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कश्मीर के सेब, केसर और जम्मू के आम पर मंडराया बड़ा संकट, प्रभावित हो रही 7 लाख परिवारों की आजीविका

By नवीन नवाजEdited By: Hema Devi
Published: Sat, 19 Sep 2026 09:55 AM (IST)

जम्मू-कश्मीर में जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान से सेब व आम की पैदावार पर गंभीर संकट मंडरा रहा है। जम्मू ...और पढ़ें

कश्मीर में सेब और जम्मू में आम के उत्पादन में भारी गिरावट का अनुमान।

 कश्मीर में सेब और जम्मू में आम के उत्पादन में भारी गिरावट का अनुमान।

HighLights

  1. तापमान बढ़ने से कश्मीर में सेब उत्पादन घटा

  2. बारामुला में सेब की पैदावार में 19.16% तक कमी

  3. जम्मू में आम की आवक में 70% से अधिक गिरावट

नवीन नवाज , जम्मू। जम्मू-कश्मीर की बागवानी पर बदलता मौसम अब केवल भविष्य की आशंका नहीं, बल्कि उत्पादन और बाजार दोनों में दिखाई देने लगा है। कश्मीर में बढ़ती गर्मी से सेब की उत्पादकता पर दबाव बढ़ रहा है तो जम्मू संभाग में गर्मी की लहर और ओलावृष्टि ने आम की स्थानीय फसल को प्रभावित किया है।

इंटरनेशनल जर्नल आफ क्रिएटिव एण्ड ओपन रिसर्च इन इंजीनियरिंग एण्ड मैनेजमेंट में प्रकाशित एक नए अध्ययन के अनुसार गर्मियों के तापमान में प्रत्येक एक डिग्री सेल्सियस वृद्धि से कश्मीर में सेब उत्पादन औसतन 6.10 प्रतिशत तक घट सकता है।

बारामुला में संभावित गिरावट 19.16 प्रतिशत तक बताई गई है। वहीं अध्ययन के मुताबिक 2026 में शुरुआती हीटवेव और ओलावृष्टि के बाद जम्मू के स्थानीय बाजारों में आम की आवक 70 प्रतिशत से अधिक घटी

अध्ययन में 2025 और 2026 के दौरान कश्मीर के कई हिस्सों में बार-बार हुई ओलावृष्टि से सेब की फसल को 50 से 90 प्रतिशत तक नुकसान होने और करीब 6,000 से 7,000 करोड़ रुपये के आर्थिक नुकसान का अनुमान दिया गया है।

ये आंकड़े अध्ययन में किए गए आकलन हैं, जिन्हें आधिकारिक अंतिम क्षति आकलन से अलग समझना जरूरी है। सरकारी रिजनल डाइजेस्ट आफ स्टैटस्टिक्स 2024-25 के अनुसार वर्ष 2023-24 में 34.26 हजार मीट्रिक टन और वर्ष 2024-25 में 30.39 हजार मीट्रिक टन सेब उत्पादन हुआ है। लगभग 11.30 प्रतिशत की कमी है।

जम्मू का आम: उत्पादन है, लेकिन मांग का बड़ा हिस्सा बाहर की सप्लाई से

जम्मू-कश्मीर में आम की खेती का आधार जम्मू संभाग है। सरकारी रिजनल डाइजेस्ट आफ स्टैटस्टिक्स 2024-25 के अनुसार पूरे केंद्रशासित प्रदेश में 2024-25 में आम का उत्पादन 31.36 हजार मीट्रिक टन रहा।

इसमें अकेले जम्मू जिले का हिस्सा 14.02 हजार मीट्रिक टन, यानी लगभग 45 प्रतिशत था। इसके बाद कठुआ में 5.90 हजार टन, ऊधमपुर में 3.94 हजार टन, राजौरी में 3.53 हजार टन और सांबा में 2.91 हजार टन उत्पादन दर्ज हुआ।

2023-24 में भी जम्मू-कश्मीर का आम उत्पादन करीब 30.81 हजार मीट्रिक टन था। उस वर्ष आम का क्षेत्रफल 14.24 हजार हेक्टेयर दर्ज किया गया। यानी आम जम्मू की महत्वपूर्ण उपोष्णकटिबंधीय फसल है, लेकिन पूरे देश के पैमाने पर जम्मू-कश्मीर अभी बड़ा आम उत्पादक नहीं है।

नीति आयोग के हालिया बागवानी रोडमैप के अनुसार 2023-24 में जम्मू-कश्मीर का आम उत्पादन 30.81 हजार टन था, जबकि उत्तर प्रदेश में यह करीब 5,900.53 हजार टन और आंध्र प्रदेश में करीब 4,985.28 हजार टन था। जम्मू-कश्मीर की औसत उत्पादकता भी करीब 2.16 टन प्रति हेक्टेयर थी, जो प्रमुख उत्पादक राज्यों की तुलना में काफी कम है।

यही अंतर जम्मू के आम बाजार की एक अहम तस्वीर सामने लाता है। स्थानीय बागों से आने वाला आम पूरे सीजन की मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त नहीं है। कृषि विपणन से जुड़े उपलब्ध रिकॉर्ड बताते हैं कि जम्मू की नारवाल मंडी में देश के अलग-अलग आम उत्पादक क्षेत्रों की किस्मों की बिक्री होती है। 2026 के मंडी रिकॉर्ड में दशहरी, चौसा, लंगड़ा, सफेदा और तोतापुरी जैसी किस्मों की आवक दर्ज है।

आम की स्थानीय कमी का सीधा असर बाजार पर

2026 में स्थानीय आवक में 70 प्रतिशत से अधिक की गिरावट का असर केवल बागवानों तक सीमित नहीं रहने वाला। स्थानीय आपूर्ति घटने पर जम्मू के थोक और खुदरा बाजार को बाहर के राज्यों से आने वाले आम पर अधिक निर्भर होना पड़ता है।

इससे परिवहन, कमीशन, भंडारण और हैंडलिंग लागत जुड़ती है और उपभोक्ता कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है।

नरवाल मंडी में 2026 के दौरान आम की विभिन्न किस्मों के भाव में भी काफी अंतर देखा गया। जुलाई में दशहरी, लंगड़ा, सफेदा, तोतापुरी और चौसा की अलग-अलग दरें दर्ज हुईं, जबकि अगस्त के अंत में चौसा के भाव 20,000-22,000 रुपये प्रति क्विंटल तक दर्ज किए गए।

नीति आयोग के बागवानी रोडमैप के आंकड़ों के अनुसार 2023-24 में जम्मू-कश्मीर का उत्पादन करीब 30.81 हजार टन रहा।

34 साल में केसर उत्पादन में बड़ी गिरावट

बदलते मौसम का असर कश्मीर के केसर पर भी पड़ा है। अध्ययन के अनुसार 1990 में 15.9 मीट्रिक टन रहा केसर उत्पादन 2024-25 में घटकर 2.6 मीट्रिक टन रह गया।

अध्ययन ने इस अवधि में करीब 68 प्रतिशत की गिरावट का उल्लेख किया है। कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक केसर में उत्पादन घटने के पीछे केवल तापमान को एकमात्र कारण मानना उचित नहीं होगा। खेती का क्षेत्र, भूमि उपयोग में बदलाव, सिंचाई, वर्षा और अन्य स्थानीय कारक भी भूमिका निभाते हैं।

अध्ययन ने तापमान वृद्धि, अत्यधिक गर्मी, सूखा, ओलावृष्टि और मौसम की अनिश्चितता को व्यापक जोखिमों के रूप में रेखांकित किया है।

बागवानों के लिए बढ़ रहा दोहरा जोखिम

जम्मू-कश्मीर के बागवान अब एक ऐसे मौसम का सामना कर रहे हैं जिसमें उत्पादन चक्र के अलग-अलग चरणों में अलग-अलग खतरे सामने आ रहे हैं। फूल आने के समय असामान्य तापमान, फल बनने के दौरान गर्मी, पकने के समय हीटवेव और उसके बाद अचानक ओलावृष्टि—इनका संयुक्त प्रभाव उपज और गुणवत्ता दोनों पर पड़ सकता है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार जम्मू-कश्मीर की करीब सात लाख परिवारों की आजीविका प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बागवानी से जुड़ी है। ऐसे में मौसम का जोखिम केवल खेत तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मंडी, परिवहन, मजदूरी, प्रसंस्करण और ग्रामीण आय पर भी असर डालता है।

बीमा और मौसम चेतावनी को बनाना होगा अधिक प्रभावी

अध्ययन में मौजूदा फसल बीमा व्यवस्था को जलवायु संबंधी नुकसान की पूरी भरपाई के लिए अपर्याप्त बताते हुए मजबूत वित्तीय सुरक्षा की जरूरत बताई गई है।

शोधकर्ताओं ने गर्मी सहन करने वाली किस्मों, बेहतर सिंचाई, मौसम निगरानी, शुरुआती चेतावनी प्रणाली और जलवायु-अनुकूल कृषि तकनीकों में निवेश बढ़ाने की सिफारिश की है।

जम्मू के आम के मामले में इसके साथ एक और रणनीति जरूरी दिखाई देती है—स्थानीय उत्पादन को बढ़ाने के साथ-साथ उत्पादकता और पोस्ट-हार्वेस्ट प्रबंधन में सुधार।

नीति आयोग ने भी जम्मू-कश्मीर में आम और बेर को बड़े पैमाने के बजाय स्थानीय/विशिष्ट विविधीकरण वाली फसलों के रूप में देखने और उत्पादकता सुधार पर ध्यान देने की बात कही है।

बदलते मौसम के बीच जम्मू का आम और कश्मीर का सेब एक ही संकट की दो अलग तस्वीरें पेश कर रहे हैं। एक तरफ उत्पादन क्षेत्र में मौसम का दबाव बढ़ रहा है, दूसरी तरफ बाजार को स्थिर रखने के लिए बाहरी आपूर्ति की जरूरत बढ़ सकती है।

आने वाले वर्षों में बागवानी नीति के सामने चुनौती केवल ज्यादा उत्पादन की नहीं, बल्कि कम पानी, अधिक गर्मी और अनिश्चित मौसम में स्थिर उत्पादन और बाजार उपलब्ध कराने की होगी