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    रियासी का 'काशी शिव मंदिर', वाराणसी नहीं जा पाए तो यहां आएं, मिलेगा उतना ही पुण्य! जनरल जोरावर सिंह से जुड़ा इतिहास

    Updated: Thu, 06 Aug 2026 07:00 AM (GMT+05:30)

    Sawan Month Special: रियासी का काशी शिव मंदिर वाराणसी के काशी के समान धार्मिक महत्व रखता है, जहां श्रद्धालु चिनाब में स्नान कर पुण्य कमाते हैं। ...और पढ़ें

    रियासी का काशी शिव मंदिर पांच विशिष्ट चीजों का संगम है।

    रियासी का काशी शिव मंदिर पांच विशिष्ट चीजों का संगम है।

    HighLights

    1. रियासी का काशी शिव मंदिर वाराणसी के समान धार्मिक महत्व रखता है।

    2. जनरल जोरावर सिंह ने स्वप्न में आदेश पाकर मंदिर का निर्माण कराया।

    3. मंदिर में शिव मंदिर, बरगद, पीपल, श्मशान, चिनाब नदी का संगम है।

    राजेश डोगरा, रियासी. जिला मुख्यालय से लगभग दस किलोमीटर दूर स्थित काशी शिव मंदिर का धार्मिक महत्व उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित काशी के समान माना जाता है। मान्यता है कि जो श्रद्धालु वाराणसी नहीं जा पाते, वे वैसा ही पुण्य प्राप्त करने की कामना से रियासी स्थित काशी शिव मंदिर में माथा टेकने और समीप बहने वाली पवित्र चिनाब नदी में स्नान करने आते हैं।

    काशी शिव मंदिर का इतिहास

    मान्यता के अनुसार प्राचीन समय में वाराणसी से एक महात्मा इस स्थान पर आकर रहने लगे थे। वे यहां भगवान शिव की आराधना करते थे। उनके देह त्याग के समय इस स्थान को गुप्तकाशी बताया गया। एक बार जनरल जोरावर सिंह ने यहां पड़ाव डाला। मान्यता है कि भगवान शिव ने उन्हें स्वप्न में इस स्थान पर शिव मंदिर बनाने का आदेश दिया, जिसके बाद जनरल जोरावर सिंह ने यहां शिव मंदिर का निर्माण करवाया।

    श्मशान, चिनाब समेत 5 चीजों का संगम

    मंदिर के पुजारी बताते हैं कि इस स्थान की सबसे बड़ी विशेषता यहां पांच चीजों का एक साथ होना है। इनमें शिव मंदिर, बरगद और पीपल के पेड़, श्मशान घाट तथा पवित्र चिनाब नदी शामिल हैं।

    मान्यता है कि भारत में ये पांचों चीजें एक साथ अन्य किसी स्थान पर देखने को नहीं मिलतीं। यहां का शिवलिंग भी सदियों पुराना माना जाता है, जिसमें प्राकृतिक रूप से भगवान शिव, ध्वज और मंदिर के द्वार जैसी आकृतियां दिखाई देती हैं।

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    कई लोग अपने प्रियजनों की अस्थियां भी इसी स्थान पर चिनाब नदी में प्रवाहित करने आते हैं। इसके अलावा जिन लोगों के मवेशी बंधी अवस्था में मर जाते हैं, वे भी प्रायश्चित स्वरूप यहां माथा टेकने आते हैं।