पंजाबी शादी की अनिवार्य रस्म है चूड़ा चढ़ाना। दुल्हन के मामा की इसमें अहम् भूमिका होती है। शादी के दिन दुल्हन के माता-पिता व मामा व्रत रखते हैं। पुरोहित द्वारा हवन कराया जाता है। पूजा के बाद वहां उपस्थित सभी लोग चूड़े पर अपना-अपना हाथ लगाते हैं। इसके बाद दुल्हन को चूड़ा पहनाया जाता है। सभी बड़े-बुजुर्ग उसे आशीर्वाद देते हैं। दुल्हन को लोहे का एक कड़ा भी पहनाया जाता है। इस रस्म के बाद दुल्हन पर फूल बरसाए जाते हैं और प्रसाद बांटा जाता है। चूड़े के साथ ही दुल्हन को कलीरे भी पहनाए जाते हैं, जो कोकोनट व शेल्स से बनते हैं। शादी के बाद कम से कम सवा महीने तक चूड़ा पहनना अनिवार्य है। अब दिल्ली समेत लगभग पूरे उत्तर भारत में नवविवाहित लड़कियां चूड़ा पहनने लगी हैं।

मंगलसूत्र

महाराष्ट्रियन दुल्हन का प्रमुख गहना

मंगलसूत्र प्रमुख सुहाग चिह्न है मराठी वधू का। महाराष्ट्रियन विवाह में सबसे महत्वपूर्ण संस्कार होता है 'शुभ मंगल सावधान', जिसमें लगभग 43 रस्में होती हैं। इसी में कुछ रोचक दस्तूर भी निभाए जाते हैं। वर मंत्रोच्चार के बीच वधू के गले में मंगलसूत्र पहनाता है। सप्तपदी या फेरों के बाद वर-वधू को आमने-सामने खड़ा किया जाता है और दोनों अपने सिर से एक-दूसरे का सिर छूते हैं। इसका अर्थ है कि दोनों एक-दूसरे की तरह सोचेंगे और गृहस्थ जीवन का हर निर्णय मिलकर लेंगे। महाराष्ट्र के अलावा दक्षिण भारतीय शादी में भी मंगलसूत्र दुल्हन के लिए चरूरी सुहाग चिन्ह है। यहा मंगलसूत्र में मा लक्ष्मी का गोल्ड पेंडेंट लगा होता है।

अठ् और डेजहोर

कश्मीरी वधू का सुहाग चिन्ह

कश्मीरी सुहागिन स्त्री का महत्वपूर्ण आभूषण है अठ् और डेजहोर, जिसे आम भाषा में अठेरु भी कहते हैं। अठ् सोने की लंबी चेन होती है और डेजहोर चेन के अंतिम सिरे पर बना गोल्ड पेंडेंट। इस चेन को कान के भीतरी हिस्से में पियर्सिंग करके पहना जाता है, जिसमें नीचे की तरफ गोल्ड पेंडेंट लटकता है। कश्मीरी पंडितों में इसकी महत्ता मंगलसूत्र की तरह है। पाणिग्रहण या सप्तपदी से पहले होने वाले देवगुन संस्कार के समय अठेरु पहनाया जाता है। यह आभूषण हमेशा सोने का ही बनाया जाता है और इसे सोने का ही होना भी चाहिए, क्योंकि स्वर्ण को धातुओं में सबसे शुद्ध माना जाता है।

नथ

उत्तराखंड में है

स्टेटस सिंबल

उत्तराखंड की शादियों में नथ एक स्टेटस सिंबल है। ससुराल पक्ष से लड़की को जितनी बड़ी सोने की नथ मिलती है, ससुराल का रुतबा उतना ही ज्यादा होता है। साहित्यकार स्व. विद्यासागर नौटियाल की एक मार्मिक कहानी 'मूक बलिदान' पर 'नथ' नामक हिंदी टेलीफिल्म भी बनी थी। नथ के बाद गुलुबंद या चरेऊ भी सुहागिन स्त्रियों की पहचान है। चरेऊ काली मोतियों में गुंथी लंबी माला होती है। मोतियों के बीच सोने के छोटे-छोटे पैटर्न बने होते हैं और इसमें गोल्ड पेंडेंट होता है। इसे अविवाहित लड़किया नहीं पहन सकतीं। गुलुबंद गले से सटाकर पहना जाने वाला नेकलेस है। उत्तराखंड में हर विवाहित स्त्री के लिए चरेउ-मंगलसूत्र या गुलुबंद हमेशा पहने रहना अनिवार्य है।

(जैसा रुद्रपुर से कनिका रावत ने बताया)

बिछिया

सुहाग-निशानी बिहार और यूपी में

बिहार में वधू के सुहाग की प्रतीक है बिछिया, जिसे उसके मायके से दिया जाता है। इसे अविवाहित लड़किया नहीं पहन सकतीं। शादी के मंडप में सिंदूरदान और फेरों के बाद लड़की की भाभी उसे बिछिया पहनाती है। पैर की चारों अंगुलियों सहित अंगूठे में भी चादी के रिंग्स पहनाए जाते हैं। अंगूठे में पहनाए जाने वाले रिंग को अनवट कहा जाता है। ये सभी गहने (बिछिया और अनवट) लड़की के ननिहाल से आते हैं। अनवट को विवाह के कुछ दिन बाद उतारा जा सकता है। धार्मिक आयोजनों में इसे पहना जाता है, लेकिन दो अंगुलियों में बिछिया पहनना हर सुहागिन के लिए चरूरी है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी यह चरूरी है।

(जैसा पटना से किरण सिन्हा ने बताया)

शाखा-पोला

बंगाली वधू के लिए अनिवार्य

बंगाली शादी में एक अनिवार्य आभूषण है शाखा-पोला। शादी वाले दिन सुबह के वक्त 'दोधी मंगल' की यह रस्म निभाई जाती है। इसमें शख से बनी चूड़ियों को हल्दी के पानी में डुबोया जाता है। सात सुहागिनें दुल्हन को शाखा-पोला पहनाती हैं। इन्हें ईश्वर के सात रूपों का प्रतीक समझा जाता है। पहले यह प्रथा गरीब मछुआरों में प्रचलित थी, जो महंगे आभूषण नहीं खरीद पाते थे। पोला को शाखा व लोहे की चूड़ी (लोहा बंधानो) के बीच पहनाया जाता है। माना जाता है कि लोहे की चूड़ी सकारात्मक व नकारात्मक शक्तियों के बीच संतुलन बनाए रखती है।

(जैसा कोलकाता से

सरबनी बिस्वास ने बताया)

मोबाइल पर ताजा खबरें, फोटो, वीडियो व लाइव स्कोर देखने के लिए जाएं m.jagran.com पर

देश और दुनिया की ताजा खबरों के लिए Hindi News देखें। Live Cricket Score , IPO Listings, Shiv Chalisa, राशिफल और दुर्गा चालीसा पर अन्य जानकारी पाएं।