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आतंकवाद पर चोट व गुलाम जम्मू-कश्मीर में विरोध... अमेरिकी राजदूत का पहला श्रीनगर दौरा, क्या हैं यात्रा के राजनीतिक मायने?

Updated: Wed, 19 Aug 2026 05:52 AM (IST)

अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर 19 अगस्त से जम्मू-कश्मीर के दो दिवसीय दौरे पर हैं, जो अनुच्छेद 370 निरस्तीकरण के बाद पहला आधिकारिक दौरा है।

अमेरिकी राजदूत का पहला श्रीनगर दौरा। फाइल फोटो

अमेरिकी राजदूत का पहला श्रीनगर दौरा। फाइल फोटो

HighLights

  1. अनुच्छेद 370 के बाद अमेरिकी राजदूत का पहला दौरा।

  2. उपराज्यपाल, मुख्यमंत्री से मुलाकात; व्यापक संवाद पर नजर।

  3. यात्रा से भारत-अमेरिका संबंधों में कश्मीर का नया महत्व।

नवीन नवाज, श्रीनगर। अमेरिका के भारत में राजदूत और दक्षिण एवं मध्य एशिया के लिए विशेष दूत सर्जियो गोर 19 अगस्त से जम्मू-कश्मीर के दो दिवसीय दौरे पर पहुंच रहे हैं। श्रीनगर में उनकी उपराज्यपाल मनोज सिन्हा और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से अलग-अलग मुलाकात प्रस्तावित है। अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण के बाद किसी अमेरिकी राजदूत का जम्मू-कश्मीर का यह पहला आधिकारिक दौरा है।

लेकिन इस यात्रा की अहमियत केवल इतनी नहीं है। गोर ऐसे समय कश्मीर पहुंच रहे हैं, जब घाटी में आतंकवाद निर्णायक रूप से कमजोर पड़ चुका है और पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में वहां की जनता पाकिस्तान की नीतियों के खिलाफ आवाज बुलंद कर रही है। ऐसे बदलते क्षेत्रीय परिदृश्य में यह दौरा महज एक नियमित राजनयिक कार्यक्रम नहीं रह जाता, बल्कि इसके व्यापक रणनीतिक और राजनीतिक संकेतों को समझना भी जरूरी हो जाता है।

इस यात्रा को समझने का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि अमेरिकी राजदूत श्रीनगर क्यों आ रहे हैं, बल्कि यह है कि आज का वाशिंगटन जम्मू-कश्मीर को किस नजरिए से देखता है। क्या कश्मीर अभी भी मुख्यतः भारत-पाकिस्तान विवाद और क्षेत्रीय तनाव का विषय है, या भारत के साथ तेजी से गहरे होते अमेरिकी रणनीतिक संबंधों के व्यापक फ्रेम में अब इसका महत्व तय किया जा रहा है?

यात्रा से अधिक महत्वपूर्ण होगा उसका संदेश

सर्जियो गोर ने जनवरी 2026 में भारत में अमेरिकी राजदूत का कार्यभार संभाला। शुरुआती दौर में उन्होंने भारत को अमेरिका का महत्वपूर्ण साझेदार बताते हुए सुरक्षा, व्यापार और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सहयोग को और मजबूत करने पर जोर दिया है।

यही पृष्ठभूमि उनकी श्रीनगर यात्रा को खास बनाती है। मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल से उनकी मुलाकात अपने आप में किसी संवैधानिक या अंतरराष्ट्रीय मान्यता का प्रश्न नहीं है, लेकिन यह जरूर संकेत देती है कि अमेरिकी कूटनीति जम्मू-कश्मीर में किन संस्थागत संपर्कों को प्राथमिकता दे रही है।

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इसलिए नजर केवल इस बात पर नहीं होगी कि गोर किससे मिलते हैं, बल्कि इस पर भी होगी कि उनकी मुलाकातों का दायरा कितना व्यापक रहता है। क्या उनका संपर्क प्रशासन और निर्वाचित सरकार तक सीमित रहेगा या राजनीतिक दलों, कारोबारियों, नागरिक समाज, शिक्षाविदों और अन्य प्रतिनिधियों से भी संवाद होगा? यात्रा के बाद अमेरिकी दूतावास की ओर से जारी होने वाला आधिकारिक बयान भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा।

1990 के दशक से कितना बदला अमेरिकी रुख?

कश्मीर को लेकर अमेरिकी कूटनीति का इतिहास एक जैसा नहीं रहा है। 1990 के दशक में अमेरिकी राजनयिकों का संपर्क कश्मीर की विभिन्न राजनीतिक धाराओं तक फैला हुआ था। सरकारी और मुख्यधारा के राजनीतिक नेतृत्व के साथ-साथ अलगाववादी नेताओं, शिक्षाविदों, छात्रों, पत्रकारों और कारोबारी प्रतिनिधियों से संवाद के उदाहरण भी सामने आते रहे।

समय के साथ आतंकवाद और क्षेत्रीय सुरक्षा अमेरिकी नीति के अधिक महत्वपूर्ण आयाम बनते गए। इसके साथ ही कश्मीर में अमेरिकी राजनयिकों की गतिविधियां भी अधिक संस्थागत और आधिकारिक स्वरूप लेती गईं।

2019 के संवैधानिक बदलावों के बाद जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था में बड़ा परिवर्तन आया। अब सर्जियो गोर ऐसे जम्मू-कश्मीर में पहुंच रहे हैं, जहां केंद्र शासित प्रदेश की व्यवस्था के साथ-साथ एक निर्वाचित सरकार भी काम कर रही है।

इसलिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि उनकी यात्रा अतीत की अमेरिकी कश्मीर कूटनीति की पुनरावृत्ति है या अमेरिकी नीति के एक नए अध्याय का संकेत।

मई 2025 का सैन्य संकट अब भी महत्वपूर्ण संदर्भ

गोर के दौरे का एक संवेदनशील संदर्भ मई 2025 का भारत-पाकिस्तान सैन्य टकराव भी है। उस समय राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष रोकने में अमेरिकी भूमिका का दावा किया था। नई दिल्ली ने अमेरिकी मध्यस्थता के दावे को स्पष्ट रूप से खारिज करते हुए कहा था कि सैन्य कार्रवाई रोकने से जुड़ी समझ दोनों देशों के बीच मौजूदा सैन्य संपर्क माध्यमों के जरिए बनी थी।

इसके बाद अमेरिकी प्रशासन की भाषा भी अपेक्षाकृत सावधानीपूर्ण हुई और भारत-पाकिस्तान के बीच सीधे संवाद को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया गया।

ऐसे में श्रीनगर में सर्जियो गोर की किसी भी टिप्पणी को नई दिल्ली में बेहद ध्यान से पढ़ा जाएगा। खासकर कश्मीर, तीसरे पक्ष की भूमिका, मध्यस्थता, आतंकवाद और भारत-पाकिस्तान संवाद जैसे मुद्दों पर उनकी शब्दावली महत्वपूर्ण संकेत दे सकती है।

पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर पर भी रहेगी नजर

सर्जियो गोर की यात्रा के दौरान पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर की स्थिति पर भी नजर रहेगी। वहां पाकिस्तान की नीतियों के खिलाफ समय-समय पर जन असंतोष और विरोध के स्वर सामने आते रहे हैं।

ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि श्रीनगर यात्रा के दौरान अमेरिकी राजदूत पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर की मौजूदा परिस्थितियों का कोई उल्लेख करते हैं या नहीं। यदि करते हैं तो उनकी शब्दावली और संदर्भ भी विशेष महत्व रखेंगे।

हालांकि अभी ऐसा कोई स्पष्ट संकेत नहीं है कि सर्जियो गोर श्रीनगर किसी नई अमेरिकी कश्मीर पहल या मध्यस्थता प्रस्ताव के साथ पहुंच रहे हैं। इसलिए इस यात्रा से किसी बड़े नीतिगत बदलाव का निष्कर्ष निकालने में जल्दबाजी से बचना भी जरूरी है।

कारगिल से आज तक बदल गई तस्वीर

1999 के कारगिल युद्ध के दौरान अमेरिका ने पाकिस्तान पर नियंत्रण रेखा के पीछे से अपनी सेनाएं हटाने के लिए दबाव बनाया था। 9/11 के बाद अमेरिकी दृष्टिकोण में आतंकवाद और क्षेत्रीय सुरक्षा का महत्व और बढ़ गया।

लेकिन इसी अवधि में भारत-अमेरिका संबंधों ने भी असाधारण विस्तार हासिल किया। रणनीतिक, रक्षा, तकनीकी और आर्थिक क्षेत्रों में दोनों देशों के संबंध लगातार गहरे हुए हैं।

बदले हुए इस परिदृश्य में कश्मीर अब भारत-अमेरिका संबंधों का अकेला केंद्रीय मुद्दा नहीं है। फिर भी जब भारत-पाकिस्तान तनाव सैन्य टकराव का रूप लेता है, तब दक्षिण एशिया की स्थिरता अमेरिका के लिए स्वाभाविक रूप से अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।

यही वजह है कि गोर की श्रीनगर यात्रा को केवल स्थानीय राजनीतिक घटनाक्रम के चश्मे से देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसे भारत-अमेरिका संबंधों, दक्षिण एशिया की सुरक्षा और बदलती अमेरिकी प्राथमिकताओं के व्यापक संदर्भ में भी देखना होगा।

असली संकेत बैठकों के बाद मिलेंगे

सर्जियो गोर की श्रीनगर यात्रा को फिलहाल अमेरिकी कश्मीर नीति में किसी बड़े बदलाव की घोषणा मानना जल्दबाजी होगी। यात्रा का वास्तविक अर्थ उनके कार्यक्रम, मुलाकातों, सार्वजनिक टिप्पणियों और यात्रा के बाद जारी होने वाले अमेरिकी बयान से निकलेगा।

यदि उनका संपर्क मुख्यतः उपराज्यपाल, निर्वाचित सरकार, प्रशासन और सुरक्षा तंत्र तक सीमित रहता है, तो यह अमेरिकी कूटनीति के अधिक संस्थागत और आधिकारिक रुख का संकेत माना जा सकता है। इसके विपरीत, यदि वह गैर-सरकारी संगठनों, कारोबारी समुदाय, नागरिक समाज और विभिन्न राजनीतिक धाराओं के प्रतिनिधियों से व्यापक संवाद करते हैं, तो वाशिंगटन के दृष्टिकोण की दूसरी परतें भी सामने आ सकती हैं।

बदलती तस्वीर को समझने का अवसर

कुल मिलाकर, सर्जियो गोर की श्रीनगर यात्रा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल एक अमेरिकी राजदूत का जम्मू-कश्मीर दौरा नहीं है। यह उस बदलती तस्वीर को समझने का अवसर है, जिसमें कश्मीर, भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी और दक्षिण एशिया की भू-राजनीति एक-दूसरे से जुड़ रही हैं।

अब असली नजर श्रीनगर की बैठकों पर नहीं, बल्कि उन बैठकों से निकलने वाले संदेश पर होगी। यही संदेश यह संकेत देगा कि आज का वाशिंगटन कश्मीर को पुराने भारत-पाकिस्तान विवाद के फ्रेम में देखता है या भारत के साथ विकसित हो चुके अपने व्यापक रणनीतिक संबंधों के नए परिप्रेक्ष्य में।