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जम्मू-कश्मीर की नदियों में घुल रहा 'जहर'! उज्ज के हर नमूने में माइक्रो-प्लास्टिक, चिनाब की मछलियों में भी कण मिले

Published: Fri, 04 Sep 2026 07:15 AM (IST)

केंद्रीय विश्वविद्यालय जम्मू के शोधकर्ताओं ने उज्ज-चिनाब नदियों में व्यापक माइक्रो-प्लास्टिक प्रदूषण का खुलासा किया है। यह प्रदूषण पानी, तलछट ...और पढ़ें

चिनाब की मछलियों के अंगों तक पहुंचा ‘जहर’, शोध में खुलासा । (फाइल फोटो)

चिनाब की मछलियों के अंगों तक पहुंचा ‘जहर’, शोध में खुलासा । (फाइल फोटो)

राज्य ब्यूरो, जम्मू। केंद्रीय विश्वविद्यालय जम्मू के पर्यावरण विज्ञान विभाग के शोधकर्ताओं ने जम्मू-कश्मीर की और उज्ज व चिनाब नदियों में व्यापक स्तर पर माइक्रो-प्लास्टिक प्रदूषण का पता लगाया है। शोध में नदी के पानी, तलछट और मछलियों के ऊतकों में प्लास्टिक के सूक्ष्म कण पाए गए हैं, जिससे क्षेत्र के मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र पर बढ़ते प्लास्टिक प्रदूषण को लेकर चिंता पैदा हो गई है।

उज्ज नदी पर अध्ययन केंद्रीय विश्वविद्यालय जम्मू के पर्यावरण विज्ञान विभाग की पीजी छात्राओं अंशिका शर्मा और प्रीति कुमारी ने प्रोफेसर दीपक पठानिया और प्रोफेसर ऋचा कोठारी के मार्गदर्शन में किया। अध्ययन के दौरान उज्ज नदी के पानी, नदी तल की तलछट और मछलियों के ऊतकों में माइक्रो-प्लास्टिक की मौजूदगी दर्ज की गई।

उज्ज नदी के हर नमूने में मिला माइक्रो-प्लास्टिक

शोधकर्ताओं ने उज्ज नदी के 10 स्थानों से पानी के नमूने एकत्र किए, जबकि चार स्थानों से तलछट और मछली के नमूनों का विश्लेषण किया गया। जांच किए गए प्रत्येक नमूने में माइक्रो-प्लास्टिक के कण पाए गए। अध्ययन में पानी के नमूनों से कुल 280 माइक्रो-प्लास्टिक कण बरामद हुए, जिनकी संख्या विभिन्न स्थानों पर 13 से 45 कण प्रति स्थल तक रही। वहीं, तलछट के नमूनों में 75 कण पाए गए।

इस प्रकार पानी और तलछट से कुल 355 माइक्रो-प्लास्टिक कणों की पहचान की गई, जिनमें 78.9 प्रतिशत पानी और 21.1 प्रतिशत तलछट से मिले।

पानी से जलीय जीवों तक पहुंचा माइक्रो-प्लास्टिक

शोध में रोहू मछली (लाबेओ रोहिता) के यकृत, गलफड़ों और आंतों में भी माइक्रो-प्लास्टिक की मौजूदगी पाई गई। इससे संकेत मिलता है कि प्लास्टिक प्रदूषण केवल जलीय पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जलजीवों के शरीर में भी प्रवेश कर रहा है।

हालांकि उज्ज नदी में घुलित ऑक्सीजन, पीएच, कठोरता, क्षारीयता और सल्फेट जैसे कई प्रमुख जल गुणवत्ता मानक सभी नमूना स्थलों पर निर्धारित राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर पाए गए, लेकिन माइक्रो-प्लास्टिक का वितरण नदी में समान नहीं था। सांख्यिकीय विश्लेषण में विभिन्न स्थानों के बीच उल्लेखनीय अंतर सामने आया।

कृषि क्षेत्रों से नदी तक पहुंच रहा प्लास्टिक

शोधकर्ताओं ने इसके संभावित कारणों में कृषि क्षेत्रों से बहाव, कचरे का अवैज्ञानिक ढंग से निस्तारण और नदी किनारे बस्तियों को प्रमुख कारक बताया। सबसे अधिक प्रदूषित स्थल में माइक्रो-प्लास्टिक की मात्रा सबसे कम प्रदूषित स्थल की तुलना में करीब 3.5 गुना अधिक पाई गई।

अधिकांश कण 0.5 मिलीमीटर से छोटे काले माइक्रो-फाइबर थे, जबकि लाल और पारदर्शी कण भी पाए गए। प्रयोगशाला विश्लेषण में पॉलीइथाइलीन, पॉलीप्रोपाइलीन और नायलॉन जैसे पॉलिमर की पहचान की गई, जो आमतौर पर पैकेजिंग सामग्री, सिंथेटिक वस्त्रों और मछली पकड़ने से संबंधित सामग्रियों में उपयोग होते हैं।

चिनाब नदी की मछलियों के शरीर में मिला माइक्रो-प्लास्टिक

किश्तवाड़ स्थित चिनाब नदी पर किए गए अलग अध्ययन में भी मछलियों के विभिन्न अंगों में माइक्रो-प्लास्टिक कण पाए गए। इस अध्ययन में कुल 20 माइक्रो-प्लास्टिक कणों का पता चला, जिनमें 10 कण यानी 50 प्रतिशत जठरांत्र मार्ग में, छह कण यानी 30 प्रतिशत गलफड़ों में और चार कण यानी 20 प्रतिशत यकृत में पाए गए।

शोध के अनुसार लगभग 95 से 99 प्रतिशत कण फाइबर के रूप में थे, जिनमें नीले, काले और पारदर्शी फाइबर प्रमुख रहे। यहां भी पॉलीइथाइलीन और पॉलीप्रोपाइलीन प्रमुख प्रकार के प्लास्टिक पॉलिमर के रूप में पहचाने गए। शोधकर्ताओं ने चिनाब नदी में इस प्रदूषण के संभावित स्रोतों में बिना उपचारित सीवेज, नगर निगम का कचरा, सतही बहाव और अपशिष्ट जल को शामिल किया।

चिनाब नदी का जल गुणवत्ता सूचकांक (डब्ल्यूक्यूआई) खराब श्रेणी में पाया गया, जबकि मछलियों के विभिन्न अंगों में प्रदूषण भार सूचकांक में भी अंतर दर्ज किया गया।

ज्यादा जीवों पर असर की आशंका

शोधकर्ताओं के अनुसार मछलियों के ऊतकों में माइक्रो-प्लास्टिक की मौजूदगी विशेष रूप से महत्वपूर्ण और चिंताजनक है, क्योंकि जलीय जीव प्लास्टिक के इन सूक्ष्म कणों को खाद्य श्रृंखला और खाद्य जाल के माध्यम से आगे पहुंचाने का माध्यम बन सकते हैं। निचले पोषण स्तर से ऊंचे पोषण स्तर तक माइक्रो-प्लास्टिक के पहुंचने से अधिक जीवों के प्रभावित होने की आशंका बढ़ सकती है।

शोधकर्ताओं ने सुझाए कई उपाय

केंद्रीय विश्वविद्यालय जम्मू के वीसी प्रोफेसर संजीव जैन ने पर्यावरणीय शोध में निरंतर योगदान के लिए प्रोफेसर दीपक पठानिया और प्रोफेसर ऋचा कोठारी की सराहना की। उन्होंने कहा कि ताजे पानी की नदियों और मछलियों के ऊतकों में माइक्रो-प्लास्टिक का पाया जाना एक गंभीर पर्यावरणीय चिंता है, क्योंकि इससे जलीय जीवों और अंततः खाद्य श्रृंखला के माध्यम से प्लास्टिक कणों के प्रसार की संभावना का संकेत मिलता है।

शोधकर्ताओं प्रो. पठानिया व कोठारी व उनकी टीम ने इस उभरते खतरे से निपटने के लिए अपशिष्ट जल उपचार व्यवस्था में सुधार, प्लास्टिक कचरे का प्रभावी प्रबंधन, नदियों में कचरा फेंकने पर रोक, नियमित निगरानी और आम लोगों में व्यापक जागरूकता की आवश्यकता पर जोर दिया।

उनका कहना है कि जम्मू-कश्मीर के मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र को माइक्रो-प्लास्टिक प्रदूषण से बचाने के लिए तत्काल और ठोस कदम उठाने की जरूरत है।