टाइगर हिल पर बलिदान हुए थे उधमपुर के अब्दुल करीम, अब 7 साल के पोते में जागा जज्बा; बोला- बड़ा होकर सेना में जाऊंगा
कारगिल शहीद अब्दुल करीम के बलिदान की कहानी उनके बच्चे अपनी मां से सुनते थे। उनके बेटे रफीक परिवार की जिम्मेदारी के कारण सेना में नहीं जा सके। ...और पढ़ें

शहादत के 7 दिन पहले मामा से कहा था बच्चों का ख्याल रखना, फिर तिरंगे में लिपटे आए पिता।
HighLights
कारगिल शहीद अब्दुल करीम ने टाइगर हिल पर बलिदान दिया
बेटे रफीक परिवार की जिम्मेदारी के कारण सेना में न जा सके
पोता नोमान दादा की तरह भारतीय सेना में शामिल होने को प्रेरित
अजय मीनिया, कठुआ। कारगिल युद्ध में शहीद होने वाले अब्दुल करीम की शहादत की कहानियां अब उनके बच्चे अपनी मां से सुनते हैं। अब्दुल करीम के बड़े बेटे अब्दुल रफीक को इस बात का मलाल है कि वह पिता की तरह सेना में नहीं जा सका।
पिता के निधन के बाद परिवार का सबसे बड़ा सदस्य होने के नाते, रफीक को परिवार की देखभाल करने का जिम्मा उठाना पड़ा। फिर भी, वह अपने बेटे को सेना में भेजने की इच्छा रखता है। यह जज्बा रफीक के 7 साल के बेटे नोमान में भी दिखाई देता है, जो कहता है कि वह अपने दादा की तरह भारतीय सेना में जाना चाहता है।
अब्दुल करीम, जो मूल रूप से उधमपुर के निवासी थे, 1 जुलाई 1999 को टाइगर हिल को फतेह करते हुए देश के लिए बलिदान हो गए थे। उस समय उनके चार बच्चे थे। करीब चार साल पहले करीम की पत्नी का निधन हो चुका है। रफीक ने बताया कि जब उनके पिता बलिदान हुए थे, तब वह 7वीं कक्षा में पढ़ाई कर रहे थे।
उन्हें शहादत के तीन दिन बाद इस घटना की जानकारी मिली, जब स्कूल जाने से मना कर दिया गया। जब घर पर तिरंगे में लिपटा पिता का शव आया, तब उन्हें पता चला कि उनके पिता देश के लिए शहीद हो चुके हैं। उस समय वे कठुआ में अपनी नानी के घर रह रहे थे।
खबरें और भी
रफीक ने बताया कि शहादत के ठीक 7 दिन पहले उनके पिता ने मामा से बात की थी। उन्होंने अपने बच्चों का ख्याल रखने की बात कही थी, शायद उन्हें यह आभास हो गया था कि वे देश के लिए कुर्बान होने जा रहे हैं।
पिता के जाने के बाद रफीक सेना में जाना चाहते थे, लेकिन परिवार की जिम्मेदारियों ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। आज इतने सालों बाद भी उनके पिता की कमी महसूस होती है, और यह कमी पहले से भी अधिक गहरी है, क्योंकि अब मां भी नहीं हैं। पहले मां ढांढस बंधाती थीं।
रफीक ने बताया कि पिता के जाने के बाद उस समय की सरकार ने उन्हें सभी आवश्यक सहायता प्रदान की। उनके पिता के कई दोस्त हैं, जो उनके साथ सेना में थे और आज भी उनसे मिलने आते हैं। लेकिन सबसे बड़ी कमी यही है कि उनके पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं।
रफीक के बेटे नोमान का कहना है कि वह भी अपने दादा की तरह भारतीय सेना में जाना चाहता है। जब भी वह अपने दादा की तस्वीर वर्दी में देखता है, तो उसे सेना में जाने की प्रेरणा मिलती है। स्कूल में आज भी दादा के बारे जब जिक्र होता है। या फिर जब कभी सेना की तरफ से सम्मानित करने के लिए बुलाते हैं तो वहां जाकर उनकी शहादत पर गर्व महसूस होता है।