कठुआ में बनी की ऊंचाइयों पर गूंजी चरवाहों की आहट, गर्मियों की दस्तक के साथ शुरू हुआ जनजातीय परिवारों का मौसमी पलायन
गर्मी का मौसम शुरू होते ही कठुआ के बनी क्षेत्र में जनजातीय परिवारों का मौसमी पलायन शुरू हो गया है। ये परिवार अपने भेड़-बकरियों के साथ निचले इलाकों से ...और पढ़ें
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बनी की ऊंची पहाड़ियों पर फिर लौटेगी रौनक (AI Generated फोटो)

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संवाद सहयोगी, बनी। गर्मी का मौसम शुरू होते ही बनी क्षेत्र की ऊंची पहाड़ियों की ओर एक बार फिर से चहल पहल बढ़ने लगी है। अनुसूचित जनजाति से जुड़े परिवार अपने पारंपरिक मौसमी पलायन (दर) के तहत निचले इलाकों से ऊंचाई वाले ठंडे और हरे-भरे क्षेत्रों की ओर रुख कर रहे हैं।
जैसे ही ये परिवार अपने मवेशियों के साथ पहाड़ियों पर पहुंचते हैं, पूरा वातावरण जीवंत हो उठता है। चारों ओर भेड़-बकरियों की आवाजें, चरवाहों की गतिविधियां और पहाड़ी रास्तों पर बढ़ती आवाजाही इस क्षेत्र में एक अलग ही रौनक पैदा कर देती है।
इन दिनों दिन-रात सड़क मार्गों पर दर्जनों की संख्या में ऐसे काफिले गुजरते देखे जा रहे हैं। प्रत्येक काफिले में सैकड़ों भेड़-बकरियां शामिल होती हैं, जिन्हें चराने के लिए चरवाहे अपने परिवारों के साथ पहाड़ियों की ओर बढ़ते हैं। आमतौर पर चार से पांच व्यक्तियों का एक समूह (डेरा) बनाकर ये लोग यात्रा करते हैं और ऊंचाई वाले अलग-अलग स्थानों पर अस्थायी डेरा डालते हैं।
शनिवार को भी करीब दस से अधिक ऐसे डेरे भेड़-बकरियों के साथ पहाड़ियों की ओर जाते हुए देखे गए। इस दौरान स्थानीय चरवाहों चौधरी अली मोहम्मद, रहमान चौधरी, अफजल चौधरी और निसार खान ने बताया कि यह उनका वर्षों पुराना परंपरागत जीवन चक्र है।
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गर्मियों के दौरान वे ठंडे इलाकों में चले जाते हैं, जहां मवेशियों के लिए पर्याप्त चारा और अनुकूल वातावरण मिलता है, जबकि सर्दियों के आगमन पर वे पुनः निचले क्षेत्रों में लौट आते हैं।
उन्होंने यह भी बताया कि सरकार की ओर से भेड़-बकरियों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए विभिन्न स्थानों पर पशु चिकित्सा सुविधाएं और दवाइयों की व्यवस्था की गई है, जिससे उन्हें काफी राहत मिलती है। इस मौसमी पलायन के साथ ही बनी की पहाड़ियां एक बार फिर जीवंत हो उठी हैं और आने वाले महीनों में यहां जनजातीय जीवन की पारंपरिक झलक साफ तौर पर देखने को मिलेगी।